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10 March 2021

दो शब्द ...

दो शब्द... 
सिर्फ दो शब्द 
हम लिखे देखते हैं 
किसी पुस्तक की 
प्रस्तावना के शीर्षक में... 
या साक्षी बनते हैं आग्रह के 
जो किसी मंच संचालक द्वारा 
किया जाता है 
किसी सभा के 
मुख्य अतिथि से ... 
लेकिन क्या 
दो शब्द 
सिर्फ दो शब्द ही होते हैं?
क्या दो शब्दों में 
हम समेट सकते हैं 
भावनाओं का विस्तार 
आदि और अंत?
शायद नहीं...
नहीं... बिल्कुल नहीं 
क्योंकि.. दो शब्द 
सिर्फ दो शब्द मात्र ही नहीं होते 
क्योंकि... इनमें समाई होती है 
समुद्र की अथाह गहराई 
रेगिस्तान की रेत 
दलदली धरती 
सूरज की रोशनी 
पूर्णिमा और मावस की 
अनगिनत उजली-स्याह रातें 
जिनके दो शब्दों में ढलते ही 
आकार लेता है 
एक या दो पृष्ठों का 
अतीत और वर्तमान.. 
जिसके उपसंहार में 
रख दी जाती है 
भावी इतिहास की नींव 
और उसकी 
पहली ईंट। 

-यशवन्त माथुर©
10032021

09 March 2021

.......है तो मुमकिन है

वह चाहे तो होली को दीवाली,
दीवाली को होली बोल दे।

इतिहास की जिल्द बंधी किताब के,
सारे पन्ने खोल दे।

वह चाहे तो भाषा के सारे मानक गिराकर,
खुद को खुद ही के तराजू पर तोल दे।

उसका सपना आधुनिक को प्राचीन बनाकर,
अंगीठियों के दौर में पहुंचाके सब धुंए में उड़ाना है।

वह जोड़ने की बात करता तो है, लेकिन,
टुकड़ों में बांटकर उसे दोस्तों का जहां बनाना है।

उसे नहीं मतलब कि सालों पहले जो बना तो क्यों बना, 
मेहनत की जमा पूंजी कुतर्कों से बेचते जाना है। 
 
और एक हम हैं कि बस दो रंगों में ही उलझ कर,
तय कर बैठे हैं कि उसी के जाल में फंसते ही जाना है।

-यशवन्त माथुर©
09032021

05 March 2021

वर्तमान महामारी के संदर्भ में फाइज़र की अजब-गजब शर्तें: गिरीश मालवीय

वर्तमान महामारी को लेकर इस समय दो धारणाएँ बनी हुई हैं। एक धारणा इसे वास्तविक महामारी मानती है, वहीं दूसरी धारणा इसे सिर्फ एक राजनीतिक अवसरवादिता के रूप में देखती है। बहरहाल अभी हाल ही में फ़ाइज़र ने कुछ देशों के सामने वैक्सीन की आपूर्ति हेतु कुछ अजब-गजब शर्तें रखी हैं, जिनके बारे में गिरीश मालवीय जी ने आज एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी है, जिसे साभार यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है-

दुनिया की सबसे बड़ी ओर मशहूर फार्मा कम्पनी फाइजर ने अपनी कोरोना वेक्सीन को ब्राजील अर्जेंटीना जैसे लैटिन अमेरिकी देशो को देने के लिए जो शर्तें लगाई हैं उसी से समझ आता है कि कोरोना के पीछे कितने खतरनाक खेल चल रहे हैं। 

लोग चिढ़ते हैं जब कोरोना को मैं एक राजनीतिक महामारी कहता हूं।  दअरसल सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारा नेशनल ओर इंटरनेशनल मीडिया पूरी तरह से कोरोना के पीछे से रचे जा रहे अंतराष्ट्रीय षणयंत्र का हिस्सा बन चुका है, वह इन बड़ी फार्मा कम्पनियों के साथ मिला हुआ है, अगर कही भी गलती से भी उनके खिलाफ कोई खबर आ जाए तो वह पूरी कोशिश करता है उस खबर को दबाने की। 

यह पोस्ट जिस लेख का सहारा लेकर लिखी गयी है वह 23 फरवरी को 'द ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म' द्वारा प्रकाशित किया गया था, आश्चर्य की बात है बेहद प्रतिष्ठित ग्रुप द्वारा प्रकाशित की गयी इस खबर को दबा दिया गया। 

निष्पक्ष खबरें प्रकाशित करने का डंका बजाने वाले बीबीसी ओर NDTV जैसे मीडिया समूह ने भी अगले 9 दिनों तक इस पर कोई बात करना उचित नही समझा।  मजे की बात यह है कि जी न्यूज जैसी संस्था ने यह खबर कल फ्लैश की है वो भी मोदी जी की बड़ाई करते हुए। 

इस लेख में बताया गया है कि फाइजर ने कोरोना वेक्सीन को सप्लाई करने के लिए जो बातचीत शुरू की है उसमें फाइजर ने लैटिन अमेरिकी देशों को वेक्सीन के लिए ब्लैकमेल करते हुए अपने कानून तक बदलने पर मजबूर कर दिया. उन्हें "धमकाया" तक गया है। 

वेक्सीन सप्लाई के बदले कुछ देशों को संप्रभु संपत्ति,जैसे- दूतावास की इमारतों और सैन्य ठिकानों को किसी भी कानूनी कानूनी मामलों की लागत के खिलाफ गारंटी के रूप में रखने के लिए कहा है। 

फाइजर कंपनी ने अर्जेंटीना की सरकार से कहा कि अगर उसे कोरोना की वैक्सीन चाहिए तो वो एक तो ऐसा इंश्‍योरेंस यानी बीमा खरीदे जो वैक्सीन लगाने पर किसी व्यक्ति को हुए नुकसान की स्थिति में कंपनी को बचाए. यानी अगर वैक्‍सीन का कोई साइड इफेक्‍ट होता है, तो मरीज को पैसा कंपनी नहीं देगी, बल्कि बीमा कंपनी देगी।  जब सरकार ने कंपनी की बात मान ली, तो फाइजर ने वैक्सीन के लिए नई शर्त रख दी और कहा कि इंटरनेशनल बैंक में कंपनी के नाम से पैसा रिजर्व करे।  देश की राजधानी में एक मिलिट्री बेस बनाए जिसमें दवा सुरक्षित रखी जाए।  एक दूतावास बनाया जाए जिसमें कंपनी के कर्मचारी रहें ताकि उनपर देश के कानून लागू न हों। 

ब्राजील को कहा गया कि वह अपनी सरकारी संपत्तियां फाइजर कंपनी के पास गारंटी की तरह रखे,ताकि भविष्य में अगर वैक्सीन को लेकर कोई कानूनी विवाद हो तो कंपनी इन संपत्तियों को बेच कर उसके लिए पैसा इकट्ठा कर सके। ब्राजील ने इन शर्तों को मानने से मना कर दिया है। 

फाइजर 100 से अधिक देशों के साथ वैक्सीन की डील कर रहा है।  वह लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में नौ देशों के साथ समझौते की आपूर्ति कर रहा है: चिली, कोलंबिया, कोस्टारिका, डोमिनिकन गणराज्य, इक्वाडोर, मैक्सिको, पनामा, पेरू, और उरुग्वे। उन सौदों की शर्तें अज्ञात हैं।

'द ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म' से जुड़े पत्रकारों  ने इस संदर्भ में दो देशों के अधिकारियों से बात की, जिन्होंने बताया कि कैसे फाइजर के साथ बैठकें आशाजनक रूप से शुरू हुईं, लेकिन जल्द ही दुःस्वप्न में बदल गईं। 

इन देशों को अंतराष्ट्रीय बीमा लेने पर भी मजबूर किया गया 2009 -10 के एच1एन1 के प्रकोप के दौरान भी ऐसा ही करने के लिए  कहा गया था बाद में पता लगा था कि एच1 एन1 एक फर्जी महामारी थी। 
 
जिसे इस पोस्ट पर संदेह हो वो लिंक में 'द ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म' की साइट पर प्रकाशित लेख पढ़ सकता है। लिंक निम्नवत हैं-

04 March 2021

वो दिन लौट के आएंगे......

बोल  निराशा के, कभी तो मुस्कुराएंगे।  
जो बीत चुके दिन, कभी तो लौट के आएंगे।  

चलता रहेगा समय का पहिया, 
होगी रात तो दिन भी होगा।  
माना कि मावस है कई दिनों की, 
फिर अपने शवाब पे पूरा चाँद भी होगा। 

आज काँटे हैं, कल इन्हीं में फूल खिल जाएंगे। 
ये कुछ पल की ही बात है, वो दिन लौट के आएंगे।

-यशवन्त माथुर©
04032021

27 February 2021

हो उठता है......

क्यों दिल कभी यूं बेचैन हो उठता है,
रात ख्वाबों में छोड़ सुबह में खो उठता है। 

ये उजला फलक तुम्हारी रूह की तरह है,
तकता है एकटक तमन्ना छोड़ उठता है।

मेरा विषय नहीं है प्रेम फिर भी क्यों इन दिनों, 
पलकों की कोर पे ओस का जमना हो उठता है। 

बन कर सैलाब गुजरती है जब मिलने को समंदर में,
लबों के ढाल का मुकद्दर जवां हो उठता है।

जा रहा है वसंत मिलने को जेठ की दोपहरी से,
मन की देहरी को तपन का एहसास हो उठता है।

न था जो शायर और न ही होगा कभी,
बेमौसम ही शब्दों का वो पतझड़ हो उठता है।

-यशवन्त माथुर©
27022021

21 February 2021

धर्म

'धारयति इति धर्मः'- 
जिसे धारण किया जाए 
वही धर्म है 
अच्छे कर्म करना ही 
जीवन का मर्म है 
लेकिन; 
ये शब्द 
और उनके वास्तविक अर्थ 
सदियों पहले 
खुद ही कहने के बाद 
अब हम भूलते जा रहे हैं 
भटकते जा रहे हैं, 
कई टुकड़ों में 
बँटते जा रहे हैं 
शायद इसलिए 
कि परस्पर विश्वास की 
मजबूत जड़ें 
पल-पल बहाए जा रहे 
झूठ के मट्ठे को सोख कर 
जर्जर करती जा रही हैं 
सृष्टि के आरंभ से 
गगन चूमते 
हरे-भरे पेड़ को 
जिसमें पतझड़ आ तो गया है 
लेकिन 
पुनर्जीवन तभी होगा संभव 
जब प्रेम के जल में 
सच का कीटनाशक मिला कर 
हम शुरू कर देंगे सींचना 
अपने वर्तमान से 
भविष्य को। 

-यशवन्त माथुर ©
21022021

14 February 2021

क्या होता है प्रेम ?

वो 
जो निर्दयी समाज के ताने-बाने में 
बुरी तरह फँसकर 
पंचायतों के चक्रव्यूहों में उलझ कर 
बलि चढ़ जाता है 
खोखले उसूलों की 
तलवारों से कट कर.... ?

या वो 
जिसे तमाम अग्नि परीक्षाओं से 
गुज़ारकर भी 
ठुकरा दिया जाता है 
एकतरफा करार दे कर 
मजबूर किया जाता है 
एकाकी हो जाने को....?

या फिर वो 
जिसे 'खास' चश्मे से देखकर 
हम सब उतार देते हैं 
अपनी गोरी-काली 
और मोटी-पतली नज़रों से... ?

प्रश्न 
यूं तो बहुत से हैं 
लेकिन सार सबका सिर्फ यही 
कि आखिर क्या होता है प्रेम....?

-यशवन्त माथुर ©
08022021

08 February 2021

एक घटना जिसे मीडिया ने छिपाया : गिरीश मालवीय

खबर वह होती है जो निष्पक्ष तरीके से सबके सामने आए और पत्रकारिता वह है जो जिसमें सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस हो। जिसमें कुछ भी छुपा न हो। लेकिन विगत कुछ वर्षों से बदलाव और विभाजन हर क्षेत्र में स्पष्टतः नजर आ रहा है तो ऐसे में कुछ खबरें अगर जानबूझ कर जन सामान्य के सामने से रोक दी  जाएँ  तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

ऐसी ही एक महत्त्वपूर्ण खबर जिसे मुख्यधारा के मीडिया द्वारा प्रमुखता नहीं दी गई, के बारे में श्री गिरीश मालवीय ने  कल (07 फरवरी को )अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में बताया है, जिसे साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-

हिंदी मीडिया ने राष्ट्रीय शर्म की एक घटना को पूरी तरह से छिपा दिया क्योंकि इसमें 'अडानी' का नाम हाइलाइट हो रहा था और किसान आंदोलन में अडानी वैसे ही अभी आम जनता के निशाने पर है। 

हम बात कर रहे हैं श्रीलंका द्वारा भारत के साथ किये गए ETC  यानी ईस्ट कंटेनर टर्मिनल के करार के रद्द किए जाने की......स्ट्रैटिजिक मोर्चे पर इस डील का रद्द होना भारत के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। 

भारत, श्रीलंका और जापान की सरकारों ने मई 2019 में एक त्रिपक्षीय ढांचे के रूप में कोलंबो पोर्ट के ईस्ट कंटेनर टर्मिनल के विकास और संचालन के लिए सहयोग के एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे .....ये करार श्रीलंका, भारत सरकार और जापान की सरकार के बीच था, जिसमें 51 फ़ीसदी हिस्सेदारी श्रीलंका की और 49 फ़ीसदी हिस्सेदारी भारत और जापान की होनी थी। 

भारत की मोदी सरकार ने किसी सरकारी कम्पनी से यह कांट्रेक्ट पूरा करने के बजाए अडानी को यह पूरा सौदा सौप दिया और घोषणा की गयी कि भारत की ओर से अडानी इस सौदे को पूरा करेगा, जबकि चीन जैसे बड़े देश भी इस तरह के कांट्रेक्ट अपनी सरकारी कंपनियों को ही देते हैं। 

मोदी सरकार यहाँ भूल गयी कि यह भारत नही श्रीलंका हैं यहाँ तो मोदी सरकार की यह दादागिरी चल जाती है कि हर बड़े कांट्रेक्ट अडानी को सौप दिये जाते हैं लेकिन मोदी सरकार का बस श्रीलंका की सरकार पर नही चल पाया। 

श्रीलंका की 23 ट्रेड यूनियंस ने इस तरह से पोर्ट डील का निजीकरण करने का विरोध किया ..........भारत की अडाणी समूह के साथ ECT समझौता सही नहीं है ऐसा भी यूनियंस ने आरोप लगाया......... दरअसल श्रीलंका में बंदरगाहों के निजीकरण के विरोध में एक मुहिम चल रही है. ट्रेड यूनियन, सिविल सोसाइटी और विपक्षी पार्टियाँ भी इस विरोध में शामिल हैं। 

जैसे विभिन्न परियोजनाओं में निवेश को लेकर अडानी समूह का भारत में विरोध होता है, वैसा ही श्रीलंका में भी हुआ, श्रीलंका बंदरगाह श्रमिक संघ के प्रतिनिधियों ने पिछले हफ्ते साफ साफ कह दिया कि वे अभी भी कोलंबो बंदरगाह के ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के अडाणी समूह के प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं...... निजीकरण का विरोध कर रहे ट्रेड यूनियन वालों के साथ  श्रीलंका की सिविल सोसायटी भी  आ गयी उसने भी पूरी तरह से श्रमिक संघो का साथ दिया और श्रीलंका की सरकार को झुकना पड़ा ओर करार रदद् कर दिया गया, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने कहा कि ईस्ट कंटेनर टर्मिनल में 100 फ़ीसदी हिस्सेदारी अब श्रीलंका पोर्ट अथॉरिटी (एसएलएपी) की ही होगी। 

श्रीलंका का प्रमुख अखबार कोलंबो टेलीग्राफ इस सौदे के अडानी एंगल के बारे में लिखा ....... 'ECT के 49% शेयरों को किसी भारतीय कंपनी को सौंपने के प्रस्ताव पर बहुत विवाद हुआ था।  एक नाम का उल्लेख किया गया था और इस नाम से जुड़े पिछले रिकॉर्डों की संदिग्ध प्रकृति के कारण इस मुद्दे की गंभीरता तेज हो गई थी।' 

अखबार का इशारा अडानी की ओर था, ऑस्ट्रेलिया में अडानी को दिलवाईं गयी  खदान की ओर था पिछले साल के आखिर में जब भारतीय टीम क्रिकेट शृंखला खेलने ऑस्ट्रेलिया गई थी तो पहले टेस्ट मैच में सिडनी में ऑस्ट्रेलियाई नागरिक अडानी की परियोजना के विरोध में बैनर लेकर मैदान में आ गए थे।

ऐसा नही है कि मोदी जी और अडानी के इस गठजोड़ की खबर दुनिया को नहीं है विश्व के प्रमुख आर्थिक अखबारों में इस गठजोड़ की आलोचना हो रही है पिछले महीने फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था  कि गौतम अडानी का बढ़ता व्यापारिक साम्राज्य आलोचनाओं का केंद्र बन गया है अडानी की नए करार करने की भूख और राजनीतिक पहुंच ये बात सुनिश्चित करती है कि वो आगे एक केंद्रीय भूमिका निभाने जा रहे हैं। 

कल एशिया के बड़े आर्थिक अखबार एशिया निक्केई ने अडानी ओर मोदी की एक साथ  हंसती हुई तस्वीर लगाकर हेडिंग दिया 'Modi risks turning India into a nation of gangster capitalists'. 
 
कितनी शर्म की बात है, पूरी दुनिया मे भारत के इस क्रोनी केपेटेलिज्म के सबसे बड़े उदाहरण को बेनकाब किया जा रहा है लेकिन यहाँ सब उस पर पर्दा डालने की कोशिश में जुटे हुए हैं। 

निम्न लिंक्स भी देखें-




05 February 2021

आया नहीं बसंत कि बस.......

छायावाद 
हर कलम से 
कागज पर छपने लगा 
आया नहीं बसंत 
कि बस प्रेम दिखने लगा। 

कोई राधा, कोई मीरा 
कोई गोपियों की बात करता है 
कोई संयोग में रमा-पगा 
कोई वियोगी सा 
व्याकुल लगता है। 

किसी को दिखती है 
पीली बहार 
हर तरफ बिखरी हुई सी 
कोई कोयल के सुरों में खोकर 
गुलाबों को सूँघता है। 

लेकिन 
क्या सिर्फ प्रेम ही विषय है 
आज के इस दौर का ?
जरा उसको भी देख लो 
जो अपने हक के लिये लड़ने लगा। 

आया नहीं बसंत 
कि बस प्रेम दिखने लगा। 

-यशवन्त माथुर©
05022021

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