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13 November 2012

आज शाम को ....

 आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

आज शाम को 
मैं नहीं चाहता 
देखना 
बेबस हो कर 
कराहते रंगीन 
आसमान को 

आज शाम को 
मैं नहीं चाहता एहसास  
पटाखों के तेज़ धमाकों से 
हिलती धरती 
और बिंधते वायुमंडल में 
घुलती बारूद की तीखी गंध का 
जो लीलती है कई बेज़ुबान जीवन 
बिना कहे, बिना सुने 

आज शाम को 
मैं चाहता हूँ देखना 
खुशबू से महकता 
क़हक़हों से
चहकता आसमान 
दीयों से रोशन धरती  
खुशी से झूमते बच्चे 
कमर तोड़ महंगाई के दौर में भी 
कुछ पल मुस्कुराते चेहरे 
और भेदभाव से परे 
एक  सुकून देने वाला 
अनकहा एहसास !

©यशवन्त माथुर©

07 November 2012

बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है......

बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है
6 बजे से शाम को अंधेरा छाने लगा है
खिली होती थी इस समय कभी धूप जून के महीने में
घूमते घूमते धरती को चक्कर आने लगा है
7 बजे खोलता है सुबह सूरज भी अपनी आँखें
बादलों की रज़ाई में आसमां छुप जाने लगा है
बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है
एक चादर मे सिमट कर फुटपाथ कंपकपाने लगा है
मावस की कालिख हो या चाँदनी की चमक में
ओस की बूंदों को गिरने में मज़ा आने लागा है 
बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है।

©यशवन्त माथुर©

05 November 2012

क्षणिका...

इन ठंडी रातों में
मन के वीरान
मैदान पर  
जहां तहां उग आयी
ख्यालों की दूब पर
चमकती बूंदों को देख कर
ऐसा लगता है जैसे
अंधेरा भी रोता है
ओस के आँसू !

©यशवन्त माथुर©

01 November 2012

ओ चाँद!

ओ चाँद!
कोशिश करता हूँ
समझने की
अक्सर
तुम्हारी कहानी को
पूर्णिमा के दिन
जब तुम दिखते हो
किसी झरोखे से
पहाड़ों के बीच से
या ऊंचे पेड़ों की
किसी शाख के किनारे से
दिखाते हो एक झलक
मुस्कुराते हुए
बादलों के बीच
तुम्हारी लुका छिपी से
मैं कभी झल्ला भी जाता हूँ
पर
जब कभी देखता हूँ
तुम्हारी आँखों में आँखें डाल कर
ऐसा लगता है
जैसे धरती की गोद में
सिर रख कर
तुम रो पड़ोगे
ऐसा कौन सा दर्द है
जिसे अपने में समेटे
अँधेरे की चादर
ओढ़ लेते हो
ओझल हो जाते हो
अमावस की रातों में
आज बता दो
ओ चाँद !
मैं सुनना चाहता हूँ
तुम्हारी कहानी
करना चाहता हूँ
अटूट दोस्ती तुम से
तुम खामोश क्यों हो
क्यों नहीं सुन रहे
मेरी बातों को
अब चुभ सी रही है
तुम्हारी ये हंसी
कोई जवाब नहीं
आखिर क्यों
ये मौनव्रत
लिया है तुमने?
ओ चाँद!
तुम्हारी चांदनी के साये में
ओस की बूंदों जैसे
तुम्हारे आंसू
मेरे कन्धों पर गिर रहे हैं
मैं समझ रहा हूँ
फिर भी सुनना चाहता हूँ
तुम्हारी जुबां में
तुम्हारी कहानी को
बोलो न
आखिर कुछ तो कहो
ओ चाँद!
तुम खामोश क्यों हो?

©यशवन्त माथुर©

('परिकल्पना' पर पूर्व प्रकाशित यह पंक्तियाँ इस ब्लॉग के ड्राफ्ट में सहेजी हुई थीं। आज निगाह पड़ी तो अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित कर रहा हूँ। )

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