23 April 2026

डायरी

याद आती है 
वो एक डायरी 
जो बचपन की 
साथी थी 
जिसके हर पन्ने पर 
लिखी थीं 
कुछ बातें 
यूं ही अकेले में 
खुद से कुछ कहते हुए 
शब्द से शब्द को 
जोड़ते हुए 
दिवा स्वप्नों में 
खोते हुए। 
उस डायरी में 
रचा-बसा 
हर एक अक्षर 
खामोशी की आवाज़ बनकर 
भावी ताने-बाने बुनकर 
एकाकीपन को 
देकर नयी ऊर्जा 
बन जाता था 
जीवनी शक्ति। 
आज फिर 
इतने बरस बाद 
लाल आवरण वाली 
भूली बिसरी 
पंचतत्व में विलीन हो चुकी 
वह डायरी 
स्वप्न में आई 
मुस्कुराई 
और  बोली -
कि वह लेना चाहती है 
पुनर्जन्म 
होना चाहती है साकार 
टूटी निब वाली 
मेरी कलम के साथ। 

~यशवन्त माथुर©
23042026

3 comments:

  1. सुंदर सृजन

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  2. बहुत सुंदर सृजन यशवंत जी

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  3. ये कविता पढ़कर मुझे सच में अपने बचपन के दिन याद आ गए। आपने उस डायरी को सिर्फ एक चीज नहीं, बल्कि एक सच्चे दोस्त की तरह दिखाया। हम जब छोटे होते हैं, तो अपनी हर छोटी-बड़ी बात उसी में लिखते हैं और दिल हल्का कर लेते हैं। बाद में हम बड़े होकर ये आदत छोड़ देते हैं।

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