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21 May 2021

महामारी के बीच लोगों पर एक और वार:मधुरेन्द्र सिन्हा

एक तरफ देश महामारी से जूझ रहा है वहीं दूसरी तरफ महँगाई इस कदर आसमान छू रही है कि मध्य वर्ग का घर चलाना दुश्वार हो गया है। लॉकडाउन की वजह से जहाँ दिहाड़ी मजदूर भूखों मरने के कगार पर हैं वहीं शासन-प्रशासन के कर्ता-धर्ता मूक रह कर मौत की एक और त्रासद लहर के आने का जैसे इंतजार ही कर रहे हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम के कुछ विशेष प्रावधानों ( जिनमें कुछ मूलभूत अनाजों और अन्य उत्पादों की जमाखोरी पर प्रतिबंध था) के हटाए जाने या उनमें ढील देने का असर अब सामने आने लगा है।
 
नवभारत टाइम्स के आज के अंक में प्रकाशित मधुरेन्द्र सिन्हा जी का आलेख इसी समस्या की ओर इशारा करता है जो संकलन की दृष्टि से साभार यहाँ प्रस्तुत है- 


महामारी के बीच लोगों पर एक और वार

पिछले दो महीनों से बढ़ रही महंगाई इस महीने ग्यारह साल के उच्चतम बिंदु पर जा पहुंची है। रोजमर्रा इस्तेमाल आने वाले सामान के दाम बेतहाशा बढ़ गए हैं, जिससे महामारी से जूझ रहे लोगों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। कोविड के कारण लाखों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं और करोड़ से भी ज्यादा लोग बेरोजगार हैं। मिडल क्लास का बजट चारों खाने चित्त हो गया है तो कम आय वर्ग के लोगों की तो जान सांसत में आ गई है। आंकड़े बता रहे हैं कि अप्रैल महीने में थोक सामानों की इन्फ्लेशन दर 10.5 प्रतिशत पर जा पहुंची। इससे पहले साल 2010 के अप्रैल में जब यूपीए की सरकार थी, तो महंगाई इस ऊंचाई पर पहुंची थी। इसी वजह से तब सरकार की लोकप्रियता में कमी आनी शुरू हो गई थी।

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते भाव
रोजमर्रा के खाने-पीने के सामानों की कीमतों में अप्रैल महीने में 4.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। फलों, अंडों, मछलियों की कीमतें मार्च-अप्रैल में लगातार बढ़ती रहीं। इस दौरान पेट्रोल-डीजल के दाम तो बढ़े ही, मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के सामानों की कीमतों में 9 प्रतिशत का इजाफा हुआ। ईंधन और पावर ग्रुप में तो सालाना महंगाई 21.2 प्रतिशत तक बढ़ी, जिसके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की महंगाई को कसूरवार बताया जा रहा है। लेकिन रोजमर्रा की जिन चीजों की कीमतों में सबसे ज्यादा इजाफा हुआ वह है खाने वाला तेल। इसकी कीमतें अभूतपूर्व स्तर पर जा पहुंचीं। गरीबों के खाने में इस्तेमाल होने वाला सरसों तेल 200 रुपये प्रति लीटर की ओर जा पहुंचा है। महाराष्ट्र-गुजरात में खाना बनाने में काम आने वाला मूंगफली का तेल सवा दो सौ रुपये तक पहुंच गया है। इसे स्वाभाविक नहीं माना जा सकता क्योंकि देश में तिलहन की पैदावार लगातार बढ़ती जा रही है। इस बार भी सरसों की बंपर फसल हुई है। इसके बावजूद बड़े कारखानेदारों और सटोरियों ने कीमतें आसमान पर पहुंचा दी हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा खाद्य तेल उत्पादित करता है और सबसे ज्यादा खपत भी करता है। इसलिए यहां कीमतें बढ़ने पर बाहर से कोई राहत नहीं मिल पाती।

महामारी से निपटने में उलझी सरकार का इस ओर ध्यान ही नहीं है। हालत यह है कि खाने के तेलों में आज अरबों रुपये का सट्टा चल रहा है लेकिन न तो केंद्र सरकार कुछ कर पा रही है और न ही राज्य सरकार। इसके पीछे इंटरनैशनल मार्केट में पाम ऑयल के बढ़ते दामों की भूमिका बताई जा रही है। हालांकि भारत में पाम ऑयल के उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, फिर भी हम बहुत बड़े पैमाने पर इसका आयात करते हैं। इसकी कीमतें बढ़ने से साबुन के दाम में 5-7 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो गई है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। एफएमसीजी कंपनियां आने वाले समय में साबुन, ब्यूटी प्रॉडक्ट्स और खाने वाले चिप्स की कीमतें 10 से 13 प्रतिशत तक बढ़ा सकती हैं। सरकार ने पाम ऑयल के आयात को घटाने के इरादे से उस पर कुल 35.75 प्रतिशत का टैक्स और सेस लगा दिया है। इसका असर ठीक-ठीक क्या होता है यह देखना पड़ेगा। आम तौर पर ऐसे मामलों में होता यही है कि आयात तो घटता नहीं, सरकार की आमदनी जरूर बढ़ जाती है। दिसंबर 2020 से इसका आयात लगातार बढ़ रहा है। सबसे खतरनाक बात यह है कि इसकी मिलावट सरसों और अन्य खाद्य तेलों में भी हो रही है।

देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसका एक बड़ा कारण है केंद्र और राज्य सरकारों का रेवेन्यू कलेक्शन ड्राइव। दोनों सरकारें जबर्दस्त टैक्स वसूली कर रही हैं। हालत यह है कि 36 रुपये का कच्चा तेल डीजल बनकर दिल्ली में 83 रुपये में बिक रहा है। इसमें 31 रुपये 80 पैसे एक्साइज ड्यूटी है और 12.19 रुपये का वैट। डीजल की महंगी होती कीमतों ने देश में महंगाई बढ़ाई है, इसमें कोई शक नहीं है। इससे माल ढुलाई की दरें बढ़ गई हैं, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को हो रहा है। उन्हें अपनी उपज मंडियों में भेजने के लिए पहले से कहीं ज्यादा भाड़ा देना पड़ रहा है। आलू-टमाटर जैसी सब्जियों को तो फेंकने की स्थिति आ गई है क्योंकि ढुलाई की लागत उनकी कीमत से कहीं ज्यादा है। सरकार एक ओर किसानों की बात करती है और उनके खाते में पैसे भी भेजती है, लेकिन इस ओर उसकी नज़रें नहीं जा रही हैं। कंपनियों के लिए भी बढ़ा हुआ भाड़ा चुकाना भारी पड़ रहा है क्योंकि देश के बड़े हिस्से में लॉकडाउन है और सामानों की आवाजाही कम हो रही है।

मांग में कमी का खतरा
सरकार को रेवेन्यू बढ़ाने के लिए डीजल-पेट्रोल पर टैक्स बढ़ाने का यह तरीका बदलना होगा। यह पुराने कंजरवेटिव इकॉनमिक्स का हिस्सा है। इससे इकॉनमी को ही चोट पहुंचती है। बढ़ी हुई कीमतों के कारण लोग सामान खरीदने से कतराते हैं। दूसरे शब्दों में, इससे मांग में कमी आती है, जिसका परिणाम यह होता है कि मैन्युफैक्चरिंग उद्योग की गति धीमी पड़ जाती है। कुल मिलाकर इससे बाज़ार में धन का प्रवाह धीमा होता है और रोजगार में कमी आने का खतरा मंडराने लगता है। जैसा कि हमने 2020 के अप्रैल में देखा था।

समय आ गया है कि सरकार को तेलों और अन्य रोजमर्रा की चीजों के दामों पर अंकुश लगाना होगा यानी फूड इन्फ्लेशन मैनेजमेंट पर जोर देना होगा। वरना इसके गंभीर परिणाम कई स्तरों पर भुगतने होंगे।

-मधुरेन्द्र सिन्हा©

19 May 2021

बेमौसम......

बेमौसम की बारिश, बेमौसम इंसान।
बेमौसम में भीग रहीं, फसलें बेईमान।

बेमौसम महंगाई ने, छेड़ी ऊंची तान।
बेमौसम बीमारी में, फंसी हुई है जान।

बेमौसम क्या करूं,अपने मन की बात।
बेमौसम  दिन है ऐसा, जैसे गहरी रात।
 
-यशवन्त माथुर©
19052021

18 May 2021

कोविड के इस असर की तो बात ही नहीं हो रही: जयंती लाल भंडारी


आज के नवभारत टाईम्स में प्रबुद्ध अर्थशास्त्री श्री जयंती लाल भंडारी का एक महत्त्वपूर्ण आलेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने लॉकडाउन के चलते उत्पन्न हुए रोजगार संकट पर तर्कसंगत प्रकाश डाला है। 
संकलन की दृष्टि से यह आलेख साभार यहाँ प्रस्तुत है- 

कोविड के इस असर की तो बात ही नहीं हो रही
कोरोना की दूसरी लहर के बीच देश में आर्थिक, औद्योगिक, रोजगार के मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ने और स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के चरमरा जाने से मध्यम वर्ग की मुश्किलें बढ़ गई हैं। जहां सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) और स्व-रोजगार करने वाले मध्यम वर्ग के लोग अपने कारोबार पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव को लेकर चिंतित हैं, वहीं नौकरीपेशा आमदनी घटने जैसी परेशानियां झेल रहे हैं। अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक महामारी के कारण आए आर्थिक संकट से वर्ष 2020 के दौरान भारत में मध्यम वर्ग के लोगों की संख्या 9.9 करोड़ से घटकर 6.6 करोड़ रह गई। मध्यम वर्ग में उन लोगों को माना गया है, जो 10 डॉलर से 20 डॉलर यानी करीब 700 रुपये से 1500 रुपये प्रतिदिन कमाते हैं।

पाबंदियों का प्रभाव
इसमें दो मत नहीं कि पिछले साल आई कोरोना की पहली लहर ही मध्यम वर्ग की आमदनी काफी घटा चुकी थी। मध्यम वर्गीय परिवारों पर कर्ज का बोझ भी बढ़ा है। ऐसे में कोरोना की दूसरी लहर के प्रभावों को लेकर चिंता और बढ़ जाती है। खासतौर पर कोविड के इलाज के लिए जिस तरह से पैसा खर्च करना पड़ रहा है, उससे बड़े पैमाने पर मध्यम वर्गीय लोगों की बचत में सेंध लगी है। उधर, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2021 की तुलना में अप्रैल 2021 में देश ने 75 लाख नौकरियां गंवाई हैं। इसके कारण बेरोजगारी दर बढ़ी है। खासकर संक्रमण बढ़ने के साथ कई राज्यों में लॉकडाउन जैसी पाबंदियां लगाए जाने से आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। इससे अप्रैल 2021 में बेरोजगारी दर चार महीने के सबसे ऊंचे स्तर 8 प्रतिशत पर पहुंच गई। शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 9.78 प्रतिशत है तो ग्रामीण क्षेत्रों में 7.13 प्रतिशत। इससे पहले, मार्च 2021 में बेरोजगारी दर 6.50 प्रतिशत थी और स्वाभाविक ही अप्रैल की तुलना में ग्रामीण और शहरी दोनों जगह यह दर कम थी।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कोरोना के दूसरे घातक संक्रमण के बीच फिलहाल रोजगार के मोर्चे पर स्थिति उतनी बुरी नहीं है, जितनी कि 2020 में पहले देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान देखी गई थी। उस समय बेरोजगारी दर 24 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह तथ्य भी उभरकर सामने आ रहा है कि कोरोना की दूसरी लहर को नियंत्रित करने के लिए देशव्यापी कठोर लॉकडाउन के बजाय प्रदेश स्तर की पाबंदियां लगाने की जो नीति अपनाई गई, उससे उद्योग-कारोबार और रोजगार पर पहली लहर जैसा तीखा प्रभाव नहीं पड़ा है।

लेकिन मध्यम वर्ग के सामने कुछ अलग तरह की मुश्किलें जरूर दिखाई दे रही हैं। जहां वर्क फ्रॉम होम की वजह से टैक्स में छूट के कुछ माध्यम कम हो गए हैं, वहीं डिजिटल तकनीक पर निर्भरता के कारण ब्रॉडबैंड जैसे खर्चों में इजाफा हो गया है। मई 2021 की शुरुआत से ही वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल के साथ-साथ महंगाई बढ़ती दिखाई दे रही है। नतीजा यह कि इस समय मध्यम वर्ग के करोड़ों लोगों के चेहरे पर बच्चों की शिक्षा, रोजगार, कर्ज पर बढ़ते ब्याज और नियमित रूप से ईएमआई चुकाने की मजबूरी से जुड़ी चिंताएं साफ नजर आती हैं।

इसमें दो मत नहीं कि सरकार ने छोटे उद्योग-कारोबार से जुड़े मध्यम वर्ग की मुश्किलों को दूर करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। 5 मई को रिजर्व बैंक ने व्यक्तिगत कर्जदारों और छोटे कारोबारों के लिए कर्ज पुनर्गठन की सुविधा बढ़ाई है और कर्ज का विस्तार किया है, उससे जरूर राहत मिलेगी। इस नई सुविधा के तहत 25 करोड़ रुपये तक के बकाये वाले वे कर्जदार अपना लोन दो साल के लिए पुनर्गठित करा सकते हैं, जिन्होंने पहले मॉरेटोरियम या पुनर्गठन का लाभ नहीं लिया है। यह नई घोषित सुविधा 30 सितंबर, 2021 तक उपलब्ध होगी। स्वास्थ्य क्षेत्र की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई ने 50,000 करोड़ रुपये की नकदी की व्यवस्था की है। इस योजना के तहत बैंक टीकों और चिकित्सकीय उपकरणों के विनिर्माण, आयात या आपूर्ति से जुड़े कारोबारियों को कर्ज दे सकेंगे। इसके अलावा बैंक अस्पतालों, डिस्पेंसरियों और पैथॉलजी लैब्स को भी कर्ज दे सकेंगे।

निसंदेह मध्यम वर्ग को मुश्किलों से निकालने के लिए उसकी क्रय शक्ति बढ़ाने वाले अधिक उदार कदम जरूरी हैं। सरकार ने पिछले वित्त वर्ष 2020-21 में कोरोना काल में मार्च से अगस्त के छह माह के लिए लोन मॉरेटोरियम दिया था। अब आरबीआई द्वारा एमएसएमई के कर्ज को एनपीए की श्रेणी में डालने के नियम आसान बनाने होंगे। एमएसएमई क्षेत्र में कर्ज को एनपीए मानने के लिए मौजूदा 90 दिन की अवधि को बढ़ाकर 180 दिन किया जाना लाभप्रद होगा। आपात कर्ज सुविधा गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) को आगे बढ़ाने या उसे नए रूप में लाने जैसे कदम भी राहतकारी होंगे।

नया डायरेक्ट टैक्स कोड
इस समय मौजूदा वित्त वर्ष 2021-22 के बजट के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग-कारोबार, शेयर बाजार और बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाने की जरूरत है। यह भी उल्लेखनीय है कि नवंबर 2017 में नई प्रत्यक्ष कर संहिता के लिए अखिलेश रंजन की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स द्वारा विभिन्न देशों की प्रत्यक्ष कर प्रणालियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू प्रत्यक्ष कर संधियों का तुलनात्मक अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट 19 अगस्त, 2019 को सरकार को सौंपी जा चुकी है। ऐसे में अब रंजन समिति की रिपोर्ट के मद्देनजर नए डायरेक्ट टैक्स कोड और नए इनकम टैक्स कानून को मूर्त रूप देकर छोटे आयकरदाताओं व मध्यम वर्ग को नई राहत दी जा सकती है। 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के मद्देनजर इस समय स्वास्थ्य क्षेत्र पर जो सावर्जनिक व्यय जीडीपी का करीब 1 फीसदी है, उसे बढ़ाकर ढाई फीसदी तक ले जाने से मध्यम वर्ग को स्वास्थ्य संबंधी खर्चों में बचत के रूप में बड़ी राहत मिलेगी।

-जयंती लाल भंडारी©

12 May 2021

लॉकडाउन

मिले दवा  न मिले दवा 
वो गुरबत से दबा दबा 
खुली छत के कमरे में 
बंद पलकों में है दुआ 

उसके बच्चे भूखे-प्यासे 
माँ के आँसू पी-पी कर 
पिता की ताला-बंदी में 
रहना कठिन यूँ जी कर  

ककहरा को भूल काल 
अब क्या लिख लाया है 
हर पन्ने पर एक हर्फ़ ही 
कुछ समझ न आया है । 

-यशवन्त माथुर©
12052021

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