29 September 2014
मैं 'देवी' हूँ-3 (नवरात्रि विशेष)
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ओ इन्सानों ! हर दिन न जाने कितनी ही जगह न जाने कितनी ही बार करते हो कितने ही वार कभी मेरे जिस्म पर कभी मेरे मन पर समझते हो सिर्फ...
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27 September 2014
मैं 'देवी' हूँ -2 (नवरात्रि विशेष)
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गूंज रहे हैं आज सप्तशती के अनेकों मंत्र हवा मे घुलती धूप-अगरबत्ती और फूलों की खुशबू के साथ अस्थायी विरक्ति का सफ़ेद नकाब लगाए झूमते...
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25 September 2014
मैं 'देवी' हूँ -1 (नवरात्रि विशेष)
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आज से शुरू हो गया है उत्सव गुणगान का मेरी प्राण प्रतिष्ठा का बिना यह समझे बिना यह जाने कि मिट्टी की इस देह में बसे प्राणों का मोल ...
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17 September 2014
शब्द मेरी धरोहर हैं
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शब्द ! जो बिखरे रहते हैं कभी इधर कभी उधर धर कर रूप मनोहर मन को भाते हैं जीवन के कई पलों को साथ लिये कभी हँसाते हैं कभी र...
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14 September 2014
भाषा
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भाषा माध्यम है वरदान है हरेक जीव को कुछ अपनी कहने का सबकी सुनने का कभी इशारों से कभी ज़ुबान से अपने कई रूपों से जीवन में रच बस कर...
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08 September 2014
सब सपने सच नहीं होते
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सुना था कुछ सपने बदलते हैं हकीकत में कभी कभी देते हैं न बयां होने वाली खुशी लेकिन यह काल कोठरी तमाम बदलावों और रूप परिवर्तनों के...
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01 September 2014
शब्दों की दुनिया
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जब देखता हूँ डायरी के भरे हुए पन्नों पर बिखरे हुए जज़्बातों को तो लगता है शब्दों की यह दुनिया कितनी विचित्र किन्तु सत्य है .... विच...
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23 August 2014
कुछ लोग -6
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पूर्वाग्रहों से घिरे हुए कुछ लोग सब कुछ जान समझ कर बने रहते हैं अनजान करते रहते हैं बखान अपनी सोच की चारदीवारी के भीतर की उसी ...
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18 August 2014
चलो कहीं चलें इन अँधेरों से निकल कर
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छोटी सी ज़िंदगी का बहुत लंबा है सफर चलो कहीं चलें इन अँधेरों से निकल कर कहीं जल रही है लौ स्याह तस्वीरों की आँखों में उलझे हैं जिनक...
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