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08 October 2010

युव चेत गया

(व्यक्तिगत रूप से मुझे इस कविता में कुछ कमियाँ नज़र आ रही हैं;फिरभी वर्ष 2005 में लिखी गयी इस कविता को आप के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ-)  

आशा किरण हो गयी प्रकट,
युव चेत गया,युग चेतेगा
माँ भारती का,विजय शिखर  
विश्व देख रहा और देखेगा

युग-युग पूर्व का विश्व गुरु
स्वर्ण विहग बन कर चहकेगा
सृष्टि के उपवन में पुनः 
चेतना सुमन अब महकेगा

युव का नेतृत्व,युग की शक्ति
अतुल  मेधा और दिव्य दृष्टि
मुस्कुरा रही सकल प्रकृति
गुल महकेगा, युग देखेगा

युव ही है आधार युग का
युव-युगल पथ प्रदर्शक युग का
युव की असीमित ऊर्जा से
युग दमकेगा,युग देखेगा.

जागो विश्व के युवा समीर
तुम क्यों शांत?क्या कष्ट तुम्हें?
तेरे झोकों  से टकरा कर
हिम पिघलेगा,युग सिहरेगा

आशा किरण हो गयी प्रकट
युव चेत गया,युव देखेगा.



(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

05 October 2010

कोई तो है

कोई तो है हाँ देखो वो देखो
वो सामने
वो कोई तो है
जो खींच रहा है
अपनी ओर मुझे
मैं देख रहा हूँ बस उसी को
सब कुछ भूल  गया हूँ
दुनिया से अलग थलग
उसके मोह पाश में
मैं मुस्कुरा रहा हूँ
और वो भी
मुस्कुरा रहा है
मुझे देख रहा है
अपनी बाहें फैलाये
मुझे बुला रहा है
और
कह रहा है  मुझ से-
आ गले लग जा!


(जो मेरे मन ने कहा.....)

04 October 2010

मधुशाला

हाय क्यों छीन लिया तुमने
मुझ से मदिरा का प्याला
जिसको पीकर  क्षणिक भूलता
दुनिया का गड़बड़ झाला
एक पल की ये रंग रेलियाँ
फिर दो पल की तन्हाई है
तन्हाई में गले लगाती
मुझ को मेरी मधुशाला

(जो मेरे मन ने कहा.....)

02 October 2010

कल फिर तुझ को भुलाएँगे........

बापू तेरे देश में
हम तेरी बातें भूल गए
तू तो छप गया नोटों पे
हम काले धन में डूब गए

बस आज करेंगे तेरी बातें
खादी पहन चलेगा चरखा
ए.सी.मोटर में आके
हम तेरे गीत गाएंगे.

कल फिर तुझ को भुलाएँगे!

.
(जो मेरे मन ने कहा.....)

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