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04 June 2014

सूक्ष्म कथा--रिहाई........हनुमंत शर्मा

फेसबुक पर कभी कभी कुछ इतनी बेहतरीन और मर्मस्पर्शी रचनाएँ पढ़ने को मिल जाती हैं कि उन्हें साझा किये बिना मन नहीं मानता।आज पेश है साभार मगर बिना औपचारिक अनुमति, हनुमंत शर्मा जी की यह बेहतरीन लघु कथा जो सरल भाषा शैली में मर्मस्पर्शी शब्द चित्र प्रस्तुत करती है।

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“साहब मेरी रिहाई खारिज़ करा दो किसी तरह ....” गिड़ागिड़ाते हुए उसने एक मुड़े हुए कागज़ की अर्जी पेश की | 
ज़ेल की तीस साल की नौकरी में . यह पहला था जो रिहाई टालने के लिए लिखित में अर्ज़ी दे रहा था | ये पिछले तीन साल से चोरी की सजा काट रहा था | एकदम गऊ था पहली ही पेशी में जुर्म कबूल कर लिया
मैंने एक बार पूछा लिया था “तुम एक्सपायरी दवाइयां क्या करते ..वो तो ज़हर होती है ?”
‘साहब.. वो तो मेरी औरत बीमार थी ....सिस्टर उसे नीली पन्नी वाली दवा देती थी ..उस दिन सिस्टर कहा दवा खत्म हो गयी है ...जाकर खरीद लाओ ...और पर्ची थमा दी ...पैसे नहीं थे ...दूकान में वैसी दवा दिखी तो उठाकर भागा ..वो तो बाद में पता चला कि दवा दुकानदार के काम की नहीं थी इसलिए उसे बाहर छांट कर रखा था ...लेकिन साहब उस बेकार की दवा के लिए मुझे पकड़कर बहुत मारा... यदि काम की दवा होती तो शायद मार ही डालते |” उसने अपनी राम कहानी सुनायी |
मै फ्लेश बेक से बाहर निकला तो मेरा ध्यान मुड़े हुए कागज़ पर गया| मैंने मुड़े कागज़ को और मोड़कर ज़ेब में रखते हुए पूछा “वैसे तुम अपने घर जाना क्यों नहीं चाहते ?” |
‘ कौन सा घर साहब ....औरत तो तभी मर गयी थी .एक लड़की थी सो उसका पहले ही ब्याह कर दिया था ... . अभी पिछले महीने बाप चल बसा ... बाहर कौन है साहब .. यहाँ अन्दर भूख लगे तो खाना मिल जाता है और कभी साल छ: माह में बीमार हुए तो दवा भी ... बाहर निकला तो खाने के बगैर मर जाऊँगा और खाना मिल गया तो दवा बगैर ...” गिड़ागिड़ाते हुए उसने मेरे पाँव पकड लिए |
मै अचानक पत्थर की मूर्ती में बदल गया था |||||



~हनुमंत शर्मा ©

(pic Sven Dalberg, courtesy google )

02 June 2014

जो मेरा मन कहे......आप सबके बीच 4 वर्ष

क़्त बहुत तेज़ी से चलता है इसकी यह रफ्तार हमारे जीवन के बाद भी थमती नहीं है। वक़्त की इसी तेज रफ्तार का एक नमूना है आज का दिन। जी हाँ आज 2 जून का दिन ....ब्लॉग जगत और सोशल मीडिया पर आप सबों के बीच चौथे वर्ष के पूरा होने के साथ  5 वें वर्ष मे मेरे प्रवेश का गवाह है।

इन 4 वर्षों मे कई नये मित्र बने भी तो कुछ मित्रों का साथ छूटा भी। कई बार दिमाग मे आया कि अब ब्लोगिंग को अलविदा कह दूँ लेकिन न न कर के भी अपनी नीरस और बोझिल लेखनी को साथ लिये अब तक यहाँ मौजूद हूँ।

इधर कई मित्रों ने अब तक यहाँ प्रकाशित हो चुकी प्रविष्टियों को किताबनुमा संकलन मे प्रकाशित करने की सलाह दी है/ देते भी रहते हैं,कुछ मित्र इंडीब्लॉगर आदि पर चल रही विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने और अपनी प्रविष्टि भेजने की सलाह भी देते रहे हैं। तो जहां तक सवाल अपना संकलन प्रकाशित कराने या उसका हिस्सा बनने का है मैं एक बार एक संकलन का सम्पादन (जिसके मात्र आवरण पर मेरा नाम था अन्यत्र नहीं) और बिना पैसा खर्च किये एक अन्य संकलन का हिस्सा भी बन चुका हूँ लेकिन मैंने यही देखा कि ऐसे संकलनों से किसी का कुछ भला नहीं होने वाला। मैं जो कुछ भी लिखता हूँ यह सिर्फ कुछ शब्द मात्र हैं इसलिये यह न 'कविता' है...न कहानी न किसी अन्य रूप में गद्य या पद्य ही है। यह सिर्फ मन की कुछ बातें हैं जिन्हें बचपन से किसी कागज़ पर लिख कर कहीं रख दिया करता था अब ब्लॉग पर सहेज दिया करता हूँ। इसलिए मुझे नहीं लगता कि मुझे बिना मतलब फिजूल खर्ची करके अपना कोई संकलन प्रकाशित करना चाहिये या किसी संकलन का हिस्सा बनना चाहिये।
रही बात इंडी ब्लॉगर आदि की प्रतियोगिताओं का हिस्सा बनने की तो वहाँ अङ्ग्रेज़ी का बोल बाला है जिस पर अपनी महारत नहीं है। बीच मे फेसबुक के कुछ ग्रुप्स की प्रतियोगिताओं का हिस्सा बनने का मौका मिला पर अब फिलहाल इसी ब्लॉग पर जब जो मर्जी लिखता कहता रहता हूँ।

यह पोस्ट लिखे जाने तक 306 फॉलोअर्स के साथ इस ब्लॉग को लगभग  1 लाख 10 हजार से ज्यादा हिट्स मिल चुके हैं।


आगे भी सफर जारी है.....आप सभी के स्नेह के साथ।


~यशवन्त यश
(यशवन्त राज बली माथुर)

27 May 2014

कुछ लोग -4

कुछ लोग
चलते रहते हैं
जीवन के हर सफर में
कभी अकेले
कभी किसी के साथ ....
पीते हुए
कभी कड़वे -मीठे घूंट
और कभी
सुनते हुए
दहशत की चिल्लाहटें ....
उनकी राह में
फूलों के गद्दे पर
बिछी होती है
काँटों की चादर
जिस पर चल चल कर
अभ्यस्त हो जाते हैं
उनके कदम
सहने को
वक़्त की हर ठोकर
और साथ ही
महसूस करने को
हर मुरझाते
फूल की तड़प ....
कुछ लोग
बस चलते रहते हैं
बिना रुके
बिना थके
क्योंकि वो जानते हैं
इंसान के रुकने का वक़्त
उस पल आता है
जब सांसें
थमने को  होती हैं
हमेशा के लिए।

~यशवन्त यश©

21 May 2014

कुछ लोग -3

कुछ लोग
अक्सर खेला करते हैं
आग से
कभी झुलसते हैं
कभी 
जलते हैं 
न जाने किस डाह को
साथ लिये चलते हैं...
शायद डरते हैं
खतरे में देख कर
खुद के अहंकार की नींव
जो दिन पर दिन
खोखली होती रह कर
ढह जानी है
एक दिन
अनजान भूकंप के
एक हल्के झटके भर से ....
ऐसे लोग
बे खबर हो कर
अपनी नाक के अस्तित्व से
करते हैं वार 
पूरी ताकत से
और धूल में मिल जाते हैं
'ब्रह्मास्त्र' की दिशा
उलट जाने के साथ। 

~यशवन्त यश©

19 May 2014

कुछ लोग--2

इस मौसम की
हर तपती दुपहर  को
मैं देखता हूँ
कुछ लोगों को
फुटपाथों पर
बिछे
लू के बिस्तर  पर
अंगड़ाइयाँ लेते हुए ....
या 
गहरी नींद मे
फूलों की खुशबू के
हसीन ख्वाबों को
साथ ले कर 
किसी और दुनिया की
हरियाली में
टहलते हुए ....

ये कुछ लोग
हैं तो
हमारी इसी दुनिया के बाशिंदे -
मगर
अनकही बन्दिशें
हमें रोज़ रोकती हैं
इनके करीब जाने से
क्योंकि इनके
शरीर और नथुनों
मे बसी है 
वही बासी गंध
जिसे हम उड़ेल कर आते हैं
पास के कूड़ा घर में.....

ऐसे लोग
अपने काले
मटमैले चेहरे और
तन पर
बस नाम के कपड़े पहने
गिनते रहते हैं
दिन की रोशनी और
रात के अँधेरों को
जिसे हम पर कुर्बान कर के
वो रहते हैं
आसमान की छत
पाताल की धरती पर
सदियों से 
यूं ही...
इसी तरह....।

~यशवन्त यश©

17 May 2014

कुछ लोग-1

ऊंची डिग्रीधारी
कुछ लोग
समझने लगते हैं
कभी कभी
खुद को
इस कदर काबिल
कि बंद हो जाता है
दिखना
उनको हर वो शख्स
जो परिधि में नहीं आता
उनके आसपास फैली
चकाचौंध की .......

वह लोग
सिमटे-सिकुड़े रहते हैं
अपनी सोच की
अनूठी
चादर के भीतर
जिसकी लंबाई चौड़ाई
फैली होती है
यूं तो
मीलों दूर तक
फिर भी सीमित रहते हैं
खुद के बनाए
उसी अंधेरे वर्ग
या वृत्त के चारों ओर
जिसकी लक्ष्मण रेखा लांघना
उनके लिए
किसी प्रतिकूलता से कम नहीं .....

ऐसे लोग
खुदा होते हैं
खुद की नज़रों में
और उनके चाटुकार
रोज़ रचते हैं
झाड़ की ऊंचाइयों पर
नये नये संविधान
जिसकी हर धारा
और उपधारा
कहीं दूर होती है
उनकी श्री की
वास्तविक
वर्तमान
और भावी
तस्वीर से ......

इसलिये
मैं कोशिश करता हूँ
दूर रहने की
ऊंची डिग्रीधारी
कुछ लोगों से 
क्योंकि 
मुझे पसंद है रहना 
शून्य की सतह पर। 

~यशवन्त यश©

13 May 2014

तस्वीरें....

तस्वीरें
जो लटकी हैं
यूं ही दीवारों पर
याद दिलाने को
बीता कल
कभी कभी
बातें करती हैं मुझ से
अकेले में
बताती रहती हैं
दूसरों के निहारने से
मिलने वाला सुख
जमी हुई गर्द से
मिलने वाला दुख
और न जाने क्या क्या
कहती रहती हैं
अपनी खामोश जुबान से
कभी कभी
सुनती रहती हैं
मेरी हरेक अनकही
बताती रहती हैं
सही गलत का भेद
शीशे के फ्रेम में जड़ी
बीते कल की 
यह तस्वीरें 
अनमोल विरासत हैं
आने वाले
कल के लिए।

~यशवन्त यश©

07 May 2014

वक़्त के कत्लखाने में -6

वक़्त के कत्लखाने में
उखड़ती साँसों को
साथ लिये
जिंदगी 
बार बार देख रही है
पीछे मुड़कर
और कर रही है
खुद से कई सवाल
जिनका जवाब
आसान नहीं
तो मुश्किल भी नहीं है
मगर
आँखों के सामने
हालातों की तस्वीर
उलझी हुई है इस कदर
कि संभव नहीं रहा
पहचानना
और ढूंढ निकालना
सही -सच्ची बातों को
'क्या 'क्यों' और 'कैसे'
अब बनने वाले हैं भूत
भविष्य की
परिभाषा रच कर
उखड़ती साँसों को 
साथ लिये 
जिंदगी 
निकल रही है 
अंतहीन सफर पर। 

~यशवन्त यश©

01 May 2014

नींव और मजदूर......(मई दिवस विशेष)


मैं रोज़ देखता हूँ
सूखे चारागाहों में
रोज़ खुदती
सपनों की
नयी नयी नींवों को 
जो जल्द ही चूमेंगी
अनेकों ख़्वाहिशों का
आसमान  ....
और उन नींवों को खोद कर
सुनहरे वक़्त को
साँचों में ढालने वाले
उम्मीदों के फूस डली
झोपड़ियों में 
यूं ही जीते रह कर
सुलगते रहेंगे
अस्तित्व खोती
बीड़ी की तरह .....
उनके हाथ
जो रंगे रहते हैं
बेहतरीन सीमेंट और
मनमोहक पेंट से
रंग नहीं सकते
खुद की दीवारें .....
वह तो बस
बदलते रहते हैं
खुद का ठौर
खुद के जीने का रंग
चलते रहते हैं
दुनिया के संग
फिर भी
गुमनाम ही रहते हैं
तन्हा नींव की
एक एक आह की तरह।  

~यशवन्त यश©

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