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20 October 2018

बस चलना ही है .....

वक़्त के साथ एक दिन
गुमनाम तो होना ही है
दर्ज़ हो कर कुछ पन्नों में
कभी तो खोना ही है।

सुर बन कर  कभी तो
साज़ों में ढलना ही है
किसी की कल्पना को
कोई शब्द तो देना ही है।

ये और बात है कि रंग
हर पल तो बदलना ही है
सारे मुखौटों को चेहरे से
कभी तो उतरना ही है।

बहती हुई धारा के साथ
कदमताल तो करना ही है
घड़ी की हर सुई को
रुके बिना बस चलना ही है।

-यश ©
20/10/2018

16 October 2018

बहकते अल्फ़ाज़

अल्फ़ाज़ जब बहकते हैं
बेहया से बहते हैं
मौन धारा के साथ
राहें तय करते हैं।

मन के कहीं
किसी कोने में
बादलों की तरह
उमड़-घुमड़ कर
अनगिनत बातें
अपने भीतर लेकर
अल्फ़ाज़  जब बरसते हैं
बेहया से हँसते हैं
या आँखों की कोरों से
आँसू बन कर रिसते हैं।

अल्फ़ाज़ जब बहकते हैं
बेसुध से बिखरते हैं
कई शब्द रूपों के साथ
नए आकार लेते हैं।

-यश ©
16/10/2018





15 October 2018

कुछ लोग -42

अनेकों
औपचारिकताओं के
लबादे में
ढँके-छुपे कुछ लोग
सिर्फ चाह में रहते हैं कि
बने रहें अच्छे
और सच्चे
औरों की निगाहों में ;
लेकिन;
भूल जाते हैं
कि उनके चेहरे पर लगा
आदर्शवादी मुखौटा
देर से ही सही
पर
जब हटता है
तब साफ दिखने लगते हैं
वो तमाम कील और मुँहासे
जिनसे रिसता है
उनके वास्तविक सच
और चरित्र का मवाद।

अपने 'अभिनय' से
सबको कायल करने वाले
ऐसे लोग
समय रहते ही
पहचान में आ तो जाते हैं
मगर
पहचानने वाले भी
छू लेने देते हैं
उन्हें उनका  फ़लक
क्योंकि
ऊंचाई से गिरने पर
शर्मिंदा अर्श भी
कर लेता है
खुद को और भी कठोर
ताकि
वो कर सकें
एहसास
खुद के दिल
और दिमाग पर पुती
कालिख के
गहरेपन का।

~यश©
15/10/2018
  

14 October 2018

चौराहे

जीवन की
इस अविरल समय यात्रा में
अपने अनेकों रूप लिए
अनगिनत चौराहे
निभाते हैं
हमारा साथ
उस हमसफर की तरह
जो
कभी-कभी
साथ न हो कर भी
साथ रहता है
मन का
हर भेद जान लेता है।

ये चौराहे
अपनी चारों दिशाओं में
कहीं फूल
कहीं काँटे
और कहीं
दिखाते हैं
पथरीले -रपटीले रास्ते
जिनसे गुज़र कर
तय होता है
मंज़िल का मिलना
या उससे दूर रहना ।

हर
आने -जाने वाले के साथ
ये चौराहे
बिना हीनता का एहसास कराए
अपने सार्वभौमिक
अस्तित्व के साथ
बस इस बाट में रहते हैं
कि इन हो कर
जो जा रहा है
कल
फिर लौट कर आएगा
अपनी एक
नयी परछाई के साथ।

~यश ©
14/10/2018

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