याद आती है
वो एक डायरी
जो बचपन की
साथी थी
जिसके हर पन्ने पर
लिखी थीं
कुछ बातें
यूं ही अकेले में
खुद से कुछ कहते हुए
शब्द से शब्द को
जोड़ते हुए
दिवा स्वप्नों में
खोते हुए।
उस डायरी में
रचा-बसा
हर एक अक्षर
खामोशी की आवाज़ बनकर
भावी ताने-बाने बुनकर
एकाकीपन को
देकर नयी ऊर्जा
बन जाता था
जीवनी शक्ति।
आज फिर
इतने बरस बाद
लाल आवरण वाली
भूली बिसरी
पंचतत्व में विलीन हो चुकी
वह डायरी
स्वप्न में आई
मुस्कुराई
और बोली -
कि वह लेना चाहती है
पुनर्जन्म
होना चाहती है साकार
टूटी निब वाली
मेरी कलम के साथ।
~यशवन्त माथुर©
23042026
सुंदर सृजन
ReplyDeleteबहुत सुंदर सृजन यशवंत जी
ReplyDeleteये कविता पढ़कर मुझे सच में अपने बचपन के दिन याद आ गए। आपने उस डायरी को सिर्फ एक चीज नहीं, बल्कि एक सच्चे दोस्त की तरह दिखाया। हम जब छोटे होते हैं, तो अपनी हर छोटी-बड़ी बात उसी में लिखते हैं और दिल हल्का कर लेते हैं। बाद में हम बड़े होकर ये आदत छोड़ देते हैं।
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