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30 April 2020

खाली पन्ने

कभी-कभी 
आँखों के सामने 
ये खाली पन्ने 
बाट जोहते रहते हैं 
कि कोई कलम 
समय रहते 
उनकी सुध ले ही ले। 
 
ये खाली पन्ने 
कभी शांत बैठे रहते हैं 
कभी हवा के हर झोंके के साथ 
मिलाते हुए ताल 
बड़बड़ाते रहते हैं 
बताते रहते हैं 
अनचाहे निर्वासन की 
मजबूरी में 
न लिखी जा सकने वाली 
कहानी और 
अपना हाल। 
 
काश!
इन खाली पन्नों का हर कोना 
अमिट स्याही और 
शब्दों से आबाद रह कर 
गर बता पाता 
बनती-बिगड़ती सभ्यताओं की दास्तान 
तो क्या हम 
और हमारा इतिहास 
वर्तमान जैसा होता ?
या हम निकल ही नहीं पाते बाहर 
भूत के हर निकास पर बने 
समय के चक्रव्यूह से ?

-यशवन्त माथुर ©
30/04/2020

29 April 2020

कुछ लोग-50

वर्षों से
जीवन का हिस्सा बने
कुछ लोग
खोखला करने का
मौका पाते ही
बन जाते हैं
ऐसी दीमक
जो भीतर ही भीतर
भेदती जाती है
अंग-प्रत्यंग
और हमें पता ही नहीं चलता
क्योंकि हम
आँखें मूँद कर
करते रहते हैं विश्वास
सच जैसे दिखने वाले
उनके सफेद झूठ पर।

हमें बचना चाहिए
ऐसी दीमकों के
कुप्रहार से ..
हमें करना चाहिए
पहले ही कोई उपाय
कि पनप ही न पाएं
पल ही न पाएं
नहीं तो
सच सामने आते-आते
हो चुकती है इतनी देर
कि सिर्फ  बाकी रहते हैं
अवशेष
धूल में मिल कर
कहीं उड़ चुके
विश्वास के।

-यशवन्त माथुर ©
29/04/2020

28 April 2020

हिन्मुश्चियन (Hinmustian) हूँ मैं

कौन हूँ मैं
अक्सर लोग पूछते हैं
मेरी जाति, मेरा धर्म बूझते हैं
जैसे यह कोई पहेली हो
जैसे यह जानना बहुत जरूरी हो
ताकि वो सहज हो सकें
मेरे इंसानी चेहरे-मोहरे
रंग-रूप और नस्ल से
या मुझे ही सहज कर सकें
अपने पूर्वाग्रही
अक्स से।

मैं खुद भी
दीवार पर लगे आईने में
खुद को देखकर भी
यही पूछता हूँ
कि इस देह
और मन के सिवा
क्या कुछ और भी हूँ मैं ?
आखिर कौन हूँ मैं ?

आत्ममंथन के कई दिनों
और रातों के बाद
स्वप्नों में खुद से कही बातों के बाद
निष्कर्ष निकला यही
कि सब कुछ हूँ -
हिन्दू हूँ-
मुस्लिम-सिख और
क्रिश्चियन भी हूँ मैं
हिन्मुश्चियन (Hinmustian) हूँ मैं ।

-यशवन्त माथुर ©
28/04/2020

27 April 2020

मानता हूँ

मानता हूँ 
कि मेरे शब्द 
बहुत साधारण हैं 
ये साहित्यिक नहीं 
न ही इनमें दिखता है 
काव्य का सौन्दर्य और 
व्याकरण। 

ये शब्द 
सिर्फ आकार हैं 
उन विचारों और 
बातों के 
जो मन में उमड़ती रहती हैं 
कुछ-कुछ कहती रहती हैं 
और मैं 
घूम-फिर कर 
अपनी सीमित शब्दावली को 
उलट-पुलट कर 
सिर्फ दोहराता ही रहता हूँ। 

यह गद्य है या पद्य 
मैं खुद नहीं जानता हूँ 
स्वाभाविक है 
प्रश्न चिह्नों का लगना 
यह मानता हूँ।  

-यशवन्त माथुर ©
27/04/2020

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