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04 January 2013

सफर की दास्तान....

बड़े अजीब से
इन रास्तों पर चल कर
कभी गिर कर
कभी संभल कर
ज़रूरी नहीं कि कोई
इनसां ही
बने हमसफर ...
किनारे गिरे पड़े
टेढ़े मेढ़े पत्थर
पैरों की
खाते हुए ठोकर
सुना सुना कर
खटर पटर
संगीत की तान....
कर देते हैं पूरी
इस सफर की दास्तान।
©यशवन्त माथुर©

03 January 2013

क्षणिका .....

सवेरा कब का हो गया
फिर भी
कोहरे के आँचल तले
अब तक
धूप सो रही है
ले रही है 
मंद हवा के खर्राटे
बता रही है
पेड़ों की हिलती पत्तियों को 
कि आलसी
सिर्फ
इंसान ही नहीं होता। 

 ©यशवन्त माथुर©

02 January 2013

क्षणिका.....

सोच रहा हूँ
ख्वाबों के दल दल से
बाहर आ कर
काल्पनिक दुनिया के
पार आ कर
चुभीली सच्चाई से
हाथ मिला कर
अब कर ही लूँ दोस्ती
वक़्त की
उठती गिरती
लहरों से ।

©यशवन्त माथुर©

01 January 2013

कैसे करूँ स्वागत ?

भोर की पहली किरण
कहीं धुंध
और कहीं खिली धूप
कहीं चिड़ियों का चहचहाना
अपनी ही मस्ती मे
चलते जाना
गाते जाना
स्वागत गीत
कितने सारे
बिंबों के साथ
कितने सारे
चित्रों के साथ
कुछ वास्तविक
कुछ काल्पनिक
कुछ कविता
कुछ कहानी
और कुछ
उड़ते
बिखरते शब्दों का साथ
कर रहा है स्वागत
नव वर्ष का  !

पर
सुखांत के इन बिंबों मे
इन चित्रों मे
कविता मे
कहानी मे 
डाल पर बैठी
उस चिड़िया के गीतों मे
एक रूप
एक स्वर
एक मुस्कुराहट
एक खुशी
अगर 'उसकी'
भी होती ......
एक गीत
अगर
उसके भी मन का होता....
उसके अपनों का  होता....
तो कैसा होता ?
कितना अच्छा होता
नव वर्ष-
तुम्हारा स्वागत
आज के दिन !

अफसोस !
तुम आए हो
उस वक़्त 
जब
लाखों प्रार्थनाओं
की हार पर 
लाखों दुआओं
की हार पर
बे सिर पैर की
रार के बीच
छाया हुआ है
कुछ छद्म
और 
कुछ वास्तविक 
मौन
एक कोने से
दूसरे कोने तक
पत्थरों के भी
रूदन के बीच
नव वर्ष !
अब तुम्ही बता दो
कैसे करूँ
स्वागत ?

©यशवन्त माथुर©

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