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08 November 2014

पगडंडियां .....(मृगतृष्णा जी की कविता)

कल शाम को फेसबुक पर मृगतृष्णा  जी की यह कविता पढ़ कर इसे अपने ब्लॉग पर साझा करने से खुद को न रोक सका। आप भी पढ़िये-

(1)
पगडंडियां मौके नहीं देतीं
संभलने के
पीछे से कुचले जाने का
ख़ौफ़ भी नहीं 


(2)
पगडंडियां दूर तक
नहीं जातीं
बस इनके क़िस्से
शेष रह जाते हैं

(3)
बड़े रास्तों तक पहुँचाकर
विधवा मांग सी
पीछे पड़ी रह जाती हैं
पगडंडियां

(4)
हरे हो गये मुसाफ़िर क़दम इनके
पीली दूब का श्रृंगार किये
आदिम रह जाती पगडंडियां

(5)
पहली रात के दर्द से घबराई
क़स्बाई लड़की लौट नहीं पायी घर
रात शहर उसने बदहवास खोजी
पगडंडियां

(6)
मेरे हिस्से की पगडण्डी
मिलती नहीं
घसियारिन के बाजूबंद सी
गुम हो गयीं पगडंडियाँ

---------मृगतृष्णा©

06 November 2014

बीते दौर की बातें

कभी कभी
बीते दौर की कुछ बातें
यादों के बादल बन कर
छा जाती हैं
मन के ऊपर
बना लेती हैं
एक कवच
रच देती हैं
एक चक्रव्यूह
जिसे भेदना
नहीं होता आसान
नये दौर की
नयी बातों के लिये ।
मन !
उलझा रहता है
सिमटा और
बेचैन रहता है
भीगने को
अनंत शब्दों की
तीखी बारिश में
जो अवशेष होते हैं
उड़ते जाते
उन बादलों के
जिनके भीतर
छुपा होता है
इतिहास 
उस आदिम
दौर का
जब चलना सीखा था
कल्पना की
दलदली धरती पर
कलम की
बैसाखी लेकर ।
मैं !
आज भी चल रहा हूँ
कल भी चलूँगा
चलता रहूँगा
पार करता रहूँगा 
उस दौर से
इस दौर के
नये चौराहे
मगर
इस थकान भरे सफर में
थोड़ा रुक कर
थोड़ा थम कर
आत्म मंथन के
अल्प अवकाश को
साथ ले कर
कभी कभी
बीते दौर की कुछ बातें
छा जाती हैं 
यादों के
बादल बन कर।
  
~यशवन्त यश©
owo04112014 

04 November 2014

कुछ लोग -7

कुछ लोग
होते हैं
कोरे पन्ने की तरह
सफ़ेद
जिनका मन
ज़ुबान और दिल
ढका होता है
पारदर्शक
टिकाऊ 
आवरण से....
आवरण !
जो रहता है
बे असर
चुगलखोरी की
दूषित हवा
और काली स्याही के
अनगिनत छींटों से
आवरण !
जिसे तोड़ने
चूर चूर करने की
कई कोशिशें भी
रह जाती हैं
बे असर
पाया जाता है
उन कुछ ही
लोगों के पास 
जो होते हैं
लाखों में एक 
उस जलते
चिराग की तरह
तमाम तूफानों के
बाद भी
जिसकी लौ
रोशन है
सदियों से
आज की तरह।

~यशवन्त यश©


[कुछ लोग श्रंखला की अन्य पोस्ट्स यहाँ क्लिक कर के देख सकते हैं] 

01 November 2014

वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से

पीठ पर लादे भारी भरकम सा बस्ता
जिसके भीतर उसका हर ज्ञान सिमटता 
कभी करती हुई बातें संगी साथियों से
वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से 

कभी हाथ थामे अपने किसी बड़े का 
गुनगुनाती हुई कोई प्यारी सी कविता 
खुश होता है मन उसकी शरारतों से 
वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से

उसे नहीं पता क्या दुनिया के तमाशे हैं 
उसे तो चंद खुशियों के पल ही भाते हैं  
बेखबर गुज़रती है  बचपन की राहों से 
वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से। 

~यशवन्त यश©

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