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30 January 2015

महात्मा जी के प्रति - सुमित्रानंदन पंत

निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय!--
जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लावित आज दिगंचल,--
गत आदर्शों का अभिभव ही मानव आत्मा की जय,
अत: पराजय आज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्वल!

मानव आत्मा के प्रतीक! आदर्शों से तुम ऊपर,
निज उद्देश्यों से महान, निज यश से विशद, चिरंतन;
सिद्ध नहीं, तुम लोक सिद्धि के साधक बने महत्तर,
विजित आज तुम नर वरेण्य, गणजन विजयी साधारण!

युग युग की संस्कृतियों का चुन तुमने सार सनातन
नव संस्कृति का शिलान्यास करना चाहा भव शुभकर,
साम्राज्यों ने ठुकरा दिया युगों का वैभव पाहन--
पदाघात से मोह मुक्त हो गया आज जन अन्तर!

दलित देश के दुर्दम नेता, हे ध्रुव, धीर, धुरंधर,
आत्म शक्ति से दिया जाति शव को तुमने जीवन बल;
विश्व सभ्यता का होना था नखशिख नव रूपांतर,
राम राज्य का स्वप्न तुम्हारा हुआ न यों ही निष्फल!

विकसित व्यक्तिवाद के मूल्यों का विनाश था निश्चय,
वृद्ध विश्व सामंत काल का था केवल जड़ खँडहर!
हे भारत के हृदय! तुम्हारे साथ आज नि:संशय
चूर्ण हो गया विगत सांस्कृतिक हृदय जगत का जर्जर!

गत संस्कृतियों का आदर्शों का था नियत पराभव,
वर्ग व्यक्ति की आत्मा पर थे सौध धाम, जिनके स्थित;
तोड़ युगों के स्वर्ण पाश अब मुक्त हो रहा मानव,
जन मानवता की भव संस्कृति आज हो रही निर्मित!

किए प्रयोग नीति सत्यों के तुमने जन जीवन पर,
भावादर्श न सिद्ध कर सके सामूहिक-जीवन-हित;
अधोमूल अश्वत्थ विश्व, शाखाएँ संस्कृतियाँ वर,
वस्तु विभव पर ही जनगण का भाव विभव अवलंबित!

वस्तु सत्य का करते भी तुम जग में यदि आवाहन,
सब से पहले विमुख तुम्हारे होता निर्धन भारत;
मध्य युगों की नैतिकता में पोषित शोषित-जनगण
बिना भाव-स्वप्नों को परखे कब हो सकते जाग्रत?

सफल तुम्हारा सत्यान्वेषण, मानव सत्यान्वेषक!
धर्म, नीति के मान अचिर सब, अचिर शास्त्र, दर्शन मत,
शासन जन गण तंत्र अचिर-युग स्थितियाँ जिनकी प्रेषक,
मानव गुण, भव रूप नाम होते परिवर्तित युगपत!

पूर्ण पुरुष, विकसित मानव तुम, जीवन सिद्ध अहिंसक,
मुक्त-हुए-तुम-मुक्त-हुए-जन, हे जग वंद्य महात्मन्!
देख रहे मानव भविष्य तुम मनश्चक्षु बन अपलक,
धन्य, तुम्हारे श्री चरणों से धरा आज चिर पावन!

रचनाकाल: दिसंबर’ ३९

साभार-कविता कोश 

26 January 2015

जैसा भी है देश है मेरा .......

एक तरफ रातें काली हैं
एक तरफ है उजला सवेरा
झोपड्पट्टी की बस्ती में
मैले कुचलों का है डेरा
जैसा भी है देश है मेरा .....

कहीं दीवारों में दरारें
कही ऊंची खड़ी मीनारें 
मखमल के पर्दों के पीछे
अशर्फ़ियों का बना बसेरा
जैसा भी है देश है मेरा .......

जन तो चलता
सड़क पर पैदल
तंत्र को लेकर
चलती  'ट्वेरा'
जैसा भी है देश है मेरा .....

भले नहीं लंगोट मयस्सर 
भले फुटपाथ पे अपना रेला
जैसा भी है देश है मेरा
जैसा भी है वेश है मेरा  ।

गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

~यशवन्त यश©

20 January 2015

सीढ़ी

कदम दर कदम
कहीं दूर को जाती हुई सी
मंज़िल से मिल कर
मुस्कुराती हुई सी ....
नींव पर टिके रह कर
छूते हुए ज़मीं को
आसमां से कभी
कुछ बतियाती हुई सी .....
सीढ़ी!
अपने आप में
ककहरा है जिंदगी का ....
सीढ़ी !
अपने आप में
फलसफा है जिंदगी का ...
बिल्कुल शांत
निश्चिंत
और अपने स्थायी भाव में
फर्श को अर्श से
मिलाती हुई सी
कभी अर्श को फर्श पर
लाती हुई सी
सीढ़ी !
इबारत है
चहकती भोर के शोर सी
सीढ़ी !
इमारत है
भविष्य के नये छोर की .....
बिल्कुल शांत
निश्चिंत
मगर कई कदमों से
बिंधती हुई सी
खुद ही खुद में
हमेशा मिलती हुई सी
सीढ़ी !
एक नदी है
जो हमेशा बहती रहती है
चट्टानों पर चढ़ती है
उतरती है
और चलती रहती है ....
मंज़िल से दूर
कभी मंज़िल से मिलते हुए
सीढ़ी !
अड़ी है -खड़ी है
दीया दिखाते हुए
समझाते हुए
और कुछ सिखाते हुए। 

~यशवन्त यश©

13 January 2015

अधूरे से ड्राफ्ट्स...ख्याल ....और जिंदगी

अधूरे ड्राफ्टों मे छुपे
कुछ अधूरे ख्याल
पूरे होने की उम्मीद में
पड़े रहते हैं
बरसों तक....
भविष्य से
बे फिकर
बे परवाह
सोए रहते हैं
गहरी नींद में.....
कभी एकाएक
जाग उठते हैं
पा लेते हैं मंज़िल
और कभी
यूं ही
हो जाते हैं विदा
हमेशा के लिए
चले जाते हैं दूर
सिर्फ एक
'डिलीट' की
चटक भर से  ....

कभी कभी लगता है
यह जिंदगी भी
ऐसी ही है
अधूरे ड्राफ्टों की तरह
अधूरे ख्यालों की तरह
लक्ष्यहीन हो कर
दिशा से भटक कर
खामोशी से
कभी मिल जाती है
गुमनामी में
और कभी
अचानक से जागकर
बिखर जाती है
इतिहास के पन्नों पर
रच बस जाती है 
कल,आज और कल के
दस्तावेजों में...

ये अधूरे से ख्याल
ये अधूरे से ड्राफ्ट्स
और 
ये अधूरी सी जिंदगी
आखिर
क्यों नहीं होती पूरी ?
कभी कभी ।

~यशवन्त यश©

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