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31 March 2011

विचारों का समुद्र कुछ शांत सा है .....

विचारों का समुद्र
कुछ शांत सा है
अपनी  ही धुन में
लहरें आ रही हैं
जा रही हैं
सुन  रहा हूँ
उठने गिरने की
चलने फिरने की
कुछ आवाजें
मगर शोर नहीं
है  अजीब सी शान्ति
मुझे जिसकी आदत नहीं
पता नहीं
ये राहत है
या संकेत
किसी ज्वार भाटे के
आने का !

27 March 2011

मुझ से दोस्ती करोगे ?

अपनी माँ की गोद में
कंधे से सर लगाए
पीछे मुड मुड कर
वो  बार बार
मुझको देख रहा  था
एक टक
रह रह कर
खिलखिला रहा था
और 
बार बार अपने
नाज़ुक से हाथ
बढ़ा रहा था
मुझ अनजान की ओर .
मानो कह रहा हो
मुझ से दोस्ती करोगे ?

25 March 2011

बोलता रहूँगा

जब जब
जो भी मन में आएगा
कहता रहूँगा
कोई तो सुनने आएगा
बोलता रहूँगा

बोलता रहूँगा
जब तक सुनना चाहेंगे लोग
बोलता रहूँगा
जब तक मुझे चाहेंगे लोग

ये शब्दों की उड़ानें हैं
मन के तराने हैं
दिल के अल्फाजों को
जुबां देता रहूँगा

बोलता रहूँगा !

23 March 2011

आज की सोच

वो बीती बात हो गए
वक़्त की स्याही में डूब कर
क्यों उनको याद कर के
दो फूल चढा दूं ?

इतिहास की किताबों में
झेलता हूँ
रटता हूँ
कोई फ़िल्मी गाना नहीं
कि हर पल गुनगुना लूँ .

वो कल के पागल थे
जो मेरा आज संवार गए
ये कोई कर्ज नहीं
कि उनका ब्याज उतारूँ.

है अपनी ही धुन मेरी
अपना जहान है मेरा
क्यों धूल पोछ कर मूरत की
गले में हार डालूं? 


(आज ही के दिन 23 मार्च 1931  को भगत सिंह,सुख देव और राज गुरु ने देश के लिए खुद को न्योछावर कर दिया था.आज का युवा वर्ग बस अपनी ही मस्ती में मस्त है शहीदों की कुर्बानी तो दूर उनके नाम तक ठीक से नहीं पता .बस इस कविता में आज के युवा की सोच दर्शाने का प्रयास मात्र किया है )

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