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12 May 2017

शोषण,शोषक और शोषित



शोषण,शोषक और शोषित
पूरक हैं
आदि काल से
और रहेंगे
अनादि काल तक
जब तक रहेगा
यह जीवन।

हमने
नदियों, तालाबों
पेड़ों और पहाड़ों का  
दोहन किया
शोषण किया
इस्तेमाल किया
और फिर
उत्सर्जित कर दिया।

किसी शोषक ने
हमसे
जी भर काम लिया
दिन भर के पसीने का
बूंद भर दाम दिया
बिना कुछ सुने –कहे
बस अपने मौन और
कुटिल दृष्टि के साथ
उसकी ‘दया’ का हाथ
हमने थामा
और चल दिये
अपने ठौर पर
चरने को
सूखी सी रोटी
और सोने को
फिर नयी सुबह के
इंतज़ार में ।

और जब
पूरा हुआ इंतज़ार
नयी सुबह का
रात के साथ
सारी बात भूल कर
हम फिर से जुट गए
उसी दिनचर्या में
जो हमारे साथ है
न जाने कितने ही
जन्मों से
और  साथ रहेगी
न जाने कितने ही
जन्मों तक।

शोषण,शोषक और शोषित
हम खुद ही हैं
अपनी दशा की दवा
और ईलाज
हम खुद ही हैं
जो नहीं पहचान पाते
दिन के उजाले
और रात के अंधेरे में
खुद के ही अक्स को। 

-यश © 
12/05/2017

11 May 2017

मजदूर हूँ मैं


06 May 2017

बस अब डूबना बाकी है


मंज़िल तो वही है  वहीं है 
पहुँचने की राह बदलनी बाकी है 
देखना है यहाँ सांसें कितनी बचीं 
कुछ और दूर चलना बाकी है । 

अरमान तो यह था कि चलेंगे साथ 
सात समुंदर पार तक 
मझधार पर भंवर में आ फंसा 
बस अब डूबना बाकी है। 

-यश©

04 May 2017

वह सामने होगा या नहीं।

अजीबो गरीब से
खयालातों में डूबा हुआ
नये हालातों में
कहीं खोया हुआ
गिन रहा हूँ दिन
जिंदगी के
कि जो आज है
वह कल होगा या नहीं
कल आज से बेहतर
या बदतर होगा कि नहीं
पर मैं
उलझन में  नहीं
निश्चिंत हूँ
मौन हूँ
सिर्फ यह देखने के लिए
जो मेरे मन में है
वह सामने होगा या नहीं।
.
~यश ©

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