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31 January 2021

देहरी पर अल्फाज़

समय के साथ चलते-चलते 
नयी मंजिल की तलाश में 
भटकते-भटकते 
कई दोराहों-चौराहों से गुजर कर 
अक्सर मिल ही जाते हैं 
हर देहरी पर 
बिखरे-बिखरे से 
उलझे-उलझे से 
भीतर से सुलगते से 
कुछ नये अल्फाज़ 
जिन्हें गर कभी 
मयस्सर हुआ 
कोई कोरा कागज़ 
तो कलम की जुबान से 
सुना देते हैं 
एक दास्तान 
अपनी बर्बादियों के 
उस बीते दौर की 
जिससे बाहर निकलने में 
बीत चुकी होती हैं 
असहनीय तनाव 
और अकेलेपन की 
सैकड़ों सदियाँ। 

-यशवन्त माथुर ©
31012021

26 January 2021

क्या यह वही देश है?

जो जाना जाता था 
किसान के हल से 
अपने सुनहरे कल से 
जिसके खेतों में फसलें 
झूम-झूम कर 
हवा से ताल मिलाती थीं 
पत्ती-पत्ती फूलों से 
दिल का हाल सुनाती थी 
जहाँ संपन्नता तो नहीं 
संतुष्टि की खुशहाली थी 
महंगी विलासिता तो नहीं 
पर ज़िंदगी गुजर ही जाती थी 
कितना अच्छा था पहले 
वैसा अब आज नहीं 
पहले सुराज था 
आज तो स्वराज नहीं 
आज तो 
बस पल-पल बिगड़ता 
सबका वेश और परिवेश है
जो गणतंत्र था सच में कभी  
क्या यह वही देश है?

-यशवन्त माथुर ©
24012021

20 January 2021

रिश्ते जरूरी नहीं....

रिश्ते जरूरी नहीं रिश्तों के बिना भी अब तक अनजान कुछ लोग अचानक ही
कहीं मिलकर अपने से लगने लगते हैं मीलों दूर हो कर भी उनकी दुआओं के कंपन
संजीवनी के रंगों से
उम्मीदों के कैनवास पर
दिखने लगते हैं।

रिश्ते जरूरी नहीं
रिश्तों के बिना भी
नीरस जीवन की
अनंत गहराइयों तक जाकर
महसूस किया जा सकता है
वास्तविकता के कठोर तल पर
टूट चुकी उम्मीदों के भविष्य का
कोमल स्पर्श।

-यशवन्त माथुर ©
20012021

12 January 2021

शब्द

कितने ही शब्द हैं यहाँ 
कुछ शांत 
कुछ बोझिल से 
उतर कर चले आते हैं 
मन के किसी कोने से 
कहने को 
कुछ अनकही 
सिमट कर कहीं छुप चुकीं 
वो सारी 
राज की बातें 
जिनकी परतें 
गर उधड़ गईं 
तो बाकी न रहेगी 
कालिख के आधार पर टिकी 
छद्म पहचान 
बस इसीलिए चाहता हूँ 
कि अंतर्मुखी शब्द 
बने रहें 
अपनी सीमा के भीतर
क्योंकि मैं 
परिधि से बाहर निकल कर 
टूटने नहीं देना चाहता 
नाजुक नींव पर टिकी 
अपने अहं की दीवार। 

-यशवन्त माथुर ©
12012021

07 January 2021

कुछ लोग -54

दूसरों के सुख से दुखी 
और 
दुख से सुखी महसूस करने वाले 
कुछ लोग 
कभी-कभी 
बेहयायी से 
आने देते हैं 
बाहर 
भीतर के क्रूर 
और वीभत्स रूप को 
क्योंकि 
वे जानते हैं 
सामने वाले की 
मजबूरी 
और मनोदशा को 
क्योंकि 
उन्हें होता है गुमान 
कि समय का कोई भी प्रहार 
भेद नहीं पाएगा 
उनके निर्लज्ज शब्दों की ढाल को 
लेकिन तब भी 
वो दिन 
वो पल आता ही है 
जब बंद पलकों के पर्दे पर 
चलता हुआ 
बीते दौर का चित्र 
कारण बनता है 
उनके विचित्र अवसान का। 

-यशवन्त माथुर ©
07012021

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01 January 2021

जीवन को चलना ही है


Image Copyright-Yashwant Mathur



















अंधेरा कितना भी हो 
उजियारा होना ही है 
सुई रुक भी जाए 
घड़ी को बदलना ही है। 

कहीं ढलती शाम होगी 
इस समय 
कहीं सूरज को किसी ओट से 
उगना ही है। 

यहाँ सर्द हवा है, धुंध है  
लेकिन 
छँटेंगे बादल फिर धूप को 
निकलना ही है। 

यह दौर काँटों का है 
माना, फिर भी 
फूलों  की हर कली को 
रोज़ खिलना ही है। 

टूटते-टूटते भी बाकी है 
एक उम्मीद इतनी सी- 
कोहरा कितना भी हो 
जीवन को चलना ही है।  

(नववर्ष  2021 सबके लिये शुभ और मंगलमय हो )

-यशवन्त माथुर ©
01012021 

30 December 2020

मैं नहीं कवि.....

मैं नहीं कवि 
न ही कविता को ही कह पाता हूँ 
बस जो भी मन में आता है 
वो ही लिखता जाता हूँ। 

है नहीं भान न ही ज्ञान 
रस छंद अलंकारों का
परिचय बस थोड़ा ही है 
काव्य के प्रकारों का। 

बस थोड़ा जो कुछ सहेजा समेटा 
और जो कुछ है देखा समझा
शब्दों की डोर में वो ही
थोड़ा पिरोता जाता हूँ । 

मैं नहीं कवि 
न ही कविता को ही कह पाता हूँ 
मन की कोर से जो निकलती
वो बात बताता जाता हूँ ।

-यशवन्त माथुर ©
23122020

24 December 2020

कि मौत आने को है....

हर ग़म जाने को है कि मौत आने को है,
चुटकी भर खुशियाँ धूल में मिल जाने को हैं।

बेइंतिहा शिकायतों के वजूद पर मेरा सबर,
पछता रहा कि जो बीता वो कल आने को है।

धोखा इस बात का था कि उम्मीदें साहिल पर थीं, 
मैं  घिसटता ही रहा  कि साँसें टूट जाने को हैं।  

ठहर जा रे वक़्त! और बीत कर क्या होगा?
जो तू करने को था कर ही जाने को है। 

-यशवन्त माथुर ©
24122020 

20 December 2020

कुछ लोग-53

अपने स्वार्थ में 
पर्दे के पीछे रह कर 
दूसरों के काम बिगाड़कर 
संतुष्ट हो जाने वाले... 
और प्रत्यक्ष होकर 
हितैषी जैसा दिखने वाले 
दोस्त के नकाब में 
दुश्मनी निभाने वाले 
कुछ लोग
आस पास रह कर 
जिसे समझते हैं 
भेद 
वह सिर्फ सुई होता है 
जो अपनी चुभन से
एक दिन  
बिखेर कर रख देता है 
उनका सारा सच 
और फिर 
कुछ नहीं बचता 
हर तरफ फैली हुई 
कालिख के सिवा। 

-यशवन्त माथुर ©
20122020

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15 December 2020

आम आदमी अब सिर्फ रोता है.....

टाटा-बिरला थे पहले 
अब अंबानी- अडानी होता है 
पहले जो थोड़ा हँसता था 
आम आदमी अब सिर्फ रोता है। 

हल छोड़ सड़क पर निकल किसान 
माँग रहा समर्थन और सम्मान 
लेकिन बहुतों की नज़रों में 
वो माओवादी होता है। 

रोजगार के सपने देख देख कर 
परीक्षा शुल्क चुकाने वाला 
उस युवा की आँखों में देखो 
जो निजीकरण को ढोता है। 

महँगाई के इस स्वर्ण काल में 
बजट नहीं न बचत कोई 
सरकारी उद्यम सभी बेच कर 
कैसा विकास ही होता है?

आम आदमी अब सिर्फ रोता है। 

-यशवन्त माथुर ©
15122020 

05 December 2020

भूमि पुत्र है वो

वो 
जो खेतों में हल चला कर 
गतिमान करता है 
जीवन के चक्र को 

वो 
जो अपने पसीने की हर बूंद से 
सींचता है 
अपने भीतर के सब्र को 

वो 
जिसके होंठों की मुस्कुराहट 
उपजाती है 
हमारे कल की खुशियों को 

वो 
जिसके खेतों की कपास के धागे 
सूत बन कर ढल जाते हैं 
रंग बिरंगी पोशाकों में 

वो 
जिसे फिर भी 
मयस्सर होती है 
सिर्फ गुमनामी 

वो 
जो 
सबको 
सबका हक दे कर भी 
अपने हक के लिये 
राजधानी की सड़कों पर 
गिरते-पड़ते 
शैतानी पत्थरों के वार से 
बचते बचाते 
शहीद होकर 
कंक्रीट की सड़कों पर 
अपने खून से 
बना देता है 
प्रश्नचिह्न 

वो 
कोई और नहीं 
धरती के अंक से लग कर 
बिना कोई भेद किये 
सबकी एकता का सूत्र है वो 
भूमि पुत्र है वो।  

-यशवन्त माथुर ©
05122020 

26 November 2020

अगर वह जाग गया ....

किसान! 
खून-पसीना एक कर 
दाना-दाना उगाता है 
हमारी रसोई तक आकर 
जो भोजन बन पाता है 
इसीलिए 
कभी ग्राम देवता 
कभी अन्नदाता कहलाता है 
लेकिन 
क्या कभी देखा है?
उसे भोग और विलास में 
क्या कभी देखा है ?
कहीं उसका कोई महल खड़ा 
या देखा है ?
उसे सोते हुए
सोने और चांदी के बिस्तर पर  
नहीं!
कभी नहीं! कहीं नहीं! 
वह तो आज के इस विकसित युग में भी 
विकासशील होने की चाह लिए 
अब तलक अविकसित ही है 
और जब भी 
वह आवाज उठाता है 
करता है कोशिशें 
अपने वाजिब हक और दाम की 
हम आरामतलब लोग 
उसकी मेहनत को 
तोल देते हैं 
लाठियों की मार 
और आँसू गैस की कीमत से 
क्योंकि हम जानते हैं...
किसान  
अगर वास्तव में जाग गया
अपनी पर आ गया  
तो उसके शोषण की नींव पर बनी 
हमारे अहं 
और स्वार्थ की छद्म इमारत 
एक पल भी नहीं लगाएगी 
भरभराकर 
गिरने में। 

-यशवन्त माथुर ©
26112020

21 November 2020

काश बदल सकता ....

काश!
कि मैं बदल सकता 
ले जा सकता 
समय को वहीं 
उसी जगह 
जहाँ से 
शुरू हुआ था 
ये सफर 
लेकिन 
अपनी द्रुत गति से 
समय के इस चलते जाने में 
थोड़ी भी 
नहीं होती गुंजाइश 
इस जीवन के 
बीते पलों में 
वापस लौटने की 
मगर हाँ 
सिर्फ चिरनिद्रा ही 
होता है 
अंतिम विकल्प 
जिसकी प्रतीक्षा में 
कभी कभी लगने लगता है 
एक एक सूक्ष्म पल 
कई -कई जन्मों जैसा। 

-यशवन्त माथुर ©
22112020 

14 November 2020

पटाखे तो चलाएंगे

बारूद की गंध से आसमान को
आज खूब महकाएंगे
डरे या सहमे चाहे कोई भी
पटाखे तो चलाएंगे।

ऐसी तैसी पर्यावरण की 
धुंध की चादर बिछाएंगे
सांस न ले भले कोई भी
पटाखे तो चलाएंगे।

धूम धड़ाम हो गली मोहल्ला
हल्ला खूब मचाएंगे
रोगी कोई हो घर में लेटा
पटाखे तो चलाएंगे।

करें कोई भी काम ढंग का
तो प्रगतिशील कहलाएंगे
कुतर्की होने का सुख कैसे
फिर ऐसे  ले पाएंगे?

जिसको जो कहना हो कह ले 
पटाखे तो चलाएंगे।


-यशवन्त माथुर ©

सबकी दीवाली मना पाएँ

चलते-चलते अँधेरों में 
मंजिल अपनी पा जाएँ।   
जो देखते हैं सब सपने 
पूरा उनको कर पाएँ।  

दीप बनाने वालों के घर 
दीयों से रोशन हो जाएँ।   
नयी फसल काटने वाले 
भूखे कभी न सो पाएँ।  

फुटपाथों पर रहने वाले , 
कूड़े में जूठन ढूँढ़ने वाले, 
तीखा-मीठा नया नया सा, 
सबकी तरह ही खा पाएँ।  

कितना ही अच्छा हो गर, 
सब थोड़ा थोड़ा बदल पाएँ।   
नए ढंग से, नए रंग में 
सबकी दीवाली मना पाएँ।   

(दीप पर्व सभी को शुभ व मंगलमय हो) 

-यशवन्त माथुर ©

05 November 2020

छोटी - छोटी बातें

PC:Bel Hamid..Posted in a Facebook group
आओ कर लें 
कुछ छोटी - छोटी बातें 
जो बड़ों के लिये 
साधारण ही होती हैं 
लेकिन 
हम तो बस खुश हो लेते हैं 
प्यार से 
किसी के चूम लेने भर से 
या फिर यूं ही 
किसी की गुदगुदी से 
हमारे लिये 
थोड़ी सी रेत ही काफी है 
जिससे बना लेते हैं 
अपने सपनों का घर 
हमारे खेलने के लिये 
मुट्ठी भर बर्फ ही बेहतर है 
क्योंकि हमें आदत है 
जीवन के साथ चलते जाने की 
बस इसीलिए 
बिना झिझक 
तुम भी कर सकते हो 
कह सकते हो 
छोटी-छोटी बातें 
जिनमें बड़े-बड़े सपने 
आकार ले कर 
बदल जाते हैं 
भविष्य से 
वर्तमान में। 

-यशवन्त माथुर ©
05112020 

14 October 2020

कुछ ऐसा भी होता है .....

समय के साथ 
चेहरे बदलते हैं
कभी-कभी 
बदलती हैं तकदीरें भी 
हाथों की लकीरें भी 
लेकिन कुछ 
ऐसा भी होता है 
जो अक्षुण्ण रहता है 
जिसके भीतर का शून्य 
शुरू से अंत तक
तमाम विरोधाभासों 
और बदलावों के बाद भी 
बिल्कुल निर्विकार 
और अचेतन होता है 
शायद उसी परिकल्पना की तरह 
जो रची गई होती है 
किसी साँचे में 
उसे ढालने से पहले। 

-यशवन्त माथुर ©
14102020 

04 October 2020

कुछ लोग -52

कुछ लोग 
जो उड़ रहे हैं आज
समय की हवा में 
शायद नहीं जानते 
कि हवा के ये तेज़ झोंके 
वेग कम होने पर 
जब ला पटकते हैं धरती पर 
तब कोई
नहीं रह पाता काबिल 
फिर से सिर उठाकर 
धारा के साथ 
चलते जाने के।
 
इसलिए 
संभल जाओ 
समझ जाओ 
मैं चाहता हूँ 
कि जान पाओ 
और कह पाओ 
सही को सही 
गलत को गलत 
क्योंकि 
यह चिर स्थायी गति 
शून्य से शुरू हो कर 
शून्य पर ही पहुँच कर 
देश और काल की 
हर सीमा से परे 
कुछ लोगों के 
आडंबरों का विध्वंस कर 
सब कुछ बदल देती है।  

-यशवन्त माथुर ©
04102020

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30 September 2020

अब नहीं निकलेंगे.....

अब नहीं निकलेंगे लोग 
मोमबत्तियाँ लेकर सड़कों पर 
नहीं निकलेंगे जुलूस 
#JusticeforManisha
और पैदल मार्च 
नहीं देंगे श्रद्धांजलि 
गगन भेदी नारों से 
नहीं करेंगे 
दिन-रात टेलीविज़न पर 
न्याय की माँग 
नहीं चमकाएंगे 
कैमरों के आगे अपने चेहरे 
नहीं करेंगे धरने और प्रदर्शन 
क्योंकि सत्यकथा पढ़ने के अभ्यस्त 
कई टुकड़ों में बँटे हुए 
हम संवेदनहीन लोग 
अभी व्यस्त हैं 
चरस-गाँजा, हत्या और आत्महत्या की 
गुत्थियाँ सुलझाने में। 

हम 
अपनी विचारशून्यता के साथ  
दिन के भ्रम में 
उतराते जा रहे हैं 
काली घनी रात के बहुत भीतर 
इतने भीतर 
कि जहाँ से बाहर 
अगर कभी निकल भी पाए 
तो भी लगा रहेगा 
एक बड़ा प्रश्नचिह्न 
हमारे बदलाव 
और हमारी विश्वसनीयता पर 
वर्तमान की तरह। 

-यशवन्त माथुर ©
30092020 

17 September 2020

चाहिए

जो बैठे हैं बेकार उनको रोज़गार चाहिए।
जो सुने सबकी पुकार ऐसी सरकार चाहिए।

खुशहाल मजदूर-किसान-नौ जवान चाहिए।
दो जून की रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए।

संविधान की प्रस्तावना का स्वीकार चाहिए।
शोषण मुक्त समाज का स्वप्न साकार चाहिए।

जागृति के गीतों का अब आह्वान चाहिए।  
प्रगति की राह पर नया अभियान चाहिए।

-यशवन्त माथुर ©
17092020
#बेरोजगार दिवस

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