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26 September 2010

शायद नहीं!

ये चाँद जो दीखता खूबसूरत है
दूर पृथ्वी से
क्या वाकई
इतना सुन्दर है
क्या चाँद का टुकड़ा
कह देने से
कोई इठला सकता है
अपनी सुन्दरता पर
या
ये एक भ्रमजाल है
छलावा है

ये कैसा आकर्षण?
क्या रूप ही
सब कुछ होता है..
क्या मीठा ही
अच्छा होता है..

शायद नहीं!

(जो मेरे मन ने कहा.....)

24 September 2010

रिश्ते

 कभी कभी दूर के भी
बहुत पास हो जाते हैं
और कभी पास के भी
बहुत दूर हो जाते हैं

जब जुड़े हों तार
दिल से दिल के तो क्या करें
कल के अनजान आज खुद की
शान  बन जाते हैं

ये रिश्ते हैं
इन्हें चाहे कोई भी नाम दे दो
बिन कहे सुने ही सब कुछ
समझ जाते हैं

बहुत कोमल होती है
ये प्यार की डोर
विश्वास अगर टूटे तो
रिश्ते भी बिखर जाते हैं

आओ बातें करें कुछ मन की
बांटे अपने कुछ सपने
रिश्ते वो सपने हैं
जो खुद ही सच हो जाते हैं

कुछ रिश्ते अपने आप बन जाते हैं.


(जो मेरे मन ने कहा....)

22 September 2010

क्या यही बचपन है?

रोज़ सुबह
मेरे घर के सामने से
जाते हैं स्कूल को
छोटे छोटे बच्चे
एक मीठी से मुस्कान होती है
उन के निश्छल चेहरे पर

और वो
अपनी नाज़ुक सी पीठ पर
चले जाते हैं
ज्ञान का बोझा ढोते हुए

हाँ!ज्ञान का बोझा ढोते हैं
ये प्यारे प्यारे बच्चे
वो ज्ञान
जो सिर्फ सिमटा हुआ है

बस्ते में रखी किताबों तक
वो ज्ञान
जो पार तो  करा  देगा
परीक्षा की नदी को

मगर क्या
पास करा देगा
जिंदगी के असली इम्तिहान  में?

ये छोटे छोटे
प्यारे प्यारे  बच्चे
जब खेलते हैं
हँसते हुए
कितने अच्छे लगते  हैं

मगर जब रोते हैं
कम नंबर आने पर
जब पिटते हैं
अपने पालन हारों से
दिल कचोट जाता है

क्या यही बचपन है?



20 September 2010

मधुशाला...

आज फिर मन मचल रहा है
मय का प्याला पीने को
दबी छुपी कुछ बातें मन की
मधुशाला में कहने को
दुनिया में कोई नहीं है
मेरी थोड़ी सुनने वालाअपनी कुछ न कहती मुझ से
सुनती मुझ को मधुशाला.

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