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13 April 2013

बेटों की चाह में कहीं खो रही हैं बेटियाँ.........

प्रस्तुत हैं कन्या भ्रूण हत्या पर कुछ पंक्तियाँ- 


बेटों की चाह में कहीं खो रही हैं बेटियाँ।
बदलाव के इस दौर में भी मर रही हैं बेटियाँ॥  

खुदा की नेमतों का क्यूँ कत्ल करती रूढ़ियाँ। 
भले ही चढ़ रहे हों आज तरक्कियों की सीढ़ियाँ॥ 

गर्भ के भीतर है क्या क्यूँ जानने की लालसा। 
क्यों जनक भी जननी को ही मारने की ठानता॥ 

*राजा  की चाह में जब खो चुकेंगी रानियाँ। 
इंसान भी बन जाएगा तब बीत चुकी कहानियाँ॥ 

बेटों की चाह में कहीं खो रही हैं बेटियाँ ।
दे रही हैं ठौर और हाथ थाम रहीं बेटियाँ ॥  

~यशवन्त माथुर©

*[राजा बेटा ,रानी बेटी के अर्थ में ] 

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