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17 December 2019

बहुत देर हो जाएगी .. ..

ठुकराने के बाद, मुझे 
जब करोगे पाने की कोशिश 
बहुत देर हो जाएगी । 

उजड़ जाने के बाद, महफ़िल 
जब करोगे सजाने की कोशिश 
बहुत देर हो जाएगी । 

ये वक़्त थोड़ा सा  ही है, समझ लो
जब करोगे वापस लाने की कोशिश 
बहुत देर हो जाएगी ।  

-यशवन्त माथुर 
17-12-2019 

04 December 2019

क्योंकि वो एक देवी है .. ..

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए सीमित कर दी गई है 
उसकी भक्ति 
मंदिरों के भीतर 
जहाँ 
गाई जाती है आरती 
बजाई जाती हैं भेंटें 
बोले जाते हैं 
मंत्र और श्लोक। 

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए 
उसके पाठ 
पढ़ाए जाते हैं 
किताबों में 
ग्रंथों में 
टंकित शब्दों में। 

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए 
शक्ति है 
भक्ति है 
लेकिन 
गौण है 
उसका मानवीय अस्तित्व। 

वो कैद थी 
और कैद है 
आधुनिकता की 
हदों के भीतर 
जहाँ 
हमने न तो जाना 
न ही जानना चाहते हैं 
कि वो 
कुछ और भी है 
अपने दैहिक स्वरूप और 
आकर्षण के ऊपर;

कि उसके भीतर भी 
रचता-बसता है 
एक मानव 
हमारी-तुम्हारी ही तरह। 

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए 
हमारे लिए 
उसका सिद्धि रूप 
पूजनीय है 
सिर्फ नवरात्रों में 
अन्यथा 
वह कुछ भी नहीं 
सफेदी की 
कई परतों के भीतर छुपी 
हमारे मन की 
कालिख के ऊपर। 

-यशवन्त माथुर ©
04/12/2019

26 November 2019

फिर भी चलते जाने को............

होती शुरू कहीं से धारा
कहीं मिल कर खो जाने को
कितने ही पड़ाव सहेजती
भविष्य से कह कर जाने को।

उठती-गिरती दर्द को सहती
पथ को अपने चलती रहती
जब तक मिल न जाती उसको
कोई मंजिल तर  जाने को।

ऐसी ही एक धारा बन कर
काश! कि मैं भी चलता जाता
राहों की कुछ सुनता जाता
और कुछ अपनी कहता जाता।

लेकिन जाने क्यूँ अब मुझको
मेरा मैं विद्रोही लगता
माना मनाता समय ये मुझको
मैं तब भी विपरीत ही चलता।

संघर्ष ही है सच्चा साया
समय पर साथ निभाने को
भले ही काँटे बिछे राह में
फिर भी चलते जाने को।

-यशवन्त माथुर© 
26/11/2019 


22 November 2019

अंत की प्रतीक्षा में.......

एक समय
आता है
एक समय
जाता है
अपने भीतर
बहुत से
दर्द समेटे
खुशियां समेटे
क्षणिक सुखों के
कुछ सूक्ष्म
पलों के बाद
दुनियावी मेला
छँट सा जाता है
और हम में  से
हर कोई
नये आरंभ की
प्रत्याशा में
गिनता रहता है
आती-जाती साँसें
अपने अंत की
प्रतीक्षा में।

-यश ©
22/11/2019

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