प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

23 October 2011

क्षणिका

बादलों के छंटते ही
आसमान के साफ होते ही
चमकने लगती है धूप
स्मृति पटल पर
जैसे शीशे पर ढुलकती
बूंदों को
अभी अभी साफ किया हो
किसी ने!

20 October 2011

तीन


आज प्रस्तुत हैं मेरी मम्मी की लिखी यह पंक्तियाँ --

सम से समता
निज से निजता 
एक से एकता
लघु से लघुता
प्रभु से प्रभुता
मानव से मानवता
दानव से दानवता
सुंदर से सुंदरता
जड़ से जड़ता
छल से छलता
जल से जलता
दृढ़ से दृढ़ता 
ठग से ठगता
कर्म से कर्मठता
दीन से दीनता
चंचल से चंचलता
कठोर से कठोरता
समझ से समझता
खेल से खेलता
पढ़ से पढ़ता
इस का विधाता
से रिश्ता होता
ये दिल जानता
ये गहरा नाता
गर समझना आता
अपना सब लगता
मन हमारा मानता
दर्द न होता
जग अपना होता
विधाता का करता
गुणगान शीश झुकाता
मानवधर्म का मानवता
से सर्वोत्तम रिश्ता
सेवा प्रार्थना होता
सबसे अच्छा होता
ये गहरा रिश्ता
अगर सबने होता
समझा ये नाता
दिलों मे होता
रामकृष्ण गर बसता
संसार सुंदर होता
झगड़ा न होता
विषमता से समता
आ गया होता
विधाता से निकटता
तब हो जाता
जग तुमसा होता
जय भू माता!

16 October 2011

बेबस मन.....

(Photo curtsy:Google image search)










कागज के किरचों की तरह 
कभी कभी
बिखरता है मन
उड़ता जाता है
कितनी ही ऊंचाइयों को
छूता जाता है
हवा की लहरों के संग
कितने ही सँकरे
तीखे मोड़ों से गुज़र कर
टुकड़ा टुकड़ा टकरा कर आपस मे
छू लेता है ज़मीन को
थक हार कर
बेबस मन...
कागज के किरचों की तरह!

13 October 2011

मैं कौन हूँ ?

कभी कभी लगता है हम इन्सानों को क्या हो गया है। इंसान होते हुए भी क्या इंसान कहलाने लायक हम रह गए हैं? कनुप्रिया जी की फेसबुक वॉल पर शेयर किये गए इस चित्र को देख कर तो यही लगता है। क्या हम इतने पत्थर दिल हो गए हैं कि एक नन्ही सी जान को कूड़े के ढेर  मे चीटियों के खाने के लिए छोड़ दें?
हम कामना करते हैं अगला जन्म इंसान का मिले और कहीं अगले जन्म मे खुद हमारे साथ भी ऐसा हुआ तो?



खैर इस ह्र्द्यविदारक चित्र को देख कर कुछ और जो मन मे आया वह यहाँ प्रस्तुत है-


मैं कौन हूँ
मुझे नहीं पता
ये क्या हो रहा है
नहीं पता
चोट मुझ को लगी
जख्म कहाँ कहाँ बने
नहीं पता
क्या होगा मेरा
नहीं पता

नहीं पता मुझको
किसे कहूँगा माँ
नहीं पता मुझको
पिता कौन मेरा
हर पल है शामों जैसा
न जाने कब होगा सवेरा

घड़ी की टिक टिक के साथ
साँसों के चलते जाने की उम्मीद
अगर कुछ कह सका तो
कहूँगा यही
मुझे नहीं बनना इंसान

इंसान
जिसने फेंक दिया मुझ को
खरपतवार के बीच
ह्रदयहीन पशुओं के चरने को

नहीं बनना मुझे इंसान
क्योंकि
इंसान ने समझा नहीं
मुझ को भी
अपने जैसा

पल पल बीतता पल
और हर पल मुझको है
खुद की तलाश
इन इन्सानों के  बीच
मुझे नहीं पता
मैं कौन हूँ?

Popular Posts

+Get Now!