प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

14 September 2014

भाषा

भाषा
माध्यम है
वरदान है
हरेक जीव को
कुछ
अपनी कहने का
सबकी सुनने का
कभी इशारों से
कभी ज़ुबान से
अपने कई रूपों से
जीवन में
रच बस कर
ले जाती है
कभी प्रेम के
असीम विस्तार तक
और कभी
डुबो देती है
घृणा या द्वेष के
गहरे समुद्र में  ।

भाषा
कभी सिमटी रहती है
नियमों की
परिधि के भीतर
और कभी
अनगिनत
शब्दों के
सतरंगी आसमान में
बे परवाह
उड़ते रह कर
कराती है एहसास
धरती पर
जीवन के होने का।

~यशवन्त यश©

08 September 2014

सब सपने सच नहीं होते

सुना था
कुछ सपने
बदलते हैं
हकीकत में
कभी कभी
देते हैं
न बयां होने वाली
खुशी
लेकिन
यह काल कोठरी
तमाम बदलावों और
रूप परिवर्तनों के बाद भी
अब भी वैसी ही है
जिसके रोशनदान से
झाँकती
उम्मीद की
कुछ सफ़ेद लकीरें
अपने तय रास्ते से
भटक कर
पहले से जमा
कालिख में
कहीं गुम होकर
घुल मिल जाती हैं
उसी कालकोठरी की
तन्हाई में
जिसके लिए सपने
ऐसी हकीकत होते हैं
जो कभी
सच नहीं होती।

~यशवन्त यश©

01 September 2014

शब्दों की दुनिया

जब देखता हूँ
डायरी के
भरे हुए पन्नों पर
बिखरे हुए जज़्बातों को
तो लगता है
शब्दों की यह दुनिया
कितनी विचित्र
किन्तु सत्य है ....

विचित्र इसलिये
कि मन की भित्ति पर
उभरी आड़ी तिरछी भावनाएँ
किसी प्रतिलिपि की तरह
इन पन्नों पर
हू ब हू
मेल खाती दिखती हैं .....

और सत्य इसलिये
कि इन पन्नों पर
जो दर्ज़ या दफ़न है
वह असत्य से कोसों दूर
बाहें फैलाए
कभी अपनी ओर खींचता सा
कभी आवाज़ देता सा लगता है ....

रंगबिरंगी स्याही से रंगे
डायरी के
इन चंद पन्नों पर
समाया रहता है
देश दुनिया का
पूरा इतिहास-भूगोल
खुशी-गम
बुढ़ापा और बचपन
जीवन का गूढ दर्शन ....
इसीलिए
जब देखता हूँ
बंद डायरी के
भरे हुए पन्नों पर
बिखरे हुए जज़्बातों को
तो लगता है
शब्दों की यह विचित्र
किन्तु सत्य दुनिया
बहुत आगे है
अमरत्व की कल्पना से।

~यशवन्त यश©

23 August 2014

कुछ लोग -6

पूर्वाग्रहों से
घिरे हुए
कुछ लोग
सब कुछ
जान समझ कर
बने रहते हैं
अनजान
करते रहते हैं
बखान
अपनी
सोच की
चारदीवारी के
भीतर की
उसी किताबी
मानसिकता की
जो निकलने नहीं देती
देखने नहीं देती
बाहर की दुनिया में
हो रहे
बदलावों की तस्वीर....

ऐसे लोग
अपने 'वाद' में
उलझे रह कर
व्यर्थ के विवादों का
सहारा ले कर
ढहा देते हैं
तर्क की
नींव पर
बन रही
एक
खूबसूरत
इमारत को ....
बिना जाने
बिना समझे
बिखरा देते हैं
एक एक ईंट
पूर्वाग्रहों से
घिरे हुए
कुछ लोग
अक्सर कर बैठते हैं
भूल
समय की
नीचे झुकी हुई
शिखा को
शिखर समझने की ।

~यशवन्त यश©

कुछ लोग श्रंखला की अन्य पोस्ट्स यहाँ क्लिक करके देखी जा सकती हैं। 

Popular Posts

+Get Now!