28 March 2012
कभी कभी .........
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कभी कभी लगता है जैसे अपने जाल मे फंसा कर भूख वक़्त कर रहा हो शिकार भावनाओं का और कभी कभी ऐसा भी लगता है जैसे बुढ़ाती भावनाएँ आत...
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26 March 2012
'बीयर' है कि मानती नहीं
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मेरे एक बहुत ही अज़ीज़ पूर्व सहकर्मी और मित्र जो मेरे फेसबुक मित्र भी हैं ,आज उन्होने 'बीयर' पर अपना एक स्टेटस दिया है ( "The Fi...
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24 March 2012
रूप
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तुम से कहा था न मिलना मुझे अपने उसी रूप मे जो तुम्हारा है पर अफसोस मैं देख पा रहा हूँ वही रूप जिसे तुम देखते हो रोज़ आईने के सामने ...
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21 March 2012
कभी बड़ी मत होना
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आज फिर उसे देखा रोज़ की तरह आज भी वो खेल रही थी अपने घर के बाहर मैं उसे रोज़ देखता हूँ कभी कभी छेड्ता हूँ और वो जब दौड़ती है 'अं...
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17 March 2012
बदलाव
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कितनी जल्दी बदल जाते हैं दिन कितनी जल्दी बदल जाते हैं सपने अपेक्षाएँ ,कसमें ,वादे चित्र भी, चरित्र भी कभी ये मजबूरी होती है और कभी छल...
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15 March 2012
ये तस्वीरें
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रह रह कर मन के पर्दे पर उभर रही हैं कुछ तस्वीरें जो बरबस तैर रही हैं आँखों के सामने ये तस्वीरें दिन का ख्वाब हैं या सहेजी हुई कोई...
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11 March 2012
रंगा हुआ कैनवास
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सोचा था खाली पड़े इस कैनवास पर खींच दूँ कुछ आड़ी तिरछी रंगीन रेखाएँ वक़्त की पृष्ठभूमि पर उकेर दूँ जीवन का चित्र बना दूँ कुछ मुखौटे ...
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09 March 2012
क्यों फागुन चला आता है ? >> (वटवृक्ष पत्रिका के फरवरी 2012 -होली विशेषांक मे प्रकाशित )
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न रागों की पहचान मुझे न साज सजाना आता है हैं रस- छंद- अलंकार अबूझे न गीत बनाना आता है क्या होते सप्तरंग सुर संगीत,कोकिला ही जाने है ब...
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07 March 2012
क्या कहूँ
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सभी पाठकों को होली की अशेष शुभ कामनाएँ! है रंगों की मस्ती हर ओर क्या कहूँ मुरझाए फूलों का जी उठना क्या कहूँ मिठास भरी गुझिया का स्वाद...
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