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26 April 2020

अच्छा नहीं लगता

अच्छा नहीं लगता
जब देखता-सुनता हूँ खबरें
कि कहीं
दुनिया के किसी कोने में
भूख और प्यास से तड़प कर
मर जाता है कोई।

अच्छा नहीं लगता
जब तस्वीरें दिखाती हैं
कहीं कूड़े की तरह
बिखरा हुआ अनाज और
किसी पंप से
यूं ही बहता हुआ पानी।

अच्छा नहीं लगता
जब खुद को
घर में कैद पाता हूँ
दो वक्त या उससे ज्यादा
जितना मन हो खाता हूँ ।

अच्छा नहीं लगता
कि इतना सब कुछ भी
कुछ नहीं के जैसा है
किसी को नसीब हैं
महल और महफिलें
और कोई
अपनी भूख को खाता
पसीने को पीता है।

-यशवन्त माथुर©
26/04/2020

25 April 2020

कभी मजदूर न बनो

कुछ भी बनो इंसानों !
ऐसे मजबूर न बनो
ये आलम ऐसा है कि
कभी मजदूर न बनो।

न चलना पड़े पैदल
मीलों को नापते -नापते
न होना पड़े रुखसत
कहीं हांफते-हांफते।

कुछ भी बनो इंसानों !
बस कोई गुरूर न बनो
बेकदरी ही मिलेगी यहाँ
कभी मजदूर न बनो।

-यशवन्त माथुर©
25/04/2020

24 April 2020

माथुर नई सड़क वाले- साभार नवभारत टाइम्स

माथुर नई सड़क वाले
साड्डी दिल्ली
विवेक शुक्ला

च में लॉकडाउन के कारण घरों में बंद दिल्ली के माथुर परिवारों का भी धैर्य जवाब देने लगा है। अब देखिए कि वे ना तो अपने रोशनपुरा के चित्रगुप्त मंदिर में जा पा रहे हैं और ना ही कालकाजी मंदिर या महरौली के योगमाया मंदिर में। नई सड़क से बस चंदेक मिनटों में आप रोशनपुरा के चित्रगुप्त मंदिर में पहुंच जाते हैं। इधर कायस्थों के आराध्य चित्रगुप्त जी की मूर्ति है। एक बडा सा शिवाला भी है। इन सब मंदिरों में माथुर परिवार बीच-बीच में आना पसंद करते हैं।

हां, नई सड़क, किनारी बाजार, चहलपुरी, अनार की गली, चौक रायजी, चीराखाना, बीवी गौहर का कूचा वगैरह से बहुत सारे माथुर परिवार दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग एरिया में शिफ्ट कर गए हैं। आई.पी. एक्सटेंशन की श्रीगणेश सोसायटी में दर्जनों माथुर परिवार रहते हैं। लेकिन अपने पुरखों के मोहल्लों-हवेलियों से नाता टूटता थोड़े ही है। वह रिश्ता चित्रगुप्त मंदिर के जरिए बना हुआ है। पर इस सत्यानाशी कोरोना वायरस ने इन्हें अपने तीर्थस्थलों से ही दूर कर दिया है। कालकाजी मंदिर में साल में तीन बार दिल्ली के माथुर रसोई, फिर कढ़ाई और अंत में सावन की खीर के आयोजनों में मिलते हैं। ये सब सौ साल पुरानी परंपराएं हैं।


दिल्ली की माथुर बिरादरी की बात हो और पार्श्वगायक मुकेश और चीरखाना में जनमे गदर पार्टी के संस्थापक और अग्रणी क्रांतिकारी लाला हरदयाल का जिक्र ना हो, यह नहीं हो सकता। मुकेश का परिवार चहलपुरी में रहता था। वे मंदिर मार्ग के एमबी स्कूल में प़ढ़ते थे। वे बंबई जाने के भी बाद भी हर जन्माष्टमी पर दिल्ली में होते थे। यहां पर वे अपने इष्ट मित्रों के साथ नई सड़क में जन्माष्टमी पर लगने वाली झांकियों में जाकर भजन सुनाते थे। मुकेश के घर के बाहर कोई पत्थर वगैरह नहीं लगा हुआ ताकि उनके चाहने वाले कभी इधर आ सकें। लाला हरदयाल के नाम पर हरदयाल लाइब्रेयरी है।

इस बीच, आपने देखा होगा कि एक छोटी सी सड़क हरीशचंद्र माथुर लेन मिलती है कस्तूरबा गांधी मार्ग पर। दिलचस्प है कि इन माथुर साहब को अपने माथुर अपना नहीं मानते। वे तीसरी लोकसभा के राजस्थान से सदस्य थे।

बहरहाल, पुरानी दिल्ली से बहुत सारे माधुर परिवारों ने निकलकर दरियागंज में भी अपने आशियाने बनाए। इधर के सी.डी माथुर और के.एल. माथुर 50 और 60 के दशकों में दिल्ली क्रिकेट के आतिशी बल्लेबाज हुआ करते थे। ये दोनों दरियागंज जिमखाना से खेलते थे। इन दोनों की वजह से ही हिंदू कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी की क्रिकेट में सेंट स्टीफंस कॉलेज के अभेद्य किले में सेंध लगा सका। इसी तरह दिल्ली किकेट को दशकों राम प्रकाश मेहरा उर्फ लाटू शाह के साथ एमबीएल माथुर चलाते रहे। गौर करें कि दिल्ली के बहुत से माथुर अपना सरनेम एंडले भी लगाते हैं। इसलिए आपको हर माथुर कुनबे में कुछ एंडले भी मिलेंगे। वैसे माथुर और एंडले दिल्ली की अदालतों में छाए हुए हैं।

नहीं चलना धारा के साथ

हाँ माना
कि बहती धारा
सबको भाती  है
वह ले चलती है
अपने भीतर
कई सुनहरे पल
अपनी यात्रा में
सबके साथ
उसकी मंजिल
भले ही
आसान
और पास होती जाती है
लेकिन खोती जाती है
अपनी पहचान
हर अगले पड़ाव पर।

मेरे अंदर की महत्त्वाकांक्षा
मुझे रोक देती है
बहने से
अपना मूल
अपना अस्तित्व
जल्द ही खोने से
शायद मेरा वर्तमान
या भविष्य
यहीं थाम देना चाहता है
मन के भीतर उमड़ती
अजीब सी हलचल को
वजह जो भी हो
मुझे पसंद है
मेरे  'मैं' का हाथ
इसलिए न चला  हूँ
न ही चलूँगा
धारा के साथ ।

-यशवन्त माथुर ©
24/04/2020

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