15 August 2018
अगर आज़ाद हैं हम तो क्यों .......
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अगर आज़ाद हैं हम तो क्यों इंसान बाज़ारों में बिकता है ? अगर आज़ाद हैं हम तो क्यों बचपन फुटपाथों पर दिखता है? अगर आज़ाद हैं हम तो क्यों ...
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05 July 2018
ऑफर,रिटर्न और एक्सचेंज .........
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जिंदगी के खुशनुमा पलों पर अगर चल रहा होता ऑफर एक के साथ एक या दो फ्री का तो कितना अच्छा होता थोड़ी देर को ही सही हर कोई कितना सच्चा...
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02 July 2018
काश! कि न होती ये बारिश
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काश! कि न होती ये बारिश तो न मन यूं भीगता न भीतर ही भीतर चीखता मुक्ति पाने को काले बादलों की तरह उमड़ते अनचाहे शब्दों से । हाँ ! ...
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28 June 2018
वक़्त के कत्लखाने में -13
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यूं ही समय के इस खालीपन में खुद से बातें करता हुआ अतीत के झरोखों से अपने आज को देखता हुआ कभी-कभी सोचता हूँ क्या रखा है धारा के सा...
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21 June 2018
ज़िंदगी धोखेबाज है
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क्या पता कल था किसका और किसका यह आज है ज़िंदगी धोखेबाज है। कल लिखे थे गीत सुनहरे कल क्या लिखा जाएगा। कोई कहेगा कर्कश स्वर में कोई सु...
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15 May 2018
सुनो ताज !
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ताज! सुना है तुम अब वैसे नहीं रहे जैसा मैं देखा करता था हाथीघाट* के सहारे चलते हुए यमुना के उस पार! तुम सूरज की तेज रोशनी म...
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10 May 2018
क्या लिखूँ?
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तूफाँ के हर मंज़र के बाद गिरे-पड़े दरख्तों का दर्द लिखूँ या इस गहराती गर्मी में कहीं का मौसम का सर्द लिखूँ क्या लिखूँ? सड़क किनारे सोते...
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01 May 2018
वो मजदूर का बच्चा है
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तन से मैला पर मन से सच्चा है गुरबत में जी कर भी खुद में अच्छा है वो मजदूर का बच्चा है। वो देखता है रोज़ नयी इमारतों को बनते किसी और क...
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28 April 2018
28 साल
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28 साल पहले, 28 अप्रैल 1990 को आगरा से प्रकाशित साप्ताहिक 'सप्तदिवा' में जब यह छपा था तब मैं लगभग 6 साल का था ( जिसे संपादक महोदय ...
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