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28 March 2015

क्रन्तिकारी राम---विजय राजबली माथुर (राम नवमी विशेष)

रामनवमी के अवसर पर प्रस्तुत है मेरे पिता जी का यह आलेख जो उन्होने लगभग 30 वर्ष पहले लिखा था और आगरा एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में प्रकाशित भी हुआ था -
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हात्मा गांधी ने भारत में राम राज्य का स्वप्न देखा था.राम कोटि-कोटि जनता के आराध्य हैं.प्रतिवर्ष दशहरा और दीपावली पर्व राम कथा से जोड़ कर ही मनाये जाते हैं.परन्तु क्या भारत में राम राज्य आ सका या आ सकेगा राम के चरित्र को सही अर्थों में समझे बगैर?जिस समय राम का जन्म हुआ भारत भूमि छोटे छोटे राज तंत्रों में बंटी हुई थी और ये राजा परस्पर प्रभुत्व के लिए आपस में लड़ते थे.उदहारण के लिए कैकेय (वर्तमान अफगानिस्तान) प्रदेश के राजा और जनक (वर्तमान बिहार के शासक) के राज्य मिथिला से अयोध्या के राजा दशरथ का टकराव था.इसी प्रकार कामरूप (आसाम),ऋक्ष प्रदेश (महाराष्ट्र),वानर प्रदेश (आंध्र)के शासक परस्पर कबीलाई आधार पर बंटे हुए थे.वानरों के शासक बाली ने तो विशेष तौर पर रावण जो दूसरे देश का शासक था,से संधि कर रखी  थी कि वे परस्पर एक दूसरे की रक्षा करेंगे.ऎसी स्थिति में आवश्यकता थी सम्पूर्ण भारत को एकता के सूत्र में पिरोकर साम्राज्यवादी ताकतों जो रावण के नेतृत्व में दुनिया भर  का शोषण कर रही थीं का सफाया करने की.लंका का शासक रावण,पाताल लोक (वर्तमान U S A ) का शासक ऐरावन और साईबेरिया (जहाँ छः माह की रात होती थी)का शासक कुम्भकरण सारी दुनिया को घेर कर उसका शोषण कर रहे थे उनमे आपस में भाई चारा था.

भारतीय राजनीति के तत्कालीन विचारकों ने बड़ी चतुराई के साथ कैकेय प्रदेश की राजकुमारी कैकयी के साथ अयोध्या के राजा दशरथ का विवाह करवाकर दुश्मनी को समाप्त करवाया.समय बीतने के साथ साथ अयोध्या और मिथिला के राज्यों में भी विवाह सम्बन्ध करवाकर सम्पूर्ण उत्तरी भारत की आपसी फूट को दूर कर लिया गया.चूँकि जनक और दशरथ के राज्यों की सीमा नज़दीक होने के कारण दोनों की दुश्मनी भी उतनी ही ज्यादा थी अतः इस बार निराली चतुराई का प्रयोग किया गया.अवकाश प्राप्त राजा विश्वामित्र जो ब्रह्मांड (खगोल) शास्त्र के ज्ञाता और जीव वैज्ञानिक थे और जिनकी  प्रयोगशाला में गौरय्या चिड़िया तथा नारियल वृक्ष का कृत्रिम रूप से उत्पादन करके इस धरती  पर सफल परीक्षण किया जा चुका था,जो त्रिशंकु नामक कृत्रिम उपग्रह (सेटेलाइट) को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित कर चुके थे जो कि आज भी आकाश में ज्यों का त्यों परिक्रमा कर रहा है,ने विद्वानों का वीर्य एवं रज (ऋषियों का रक्त)ले कर परखनली के माध्यम से एक कन्या को अपनी प्रयोगशाला में उत्पन्न किया जोकि,सीता नाम से जनक की दत्तक पुत्री बनवा दी गयी. वयस्क होने पर इन्हीं सीता को मैग्नेटिक मिसाइल (शिव धनुष) की मैग्नेटिक चाभी एक अंगूठी में मढवा कर दे दी गयी जिसे उन्होंने पुष्पवाटिका में विश्वामित्र के शिष्य के रूप में आये दशरथ पुत्र राम को सप्रेम भेंट कर दिया और जिसके प्रयोग से राम ने उस मैग्नेटिक मिसाइल उर्फ़ शिव धनुष को उठाकर नष्ट कर दिया जिससे  कि इस भारत की धरती पर उसके प्रयोग से होने वाले विनाश से बचा जा सका.इस प्रकार सीता और राम का विवाह उत्तरी भारत के दो दुश्मनों को सगे दोस्तों में बदल कर जनता के लिए वरदान के रूप में आया क्योंकि अब संघर्ष प्रेम में बदल दिया गया था.

कैकेयी के माध्यम से राम को चौदह  वर्ष का वनवास दिलाना राजनीतिक विद्वानों का वह करिश्मा था जिससे साम्राज्यवाद के शत्रु   को साम्राज्यवादी धरती पर सुगमता से पहुंचा कर धीरे धीरे सारे देश में युद्ध की चुपचाप तय्यारी की जा सके और इसकी गोपनीयता भी बनी रह सके.इस दृष्टि से कैकेयी का साहसी कार्य राष्ट्रभक्ति में राम के संघर्ष से भी श्रेष्ठ है क्योंकि कैकेयी ने स्वयं विधवा बन कर जनता की प्रकट नज़रों में गिरकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की बलि चढ़ा कर राष्ट्रहित में कठोर निर्णय लिया.निश्चय ही जब राम के क्रांतिकारी क़दमों की वास्तविक गाथा लिखी जायेगी कैकेयी का नाम साम्राज्यवाद के संहारक और राष्ट्रवाद की सजग प्रहरी के रूप में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा.

साम्राज्यवादी -विस्तारवादी रावण के परम मित्र  बाली को उसके विद्रोही भाई  सुग्रीव की मदद से समाप्त  कर के राम ने अप्रत्यक्ष रूप से साम्राज्यवादियों की शक्ति को कमजोर कर दिया.इसी प्रकार रावण के विद्रोही भाई विभीषण से भी मित्रता स्थापित कर के और एयर मार्शल (वायुनर उर्फ़ वानर) हनुमान के माध्यम से साम्राज्यवादी रावण की सेना व खजाना अग्निबमों से नष्ट करा दिया.अंत में जब राम के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों और रावण की साम्राज्यवाद समर्थक शक्तियों में खुला युद्ध हुआ तो साम्राज्यवादियों की करारी हार हुई क्योंकि,कूटनीतिक चतुराई से साम्राज्यवादियों को पहले ही खोखला किया जा चुका था.जहाँ तक नैतिक दृष्टिकोण का सवाल है सूपर्णखा का अंग भंग कराना,बाली की विधवा का अपने देवर सुग्रीव से और रावण की विधवा का विभीषण से विवाह कराना* तर्कसंगत नहीं दीखता.परन्तु चूँकि ऐसा करना साम्राज्यवाद का सफाया कराने के लिए वांछित था अतः राम के इन कृत्यों पर उंगली नहीं उठायी जा सकती है.

अयोध्या लौटकर राम ने भारी प्रशासनिक फेरबदल करते हुए पुराने प्रधानमंत्री वशिष्ठ ,विदेश मंत्री सुमंत आदि जो काफी कुशल और योग्य थे और जिनका जनता में काफी सम्मान था अपने अपने पदों से हटा दिया गया.इनके स्थान पर भरत को प्रधान मंत्री,शत्रुहन को विदेश मंत्री,लक्ष्मण को रक्षा मंत्री और हनुमान को प्रधान सेनापति नियुक्त किया गया.ये सभी योग्य होते हुए भी राम के प्रति व्यक्तिगत रूप से वफादार थे इसलिए राम शासन में निरंतर निरंकुश होते चले गए.अब एक बार फिर अपदस्थ वशिष्ठ आदि गणमान्य नेताओं ने वाल्मीकि के नेतृत्व में योजनाबद्ध तरीके से सीता को निष्कासित करा दिया जो कि उस समय   गर्भिणी थीं और जिन्होंने बाद में वाल्मीकि के आश्रम में आश्रय ले कर लव और कुश नामक दो जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया.राम के ही दोनों बालक राजसी वैभव से दूर उन्मुक्त वातावरण में पले,बढे और प्रशिक्षित हुए.वाल्मीकि ने लव एवं कुश को लोकतांत्रिक शासन की दीक्षा प्रदान की और उनकी भावनाओं को जनवादी धारा  में मोड़ दिया.राम के असंतुष्ट विदेश मंत्री शत्रुहन लव और कुश से सहानुभूति रखते थे और वह यदा कदा वाल्मीकि के आश्रम में उन से बिना किसी परिचय को बताये मिलते रहते थे.वाल्मीकि,वशिष्ठ आदि के परामर्श पर शत्रुहन ने पद त्याग करने की इच्छा को दबा दिया और राम को अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति से अनभिज्ञ रखा.इसी लिए राम ने जब अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया तो उन्हें लव-कुश के नेतृत्व में भारी जन आक्रोश का सामना करना पडा और युद्ध में भीषण पराजय के बाद जब राम,भारत और शत्रुहन बंदी बनाये जा कर सीता के सम्मुख पेश किये गए तो सीता को जहाँ साम्राज्यवादी -विस्तारवादी राम की पराजय की तथा लव-कुश द्वारा नीत लोकतांत्रिक शक्तियों की जीत पर खुशी हुई वहीं मानसिक विषाद भी कि,जब राम को स्वयं विस्तारवादी के रूप में देखा.वाल्मीकि,वशिष्ठ आदि के हस्तक्षेप से लव-कुश ने राम आदि को मुक्त कर दिया.यद्यपि शासन के पदों पर राम आदि बने रहे तथापि देश का का आंतरिक प्रशासन लव और कुश के नेतृत्व में पुनः लोकतांत्रिक पद्धति पर चल निकला और इस प्रकार राम की छाप जन-नायक के रूप में बनी रही और आज भी उन्हें इसी रूप में जाना जाता है.

साभार-क्रांति स्वर 


27 March 2015

एक कालजयी कृति के बनने की कहानी--क्षमा शर्मा जी का आलेख

हाल ही में बाल साहित्य से जुड़ी साहित्य अकादेमी की गोष्ठी में एक महिला वक्ता ने कहा कि हमें एलिस इन वंडरलैंड और पंचतंत्र से मुक्त होना होगा। किसी हद तक उनकी बात सही हो सकती है, मगर यह भी सोचने की बात है कि एलिस इन वंडरलैंड आज तक न सिर्फ बच्चों में, बल्कि बड़ों के बीच भी बेहद लोकप्रिय है। इस पुस्तक को बच्चों के बीच आए 150 साल हो चुके हैं। न जाने कितनी पीढ़ियां इसे पढ़कर बड़ी हुई हैं। यह  पुस्तक एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो बोलने वाले खरगोश के बिल में गिरकर एक अनोखे राज्य में पहुंच जाती है। वहां उसका सामना विचित्र व जादुई दुनिया से होता है।

बच्चे कुतूहल और फिर क्या हुआ, कैसे हुआ, क्या ऐसा हो सकता है आदि बातों को बहुत पसंद करते हैं। इस पुस्तक की डेढ़ सदी से चली आती लोकप्रियता इसी का प्रमाण है। इसे अंग्रेजी की सबसे अधिक लोकप्रिय किताब माना जाता है। कैसा संयोग है कि एलिस व हैरी पॉटर, दोनों जादुई दुनिया के पात्र हैं, दोनों ब्रिटेन से आते हैं और दोनों किताबें अंग्रेजी में लिखी गई हैं। एलिस इन वंडरलैंड को लुइस कैरोल का लिखा माना जाता है। पर पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह असली नाम नहीं है। इसके लेखक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के गणित के प्रोफेसर चाल्र्स लुडविग डॉज्सन थे। इसकी रचना का किस्सा बेहद मजेदार है।

हेनरी लिडिल भी ऑक्सफोर्ड में पढ़ाते थे और उनके कई बच्चों में एलिस नाम की एक बच्ची भी थी। चाल्र्स लुडविग हेनरी के दोस्त थे। बच्चे उन्हें बहुत पसंद करते थे, क्योंकि वह बच्चों को तरह-तरह की कहानियां सुनाते थे। एक बार बच्चों के साथ चाल्र्स नाव में सैर कर रहे थे। इसी दौरान बच्चों के आग्रह पर उन्होंने एक कहानी सुनाई। इसकी नायिका एलिस ही थी। इस रोमांचक कहानी को सुनकर बच्चे बहुत खुश हुए। एलिस ने उनसे इसे लिखने को कहा। चाल्र्स ने इसे लिखकर अपने दोस्त को दिखाया। दोस्त और उनके बच्चों को भी यह उपन्यास बहुत पसंद आया। चार्ल्स ने लिखते वक्त बाकायदा रिसर्च की कि उस इलाके में कौन-कौन से जानवर पाए जाते हैं। साल 1865 में इस पुस्तक को मैक्मिलन ने छापा। इससे पहले क्रिसमस गिफ्ट के रूप में चार्ल्स ने इसकी हस्तलिखित प्रति एलिस को भेंट की थी। तब इसका नाम एलिसिज एडवेंचर्स इन वंडरलैंड था। लेखक ने पुस्तक में एलिस को नायिका बनाया था। मगर चार्ल्स से जब भी पूछा गया, उन्होंने इससे इनकार किया कि उनकी पुस्तक की नायिका वही एलिस है, जिसे वह जानते हैं। हालांकि असली एलिस और कहानी की नायिका एलिस, दोनों का जन्मदिन एक ही था ‘चार मार्च।’ एलिस ने वह हस्तलिखित प्रति 1926 में नीलाम कर दी। एलिस के पति की मृत्यु हो चुकी थी और वह गरीबी में दिन काट रही थीं। इस नीलामी से उन्हें 15,400 पौंड मिले थे, जो उस समय एक बड़ी राशि थी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)  

25 March 2015

कुछ ख्याल......

अनजानी दिशाओं की ओर
यात्रा पर निकले
कुछ ख्याल 
कभी पा लेते हैं
अपनी मंज़िल
और कभी
देहरी छूने से पहले ही
हो जाते हैं
गुमशुदा
हमेशा के लिये  ....
बादलों के संग
तूफानी हवा के संग
बहते -उड़ते
कुछ ख्याल 
कभी आ गिरते हैं
धरती पर
चोटिल हो कर
उखड़ती साँसों को
बेहोशी में गिनते हुए
बस तरसते रहते हैं
जीवन नीर की
दो बूंदों को
यूं ही मन में
जगह बनाते
कुछ ख्याल।

~यशवन्त यश©

23 March 2015

सपनों का समुद्र

सपनों के समुद्र मे
तैरता मन
जाने
क्या क्या ढूंढ लाता है
गहराई से
कभी सुनहरे
चमकदार
अनजाने पत्थर
जो किसी के लिए
कोई मूल्य नहीं रखते
और किसी के लिए
अमूल्य होते हैं
और कभी
निकाल लाता है
कुछ ऐसे ख्याल 
जिनका गहराई मे
कहीं दबे रहना ही
अच्छा है .....
पर शायद
अब शान्त हो जाएगा 
सपनों का समुद्र
जिसकी लहरों में
हर समय
बनी रहने वाली हलचल 
कभी थकती नहीं
रुकती नहीं
अपनी गति से
कभी बहा ले जाती हैं
अनकही बातें
और कभी
किनारे छोड़ जाती हैं
ढेर सारे किस्से ।

~यशवन्त यश©

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