26 April 2014
वह भी कुछ तप कर मुस्काए ...
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हँसिया-हथोड़ा चलाने वाला गर ऐसा पत्थर हो जाए संतुष्टि के फूलों जैसा वह भी कुछ तप कर मुस्काए ... वह दृश्य होगा सुकून भरा जब प...
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20 April 2014
वह रोज़ दिख जाता है.........
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वह रोज़ दिख जाता है कहीं न कहीं किसी न किसी के बनते मकान के बाहर फैली रेत और मौरंग से अपने सपनों को बनाते कभी मिटाते हुए ..... वहीं ...
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15 April 2014
आओ मतदान करें................अमित बैजनाथ गर्ग 'जैन'
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अम्मा भूखी है, बच्चे बिलख रहे हैं, काका रो रहा है, अंगारे सुलग रहे हैं सिसकती रूह को चुप कराने के लिए, अंधेरे में उजाले चमकाने...
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14 April 2014
बदलाव का दौर
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जब महका करता था हर गली कूंचा फूलों की खुशबू से और उस खुशबू को अपने आगोश में ले कर सुबह और शाम की ठंडी हवा फैला दिया करती थी पूरे मो...
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10 April 2014
अधिकार और कर्तव्य
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जो अधिकार है कभी कभी होता है वह भी कर्तव्य .... और जो कर्तव्य है कभी कभी होता है वह भी अधिकार .... फिर भी कुछ लोग नहीं कर पाते स...
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07 April 2014
आओ चलें
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लोक का त्योहार है आओ चलें तंत्र की यह पुकार है आओ चलें माना अलग विचार हैं आओ चलें धारा को जो स्वीकार है आओ चलें धूप या बरसात मे...
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04 April 2014
आपका मत अनिवार्य है....यशोदा अग्रवाल
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यशोदा दीदी के ब्लॉग से उनकी यह रचना ( http://4yashoda.blogspot.in/2014/04/blog-post_3.html ) बिना अनुमति यहाँ भी संकलित कर रहा हूँ। आ...
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02 April 2014
वक़्त के कत्लखाने में -5
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वक़्त के कत्लखाने में कैद जिंदगी कभी कभी देख लेती है उखड़ती साँसों की खिड़कियों के पर्दे हटा कर बाहर की दुनिया और हो जाती है हैरान झोप...
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01 April 2014
वक़्त के कत्लखाने में - 4
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टंगा हुआ है एक आईना वक़्त के कत्लखाने में देख कर जिसमें खुद का अक्स अक्सर गुनगुनाती है जिंदगी बीते दौर के नगमे जो सहेजे हुए हैं मन क...
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