28 June 2018
वक़्त के कत्लखाने में -13
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यूं ही समय के इस खालीपन में खुद से बातें करता हुआ अतीत के झरोखों से अपने आज को देखता हुआ कभी-कभी सोचता हूँ क्या रखा है धारा के सा...
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21 June 2018
ज़िंदगी धोखेबाज है
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क्या पता कल था किसका और किसका यह आज है ज़िंदगी धोखेबाज है। कल लिखे थे गीत सुनहरे कल क्या लिखा जाएगा। कोई कहेगा कर्कश स्वर में कोई सु...
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15 May 2018
सुनो ताज !
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ताज! सुना है तुम अब वैसे नहीं रहे जैसा मैं देखा करता था हाथीघाट* के सहारे चलते हुए यमुना के उस पार! तुम सूरज की तेज रोशनी म...
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10 May 2018
क्या लिखूँ?
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तूफाँ के हर मंज़र के बाद गिरे-पड़े दरख्तों का दर्द लिखूँ या इस गहराती गर्मी में कहीं का मौसम का सर्द लिखूँ क्या लिखूँ? सड़क किनारे सोते...
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01 May 2018
वो मजदूर का बच्चा है
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तन से मैला पर मन से सच्चा है गुरबत में जी कर भी खुद में अच्छा है वो मजदूर का बच्चा है। वो देखता है रोज़ नयी इमारतों को बनते किसी और क...
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28 April 2018
28 साल
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28 साल पहले, 28 अप्रैल 1990 को आगरा से प्रकाशित साप्ताहिक 'सप्तदिवा' में जब यह छपा था तब मैं लगभग 6 साल का था ( जिसे संपादक महोदय ...
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19 April 2018
कुछ बातें
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कुछ बातें अपनी शुरुआत से ही निकल पड़ती हैं अंतहीन मंज़िल की ओर पार करते हुए कई चाहे-अनचाहे रास्ते। .रास्ते जिन पर मिलते हैं कई सुनने...
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15 April 2018
खामोश नहीं रहेंगे
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सब खामोश हैं और सब खामोश ही रहेंगे जो अब तक बोलते थे बहुत कुछ कुछ भी नहीं कहेंगे। इस दौर में उतर रहे हैं कई ओढ़े हुए नकाब नकली...
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12 April 2018
यही पूजा है तो ......
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यही पूजा है कि जो आसिफा तुम्हारे साथ हुआ ? यही पूजा है कि जो निर्भया तुम्हारे साथ हुआ ? यही पूजा है कि जो भजन यहाँ पर गाए जाएँ ? य...
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