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16 July 2011

किस पर लिखूं?

बहुत से हैं विषय
विचार बहुत से हैं
निगाहों के हर तरफ
अंदाज़ बहुत से हैं

क्या  लिखूं
ये तो मैं जानता हूँ
सोच रहा हूँ
किस पर लिखूं?

सावन के महीने में
घिर आना बादलों का
कहीं  पर बरसना
कहीं से चल देना
बिन बरसे ही

दुनिया के किसी कोने में
सावन की पड़ने वाली बर्फ
ऊनी लबादों में लिपटे
लोगों पर लिख दूं .....

आतंक के साये में
डरे चेहरों का खौफ
या शब्द दे दूं
इंसानी क्रूरता को  .......

लिख  दूं कोई गीत गज़ल
कविता या कहानी
या लिख दूं कोई नाटक
कहूँ पात्रों की जुबानी

बहुत से रंग हैं यहाँ
कुछ उजले कुछ धुंधले
कौन  सा रंग चुनूँ
विचारों की इस रेलमपेल में
विषयों के इस अथाह समुन्दर में

किसे चुनूँ
किस पर लिखूं?

11 July 2011

वो औरत क्यों है?

नाजों से पाल कर
उसके माँ बाप ने
कार ,मोटर साइकिल
टी वी,फ्रिज
और कर्ज़ लेकर
नोटों की गड्डियां
दी थीं दहेज में
फिर भी उससे
आखिर एक गलती
हो ही गयी थी

नन्ही सी परी
उसकी गोद में  आ गयी थी
उसकी  सास उसे घर से
निकाल रही थी
घर  का चिराग
न मिलने से
खिसिया रही थी

वो रो रही थी
खीझ रही थी
अपनी किस्मत पे
यही सोच सोच कर कि
वो खुद एक औरत क्यों है?

वो  औरत क्यों है
जिसके बेटे से
वह ब्याही गयी थी
और वो भी
जिसने  उसे जन्म दिया था ......?

06 July 2011

चलते जाना ही है

राह में आती हैं
बाधाएं अनेकों
उनको तो आना ही है
फर्ज़ अपना निभाना ही है

बंद हों रास्ते
भले ही आने और जाने के
पीछे खाई और आगे कुआं
ही क्यों न हो
चलने वालों को तो
चलते  जाना ही है
रास्ता कोई निकालना ही है

फिर मैं क्यों रुकूँ
तुम्हारे पत्थरों की बारिश में
इनको फूल समझ कर
सहेजता चल रहा हूँ
कि  कल जब तुम आओ
तो मैं ये कह सकूँ
निशाँ कितने ही  दो
मुझको तो मुस्कुराना ही है

इस राह पर यूँ ही
चलते जाना ही है.


02 July 2011

बरसात का मौसम

बाहर हो रही है बारिश
भीग रही हैं सड़कें
धंस रही हैं सड़कें
सरक रही हैं सड़कें

कभी जो सरपट दौड़ा करते थे
नज़रें झुकाए जा रहे हैं
दिखा रहे हैं करतब
तरह तरह के
एक  टांग पर
चल चल कर
ताजा हो रही हैं यादें
स्कूल के खेलों की

हाथों की शोभा बढाते
जूते चप्पल
कीचड में सने पैर
हिचकोले खाते वाहन
रेंग रेंग कर चलते वाहन
कहीं पर फंसते वाहन
सड़कों संग धंसते  वाहन

और वहां
सामने के स्कूल में
पढ़ने वाला
दीपू
कंधे पे बस्ता लादे
सर पे साइकिल रख कर
चला आ रहा था
मानों
साइकिल को भी
मौका मिल गया हो
सवारी करने का

है ये दृश्य आम
बरसात के मौसम में
तेज चलती हवाओं में
आमों को टूट कर
गिरना ही है पेड़ों से
और आदमी को
गिरना है
टूटी सड़कों से

किस्मत
दोनों की एक सी है
इस मौसम में
सस्ता आम भी है
और आदमी की जान भी.

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