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19 May 2011

अक्सर जब देखता हूँ.....

अक्सर जब देखता हूँ
बुझे हुए चेहरों को
जलती हुई एक लौ की
तमन्ना होती है

कि उड़ जाए वो शिकन
जिसे सजा रखा है चेहरे पर
आँखों  से बहते गम की भी
एक अदा होती है

इन चेहरों को बख्श दो
नूर मुस्कुराहटों का
खामोशी को भी
महफ़िलों की चाह होती है

17 May 2011

ओ लहरों!

[चित्र:गूगल सर्च ]
ओ! ऊंची उठती गिरती
मन मौजी लहरों!
ले चलो मुझे भी
अपने साथ

तुम्हारे  साथ
मैं भी जीना चाहता हूँ
तुम्हारे  जैसा  जीवन

टकराना  चाहता हूँ
पत्थरों से
छोड़ जाने को
अपने कुछ निशाँ

उन पत्थरों के बीच से
कुछ रास्ते बना कर
उनकी ऊंचाइयों को
लांघ कर

मैं भी चाहता हूँ
अनवरत बहना
बस बहते रहना
चलते रहना
तुम्हारी तरह.

15 May 2011

भूल जाना चाहता हूँ

भूल जाना चाहता हूँ
उन राहों को
जिन से हो कर
मैं आ पहुंचा हूँ यहाँ तक
भूल जाना चाहता हूँ
उन कड़वी -मीठी बातों को
जिन्हें हर कदम पर
सुनता आया हूँ
भूल जाना चाहता  हूँ
उन यादों को
जिन्हें दर्द की तरह सीने में
सहेजा हुआ है
भूल जाना चाहता हूँ
अपने शरीर को
जिसका बोझा ढोते ढोते
अब मैं थक चुका हूँ
भूल जाना चाहता हूँ खुद को
क्योंकि अब मैं
अस्तित्व  खो चुका हूँ

मगर नहीं!
मैं चाहकर भी
कुछ भूल नहीं पा रहा हूँ
एक अजीब सा चक्रव्यूह
और
एक अजीब सी तड़प में
उलझा उलझा सा
छटपटा रहा हूँ मैं
मुक्ति पाने को !

14 May 2011

पतंग

आसमां में उड़ती
उठती गिरती
आपस में लड़ती भिड़ती
और फिर
कट कर कहीं और
किसी और के पास
चली जाती पतंग
या  फिर से वहीं
वापस आजाती
जहाँ से शुरू किया था
ऊपर उठना

एक  डोर से बंधी
जिसका छोर
थामा हुआ किसी ने
नचा रहा जो उसे
अपनी मर्ज़ी से
हवा के रुख के साथ
देता  ढील और
वो ऊपर उठती जाती है

है बड़ा अनिश्चित जीवन
पतंग  का
अस्तित्व का संघर्ष
द्वन्द  और अहम
असीम ऊंचाइयों में भी
नहीं छोड़ता साथ
रहना एक को ही होता है
या फिर से
वहीं आना होता है वापस
जहाँ  से
शुरू किया था
आगे  बढना
ऊंचा  उठना
आना  होता है फिर से
उसी के पास
थामी हुई है जिसने डोर
पतंग की .

[इस कविता को दो दिन पहले पोस्ट किया था किन्तु ब्लोगर की समस्या के चलते पहले तो यह पोस्ट ही उड़  गयी थी और जब वापस आई तो टिप्पणियाँ  उडी  हुईं थीं.अगर आपने इस पर पहले  भी टिप्पणी दी थी जो अब आपको न दिखे तो ऐसा ब्लोगर की प्रोब्लम से ही हुआ है.आशा है पाठक गण अन्यथा नहीं लेंगे.]

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