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25 June 2014

न अच्छे दिन हैं,न कडवे ही दिन हैं ये .....

https://www.facebook.com/ravishkumarndtvfans/posts/258233774381812
न अच्छे दिन हैं,न कडवे ही दिन हैं ये 
गरीब की पीठ पर,कोड़े से पड़े दिन हैं ये । 
कड़वे होते तो असर करते नीम की तरह 
मीठे होते तो हलक मे घुलते गुड़ की तरह। 
अंबानियों के महलों में रोशन होते दिन हैं ये 
फुटपथियों के झोपड़ों में सिसकते दिन हैं ये । 

~यशवन्त यश©

23 June 2014

दौलत का यह रास्ता गरीब के दर नहीं जाता




सच है कि पेट जिनके भरे होते हैं हद से ज़्यादा।
क्या होती है भूख उनको समझ नहीं आता ॥
सोते हैं सिरहाने रख कर वो गांधी के चेहरे को ।
सच का समंदर आँखों से कभी बाहर नहीं आता ॥
झांक कर तो देखें कभी ऐ सी कारों के बाहर ।
है मंज़र यह कि उन्हें कुछ भी नहीं सिखाता ॥
दिल दहलते हैं हर रोज़ अखबारों को देखकर ।
दौलत का यह रास्ता गरीब के दर नहीं जाता॥

~यशवन्त यश©

19 June 2014

क्या होगा उसका धरती के बिन........?

(चित्र:गूगल के सौजन्य से )
बरसों था जो हरा भरा
आज वो सूखा पेड़
पतझड़ मे छोड़ चली
सूखी पत्तियों को
नीचे बिखरा देख
पल पल गिन रहा है दिन
क्या होगा उसका
धरती के बिन.......?

धरती -
जिसने आश्रय दे कर
हो कर खड़े
जीना सिखलाया
धूप- छांव -तूफान झेल कर  
रहना अड़े
उसने बतलाया .....
भूकंपों से निडर बनाकर
फूलों की खुशबू बिखरा कर
हिल डुल हवा के झोंको से
देता जीवन
जो पलछिन ...
क्या होगा उसका
धरती के बिन........?

बन कर अवशेष
कहीं जलना होगा
या रूप बदल कर
सजना होगा
आरों की धार पर
चल-फिर कर
कीलों से ठुक-पिट
कहीं जुड़ना होगा

देखो....
जो भी होना होगा 
पर उन साँसों का क्या होगा
जिन्हें जवानी में दे कर  
अब देख रहा वो ऐसे दिन
बरसों था जो हरा भरा
क्या होगा उसका
धरती के बिन........?

~यशवन्त यश©

14 June 2014

आखिर क्यों

अभी 2 घंटे पहले घर के ऊपर आसमान मे काला धुआँ छाया रहा। पता चला है कि लखनऊ मे सीतापुर  रोड पर किसी प्रतिष्ठान में भीषण आग लगी है।हालांकि अब आसमान साफ है फिर भी इस धुएँ ने जो मेरे मन से कहा उसे निम्न शब्दों में व्यक्त कर रहा हूँ-

[घर की बालकनी से लिया गया यह चित्र उसी धुएँ का है।]
कभी मन के भीतर
कभी मन के बाहर
आखिर क्यों
दहक उठते हैं अंगारे
गुज़रे वक़्त के पीपों में भरी
ज्वलनशील बातों के
छलकने भर से  ....
आखिर क्यों
भड़क उठती हैं
घनघोर धुएँ को साथ लिए 
ऊंची ऊंची लपटें
जो समेट लेती हैं
खुद के भीतर
अनगिनत बीते कलों को ....
और आखिर क्यों 
सब कुछ भस्म हो चुकने बाद
बचती है
तो सिर्फ नमी ....
कुछ लहरें ...
आँखों से निकलीं 
कुछ पानी की बूंदें  ...
मन की जली हुई
दीवारों
और ज़मीं पर
जिनका अस्तित्व
संघर्ष करता सा लगता है
दम घोंटती गंध से
पार पाने को ...
आखिर क्यों
आपस मे जुड़ा है
विनाश
और विकास का यह वृत्त ....
इन सवालों के 
कई जवाबों में से
मुझे मिल न सका अब तक
मेरे मन का
सही-सटीक जवाब  ....
कभी मन के भीतर
कभी मन के बाहर
आखिर क्यों
इस कदर
भड़क उठती है आग ?

~यशवन्त यश©


[इस धुएँ की सही खबर आज-15 जून के अखबार से पता चली। ]

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