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30 November 2010

तरस जाता हूँ

कभी
हरे भरे ऊंचे पेड़
कुछ आम के
कुछ  नीम के
कुछ बरगद और
गुलमोहर के
दिखाई देते थे
घर की छत से

(फोटो:साभार गूगल)

 सड़क पर चलते हुए
 कहीं से आते हुए
कहीं को जाते हुए
कभी गरमी की
तपती धूप में
कभी तेज बरसते पानी में
या कभी
यूँ ही थक कर
कुछ देर को मैं
छाँव में बैठ जाता था

पर अब
बढती विलासिताओं ने
महत्वाकांक्षाओं ने
कंक्रीट की दीवारों ने
कर लिया है
इन पेड़ों का शिकार

(मोबाइल फोटो:मेरे घर की छत से)

ये अब दिखाई नहीं देते
घर की छत से
और न ही
किसी सड़क के किनारे
अब इन्हें पाता हूँ

दो पल के सुकून को
मैं तरस जाता हूँ.




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

28 November 2010

खिल उठें ये कलियाँ

(1)


रोज़ सुबह
मैं देखता हूँ
इन अनखिली कलियों को
पीठ पर
आशाओं का बोझा लादे
चलती जाती हैं
जो
एक फूल बनने का
अनोखा
सपना लेकर

(2)


मैं भी चाहता हूँ
जल्दी से
ये कलियाँ खिल उठें
और मैं
महसूस कर सकूं
नए फूलों की
ताज़ी खुशबू को

उस खुशबू को
जो हर दिशा में फ़ैल कर
करवा दे
अपने होने का
एहसास

ताकि फिर खिल सकें
कुछ और
नयी कलियाँ.






(Photos:Google Image Search)                     (मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

26 November 2010

ज़रा याद कर लो...


(चित्र:साभार गूगल)


याद कर लो भले ही 
जाने और पहचानों को
पर जिनका कोई नाम नहीं
ज़रा याद करो अनजानों को 


मिट गए ज़ख्म,मिट गए निशाँ 
पर दर्द अब भी बाकी है
आओ चल कर देखलो 
सूनी कलाई और मांगों को


हम जहाँ थे हम वहीं हैं 
हम क्या होंगे पता नहीं
करने वाले करते तो हैं
न निभने वाले  वादों को


दो पल मेरा मौन समर्पित 
कुछ जानों को,अनजानों को
मुम्बई के बलिदानों को! 
देश पर मिटने वालों को!


जय हिंद! 


(मुम्बई हमले के शहीदों को मेरा नमन और श्रद्धांजली)




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

25 November 2010

हवा


(चित्र:साभार गूगल इमेज सर्च)


कभी लू का थपेड़ा बन कर
बदन पर चुभती है हवा
कभी सर्द लहर के आगोश में
सर सर थर थराती है हवा

आंधी कभी तूफ़ान
कभी चक्रवात बन जाती है
चिनगारी भी कभी
शोलों सी धधक जाती है

रूमानियत में मीठा सा
एहसास  बन जाती है
तन्हाइयों में भूली हुई
याद बन जाती है

जाते  हुओं को अपनी
अहमियत बताती है हवा
आते हुओं में नयी 
 आस बन जाती है हवा

कभी गम के मारों को
जी भर रूलाती है हवा
खुशबू बन कर फिजा में
कभी छा जाती है हवा.




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

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