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15 October 2018

कुछ लोग -42

अनेकों
औपचारिकताओं के
लबादे में
ढँके-छुपे कुछ लोग
सिर्फ चाह में रहते हैं कि
बने रहें अच्छे
और सच्चे
औरों की निगाहों में ;
लेकिन;
भूल जाते हैं
कि उनके चेहरे पर लगा
आदर्शवादी मुखौटा
देर से ही सही
पर
जब हटता है
तब साफ दिखने लगते हैं
वो तमाम कील और मुँहासे
जिनसे रिसता है
उनके वास्तविक सच
और चरित्र का मवाद।

अपने 'अभिनय' से
सबको कायल करने वाले
ऐसे लोग
समय रहते ही
पहचान में आ तो जाते हैं
मगर
पहचानने वाले भी
छू लेने देते हैं
उन्हें उनका  फ़लक
क्योंकि
ऊंचाई से गिरने पर
शर्मिंदा अर्श भी
कर लेता है
खुद को और भी कठोर
ताकि
वो कर सकें
एहसास
खुद के दिल
और दिमाग पर पुती
कालिख के
गहरेपन का।

~यश©
15/10/2018
  

14 October 2018

चौराहे

जीवन की
इस अविरल समय यात्रा में
अपने अनेकों रूप लिए
अनगिनत चौराहे
निभाते हैं
हमारा साथ
उस हमसफर की तरह
जो
कभी-कभी
साथ न हो कर भी
साथ रहता है
मन का
हर भेद जान लेता है।

ये चौराहे
अपनी चारों दिशाओं में
कहीं फूल
कहीं काँटे
और कहीं
दिखाते हैं
पथरीले -रपटीले रास्ते
जिनसे गुज़र कर
तय होता है
मंज़िल का मिलना
या उससे दूर रहना ।

हर
आने -जाने वाले के साथ
ये चौराहे
बिना हीनता का एहसास कराए
अपने सार्वभौमिक
अस्तित्व के साथ
बस इस बाट में रहते हैं
कि इन हो कर
जो जा रहा है
कल
फिर लौट कर आएगा
अपनी एक
नयी परछाई के साथ।

~यश ©
14/10/2018

13 October 2018

वक़्त और पन्ने

ये वक़्त
अपने साथ लाता है
कुछ स्याह
कुछ सफेद पन्ने
जिन पर रचा होता है
हमारा भूत
वर्तमान और भविष्य.....
हमारी अपेक्षाएँ
आशा
और निराशा।

ये पन्ने-
कभी धारा के साथ
बहते हैं
कभी
विपरीत चलने की
कोशिश में
लगाते हैं
अपना पूरा ज़ोर।
कहीं
किसी किनारे पर
ठिठक कर
रुकते हैं
सुस्ताते हैं
किसी हमराह को
कुछ राज़ बताते हैं
और बढ़ जाते हैं
अंतहीन आदि से
अनंत की ओर।

ये वक़्त
उसकी किताब
और पन्नों का
होश खोकर
चिन्दी-चिन्दी होकर
बिखरना
ऐसा लगता है
जैसे इन चलती साँसों को
मिल गया हो मुकाम
एक निर्बाध
यात्रा के बाद।

~यश©
13/10/2018

12 October 2018

समय की बेख्याली में

समय की बेख्याली में,
मन के भीतर
उठती गिरती
कई बातों के साथ
कभी-कभी
लगता है
जैसे धँसता जा रहा हूँ
किसी दलदल में
या फँसता जा रहा हूँ
किसी रेगिस्तान की
मृगमरीचिका के
मायाजाल में।
पर
यह जो भी है
कहीं ऊपर है
दिन-रात
या
पल-पल बदलते
मौसम की
हर रंगत से
समय की
हर फितरत
और
संगत से।
वजह
या बेवजह
चलते जाने की
चाह
या
मज़बूरी
समय की बेख्याली में
ज़रूरी भी होती है
ज़ाया करने के लिए
कुछ शब्द
बस इसी तरह।

~यश©
12/10/2018

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