प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

यदि आप चाहें तो हमें कुछ सहयोग कर सकते हैं

14 May 2015

खुद से ही बहुत दूर.....

खुद से कहीं दूर
थोड़ा हैरान
थोड़ा परेशान
खुद को पाने के
हर जतन
करता हुआ
रेतीली राहों पर
चलता हुआ 
हर पल
जीने की कोशिश में
साथ लिए 
भीतर थोड़ा दर्द
सामने थोड़ी मुस्कान 
खुद के कुछ नजदीक
खुद को छूने की
कोशिश करता हुआ 
न जाने क्यों
होता जा रहा हूँ
खुद से ही बहुत दूर।

~यशवन्त यश©

09 May 2015

कुछ लोग -16

बहुत सस्ते होते हैं 
कुछ लोग
जो बिताया करते हैं
अंधेरी रातें
फुटपाथों पर
और दिन में
झुलसा करते हैं
घिसटा करते हैं
डामर वाली
चमकदार सड़कों पर
चमका करते हैं
चाँद के चेहरे पर
कील मुहांसों की तरह।

ये सस्ते लोग
खुदा,गॉड और
भगवान नहीं
सिर्फ एक
ऊपर वाले के
हाथों से ढल कर
परीक्षक बन कर
धरती पर
आते हैं 
और फिर
वापस चले जाते हैं
साहब लोगों की
चमचमाती कारों के
काले टायरों की
पैमाइश ले कर।

ये सस्ते लोग
आवारा कटखने
श्वानों का तकिया
सिरहाने रख कर
हर रोज़
चैन की नींद सोते हैं
क्योंकि
इन्हें कोई डर नहीं होता 
चेहरे से
नकाब के हटने का।

~यशवन्त यश©

05 May 2015

कुछ लोग -15

रेत के महलों के भीतर
आसन जमाए
कुछ लोग
सिर्फ देख सकते हैं
काल्पनिक चलचित्र
जिनमें
अच्छा ही अच्छा
सब कुछ
सकारात्मक
सुलझा हुआ
और सिकुड़न मुक्त होता है
लेकिन नहीं जानते
कि यह सब दृश्य
परिणाम हैं
उनके खौफ
या प्रभाव के
जिसका अंत
संभव है
तेज़ हवा के
सिर्फ एक
झोंके से ।

~यशवन्त यश©

01 May 2015

क्योंकि मैं मज़दूर हूँ -(मई दिवस विशेष)

ढोता हूँ
दिन भर
ईंट,पत्थर और गारा 
अपने घर का
और नयी इमारत का सहारा
मैं नहीं वह बेचारा
जो नायक है
काल्पनिक चलचित्रों
कविताओं
और कहानियों का
जो अपने सुखांत
और दुखांत के बीच
मेरे जीवन की
अनकही
अनजानी रेखाओं को
सरे बाज़ार 
नीलाम करने के बाद भी
रखती नहीं
एक धेला
मेरी कर्मठ
काली
मांसल हथेलियों  पर .....

मैं
समय की
अनंत ऊंचाई पर बंधी
महीन रस्सी पर
चल कर
संघर्ष के
सँकरे रस्तों से गुज़र कर 
रोज़ मिलता हूँ
जीवन और मृत्यु से....
अपने  और अपनों के
सुनहरे कल की
चाहत लिये
हजारों की भीड़ में 
कहीं हमकदम
गुमनाम हो कर
खून पसीना पी कर 
ठोकरें खा कर
चुन जाता हूँ
किसी नींव में
किसी दीवार में
फिर भी नज़र नहीं आता हूँ
इतिहास के
किसी गर्द भरे
पन्ने पर
क्योंकि
मैं
मज़दूर!
दूसरों को
उनकी मंज़िल दे कर
बहुत दूर हूँ
खुद की मंज़िल से। 

~यशवन्त यश©

Popular Posts

+Get Now!