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10 November 2010

ज़िन्दगी

(फोटो:गूगल से साभार )

 ज़िन्दगी
कुछ लोगों के लिए
हसीं किताब होती है
और कुछ लोग
पलटते रहते हैं
काले स्याह पन्नों को
क्योंकि 
सच की कालिख 
कभी मिटती नहीं है.



07 November 2010

धन्यवाद !

जब दीपों से जगमग
हो रहा था अपना घर -आँगन
जब आतिशबाजी से गूँज रहा था
क्या धरती और क्या गगन

जब मुस्कराहट थी हमारे चेहरों पर
उल्लास द्विगुणित तन मन में
द्वारे द्वारे दीप  जले जब
लक्ष्मी पूजन ,अर्चन, वंदन में

तब कोई था जो डटा  हुआ था
घर से बहुत दूर खड़ा हुआ था
सीना ताने अड़ा हुआ था
सीमा पर वो बिछा हुआ था

ओ! भारत के वीर सिपाही
धन्यवाद और तुम को नमन
और कुछ मैं कर नहीं सकता
बस स्वीकार करो ये  अभिनन्दन!


(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

03 November 2010

कैसी दीवाली मनाएंगे?


एक तरफ भूखे नंगे
जो चुन चुन अन्न खाएंगे
कूड़े के ढेरो पे बच्चे
अपना भविष्य बनाएँगे

कैसी दीवाली मनाएँगे?

फुटपाथों पे कटती रातें
सहते शीत औ गरमी को
जूठन भी मुश्किल से मिलती
तरसते तन भी ढकने को

ये कैसी समृद्धि हाय!
आज बता दो तुम लक्ष्मी माता
जन गण मन अधिनायक भारत
क्या यही विश्व में विजय पताका?

कब मुस्काएंगे  वो चेहरे
कब हिल मिल खुशी मनाएँगे
झोपड़ियों में जब दिए जलेंगे
नूतन गाथा गाएंगे

कैसी दीवाली मनाएंगे?

-
-यशवन्त माथुर©

अर्श की ओर ले चलो

मैं फर्श पर हूँ
अर्श की ओर ले चलो
संघर्ष कर रहा हूँ
उत्कर्ष  की ओर ले चलो

हो चुका पतन मेरा
अविरल जल रहा हूँ
रहा न अनुराग किसी से
विद्वेष कर रहा हूँ

यह क्यों और कैसे
या स्वाभाविक है
नहीं पता
आस्तित्व खो चुका
चौराहे पर हूँ खड़ा

कोई हाथ थाम मेरा
मुकाम पर ले चलो
मैं फर्श पर हूँ
मुझे अर्श की ओर ले चलो.

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