25 December 2014

आया सेंटा आया सेंटा

आया सेंटा  आया सेंटा 
भर कर झोली लाया सेंटा 

लाल सफेद कपड़े पहन कर 
मुस्कुराता बन ठन कर चल कर 
जादू की छड़ी घुमाता सेंटा 
खुशियाँ खूब बिखराता सेंटा 

आया सेंटा आया सेंटा 
बन कर फरिश्ता आया सेंटा 

चॉकलेट टॉफी केक यहाँ है 
क्रिसमस ट्री की जगमग यहाँ है 
यीशु के गीत गाता सेंटा 
सबको खूब लुभाता सेंटा 

आया सेंटा  आया सेंटा 
मन को बहुत है भाया सेंटा 

पूरे साल कहीं छुपा है रहता 
उपहारों से झोली भरता 
बड़े दिन का जश्न मनाता सेंटा 
सबके दिल पर छाया सेंटा 

आया सेंटा  आया सेंटा
नयी सौगातें लाया सेंटा

-यशवन्त माथुर 

21 December 2014

ज़िंदगी यूं ही चलती है

रातों के बीतने के साथ
सूरज के निकलने के साथ
एक तारीख गुजरती है
एक तारीख सँवरती है
ज़िंदगी यूं ही चलती है ।

कैलेंडर के पन्ने बदलते  हैं
राहों के सुर बदलते  हैं
कोई कहानी बनती है 
कोई कहानी बिगड़ती है 
जिंदगी यूं ही चलती है। 

धारा के बहने के साथ 
बाधाओं पर तैरने के साथ 
मंज़िल जब आ मिलती है 
खुशी अशकों में मिलती है 
जिंदगी यूं ही चलती है।

~यशवन्त यश©

17 December 2014

वो नहीं बच सकेंगे दोज़ख की आग से

कुछ सोच कर ही
ऊपर वाले ने
बनाया होगा
बचपन ....
कुछ सोच कर ही
ऊपर वाले ने
दिया होगा
मासूम सा मन ....
कुछ सोच कर ही
दी होंगी
शरारतें
मुस्कुराहटें
और बे परवाह सी
जिंदगी ....
पर ये न सोचा होगा
कि एक दिन
उसके ही बनाए
कुछ कायर पुतले
उसके ही नाम पर
बिखरा देंगे
खूनी छींटे
और
यूं छलनी कर देंगे
तार तार कर देंगे
उस विश्वास को
जो अब तक
रहा है कायम ...
अनेकों दिलों में
जिसके बल पर
बंधी रही है
उम्मीद
जीवन के
हर मोड़ पर 
कुछ कर गुजरने की ....

मासूम बच्चों को
ढाल बना कर
अपने
नापाक अरमान लिए  ये कायर
कट्टरता
क्रूरता के गुमान में
भले ही
पा लें क्षणिक सुख
लेकिन
बरी न हो पाएंगे कभी
दोज़ख की आग से।

(पाकिस्तान में आतंकी हमले मे मारे गए सभी मासूम बच्चों को 
विनम्र श्रद्धांजली )

~यशवन्त यश©

16 December 2014

देखना नहीं चाहता कालिख को

बीते पलों की
कुछ बातें
कुछ यादें
बन कर
दबी रह जाती हैं
कहीं
किसी कोने में
वक़्त-बेवक्त 
आ जातीं हैं
अपनी कब्र से बाहर
देने लगती हैं
सबूत
खुद की
चलती साँसों का.....
उधेड़ देती हैं
परत दर परत
अनचाहे ही
सामने ला देती हैं
आदिम रूप
जिसे
खुद से ही
छिपाने से
न नफ़ा
न नुक्सान ही होता है .....
लेकिन
खुद के अक्स को
शीशे में 
इस तरह
नुमाया देख कर
शर्मिंदगी से
कुलबुलाता मन
दोबारा
जानना 
नहीं चाहता
देखना नहीं चाहता
सफेदी के
निचले तल पर
जमी और चिपकी हुई
कालिख को। 
 
~यशवन्त यश©

13 December 2014

वह सैनिक है

घर बार से
कहीं दूर
किसी रेगिस्तान की
रेतीली ज़मीन पर
या
बर्फ भरी
पर्वतों की
ऊंची चोटियों पर 
ठौर जमाए 
पीठ पर
भारी बोझ 
हाथ में हथियार
और निगाहों में
पैनापन लिए
वह
जूझता है 
मौसम की मार
और
दुश्मन के वार से
लेकिन
हिलता नहीं
शहादत के
अटल
दृढ़ संकल्प से  .....
उसका समर्पण
उसका तन
उसका मन
मातृ भूमि की
सरगम में 
डूबता उतराता हुआ
बहता चलता है
घर बार से
कहीं दूर
किसी
सीमा रेखा के भीतर 
हजारों हजार
दुआओं
और सलामों को
साथ लिए
जिसे गर्व होता है
खुद पर
वह
सैनिक है।

~यशवन्त यश©

10 December 2014

संभव हैं परिवर्तन

मैं या हम
कभी अकेले
कभी साथ
निकल चलते हैं
बाहर की ओर
देखने
घटना चक्र 
सृष्टि चक्र
जो घूम रहा है
अपनी पूर्वनिश्चित
धुरी पर 
तय परिपथ पर
जिससे पीछे हटना
बाहर निकलना
अब तक
संभव नहीं
लेकिन संभव हैं
अपार परिवर्तन
इसी सीमा के
भीतर
रिक्त स्थानों में
जहां
निर्वात के होते हुए भी
मैं या हम
देख सकते हैं
भविष्य के
वायु मण्डल को 
अपने 
अर्जित विज्ञान से।

~यशवन्त यश©

08 December 2014

फिर आयी एक नयी सुबह ......

बीते दिन की
बीत चुकी
यादों की
तस्वीर को
साथ लिए
फिर आयी
एक नयी सुबह 
हवा में
हल्की ठंडक
और ताजगी के साथ
उम्मीद भरी
सूरज की
किरणों से
मन की
कुछ
कहते हुए...

हो जाता है शुरू
इस सुबह का
इंतज़ार
हर दिन के
ढलने के साथ 
हर रात के
गहराने के साथ
मिटने लगते हैं
हताशा
निराशा के
बोझिल पल 
आस लिए
साथ लिए
एक रोशन
सुनहरी किरण
लो
फिर आयी
एक नयी सुबह।

~यशवन्त यश©

owo02122014

06 December 2014

नहीं पता बहते रहने का अर्थ

मैं
देखना चाहता हूँ
समुद्र को
और
उन उठती गिरती
लहरों को
जिनके बारे में
पढ़ा है
किताबों में
अखबारों में
जिन्हें देखा है
सिर्फ तस्वीरों में
कल्पना में
और कुछ सपनों में.....
मैं
छूना चाहता हूँ
उस नीले आसमान को
जो नीचे उतर आता है
साफ पानी के शीशे में
खुद को संवारते हुए
निहारते हुए
जो देखा करता है
बादलों का यातायात
पक्षियों के
गति अवरोधक
सूरज –चाँद-तारे
और न जाने कितने ही
वो अनगिनत पल
जो हैं कहीं दूर
मुझ मनुष्य की
कल्पना से ....
मैं
मिलना चाहता हूँ
ठंडी हवा की
गहराइयों में
घुल कर
छूना चाहता हूँ
खुद को
पाना चाहता हूँ
वह एहसास
जो
जीवन की दौड़ में
एक दूसरे को
पीछे छोडते
बीते हुए  
पलों को होता है....
इसलिए
मैं
देखना चाहता हूँ
समुद्र को
कहीं किनारे पर
खड़े हो कर
क्योंकि
धूल के गुबार भरे
इस सुनसान
मैदान में खड़े रह कर
अंत की
राह तकते हुए
मुझे
अब तक नहीं पता
जीवन के
बहते रहने का अर्थ ।

~यशवन्त यश©

03 December 2014

कुछ लोग -8

जीवन की इन राहों पर
भीड़ भरे चौराहों पर 
अक्सर
भटकते दिखते हैं
कुछ लोग
कुछ खोजते हुए
किसी को
तलाशते हुए ....
कभी उठा लेते हैं
ज़मीन पर गिरा
कोई कागज़ का पुर्जा
पढ़ने को
दिल में बसा
किसी खास का नाम  ....
कभी रोक कर
राह चलते इंसानों को
करते हैं
कोशिश
यादों के जाल में
उलझ चुके
किसी अपने के
अक्स को
पहचानने की 
उसके गले लग जाने की ....
कभी
उम्मीद से भरा
मुस्कुराता
और कभी
उदासी में डूबा
उतरा सा
चेहरा लिये
कभी
आँखों से
झलकती खुशी 
कभी
गम के सैलाब में
भीगते हुए
भटकते हुए
कुछ लोग
जीवन की इन राहों पर 
अक्सर मिल कर 
दिखा देते हैं 
चेहरा 
तस्वीर के
दूसरी तरफ का।

~यशवन्त यश©

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02 December 2014

यूं ही इसी तरह

उड़ते
वक़्त के
बंद दरवाजों पर
देकर
एक दस्तक
अक्सर
करता  हूँ
नाकाम सी
एक
कोशिश
कि
या तो
वह थम जाय
कुछ पल
करने को
कुछ बातें
या
ले चले
मुझे भी
अपने ही साथ
अपनी ही गति से
अपनी ही
अंतहीन
अनंत यात्रा पर....
लेकिन
यह
हो नहीं सकता 
क्योंकि
मैं
नहीं हो सकता
मुक्त
वक़्त के ही बुने हुए
चक्रव्यूह से
जिसकी
भूलभुलैया में
भटकते ही रहना है
आदि से
अनंत तक.....
यूं ही
इसी तरह।

~यशवन्त यश©
owo01122014 

01 December 2014

चलना है यूं ही चलना है....

कभी कदमों को
यूं ही थाम कर
कभी भविष्य को
थोड़ा भाँप कर
मुड़ कर पीछे
राह नाप कर
चलना है
यूं ही चलना है....

मन की अपनी
सब से कह कर 
सब की कुछ
अनकही को सुन कर
जीवन चक्र की
धुरी पर चल कर
बढ़ना है
यूं ही बढ़ना है ......

वक़्त कम
इन चौराहों पर
खुले आसमां की
निगाहों पर
खुद के अक्स को
गले लगा कर
मिलना है
कभी बिछड़ना है .....

चलना है
यूं ही चलना है.... ।

 ~यशवन्त यश©
owo30112014