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30 September 2010

मैं नारी हूँ!

सुनो! ओ पाखंडी-
दुनिया वालों
ध्यान से सुनो!
चाहे जितने भी कांटे
तुम बिछालो मेरी राह में
चाहे जितने भी आंसू
तुम दे दो मुझ को
ये न समझना कि
मैं हार गयी हूँ

हाँ
कुछ पल को रूकती हूँ
ठिठकती हूँ
हंसती हूँ-
तुम्हारी सोच पर
कितने मूर्ख हो तुम
जो अब तक
मुझ को अबला समझते
आ रहे हो

वो बल
वो सामर्थ्य है मुझ में
असीमित दर्द सह कर भी
मैं
दुनिया को-
तुम को -
जन्म देती हूँ

और तुम
तुम मुझ को
मार देते हो
दुनिया में आने से पहले
शायद इसलिए
कि मैं नारी हूँ!


(जो मेरे मन ने कहा.....)

29 September 2010

नहीं चाहता पुनर्जीवन

हाँ
लगता है
सारे सपने कहीं खो गए हैं
जो देखे थे-
एक पल को लगा था
शायद सच होने वाले हैं
और मैं
आज़ाद होने वाला हूँ
एक रोशनी दिखी थी
पर ये नहीं मालूम था
कि एक बार फिर से
अँधेरे में  खो जाऊंगा
और अब
अब तो कोई तमन्ना ही नहीं है
इस सन्नाटे से
इस अँधेरे से
बाहर आने की
लक्ष्य विहीन
एक अंतहीन सोच में डूबा हुआ
मैं
मैं-अब और नहीं चाहता पुनर्जीवन
मैं अपने खोए हुए सपनों
में  कहीं खो जाना चाहता हूँ
फिर वापस न आने के लिए.


27 September 2010

पता नहीं

बड़ी अजीब होती है  
ये जीवन की राह
किस मोड़ पर ले जाए
पता नहीं

मैं आज जहाँ खड़ा हूँ
बड़ा अजीब मोड़ है
हर तरफ गड्ढे ही गड्ढे
क्यों कांटे बिछे हैं
पता नहीं

ये भावनाएं हैं
जो घुमड़ती हैं हर तरफ
चुभती हैं क्यों दिल में
पता नहीं

बड़ी अजीब होती है
ये जीवन की राह
कब खुशी कब गम
पता नहीं.


(जो मेरे मन ने कहा.....)

मिले सुर मेरा तुम्हारा

मिले सुर मेरा तुम्हारा!
भारत की  विविध  एकता और संस्कृति को दिखाते इस गीत को कभी बचपन में मैं दूरदर्शन पर देखा करता था.youtube पर सर्च करते करते अचानक यह वीडियो मिला तो सोचा कि क्यों न अपने ब्लॉग पर आप सब के साथ इसे साझा करूँ.



(जो मेरे मन ने कहा.....)

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