14 May 2022
अनुत्तरित प्रश्न......
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यूं तो मन के हर कोने में विचरते रहते हैं ढेर सारे प्रश्न और उनके सटीक या अनुमानित उत्तर फिर भी कुछ ऐसे प्रश्न भी होते हैं जिनके उ...
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12 May 2022
तो कैसा हो?
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मन कोरे कागज़ की तरह बिल्कुल खाली और नीरस हो तो कैसा हो? शायद वैसा जैसा जीवन की देहरी पर पहला कदम रखते ही किसी नवजात का होता है या ...
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18 April 2022
दो पल ....
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एक भूले हुए दिन यहीं कहीं किसी कोने में मैंने रख छोड़े थे दो पल खुद के लिए। सोचा था- जब कभी मन उन्मुक्त होगा किसी खिले हुए गुलाब की...
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29 March 2022
गेहूं का खेत और सभ्यता
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पके हुए गेहूं से भरा-पूरा एक खेत और इस जैसे कई और खेत कभी किसी दौर में जकड़े रहते थे बीघों फैली मिट्टी को जड़ों के रक्षासूत्र से। ...
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12 March 2022
पूर्णविराम की राह पर ....
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यूं! जैसे शिखर से मिलने के बाद धीरे-धीरे सूरज भी खोता है अपना यौवन यूं! जैसे चरम से मिलने के बाद शेष रहता है सिर्फ शून्य यूं! जैसे ...
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24 February 2022
बदलते रंग
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कभी धूप कभी छाँव के बदलते रंगों में कोशिश करता हूँ एक रंग अपना पाने की और उसी में घुलकर उस जैसा ही हो जाने की दुनियावी मायाजाल को स...
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10 February 2022
दौर बदलना बाकी है ...
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कितना कुछ लिख डाला और कितना लिखना बाकी है शब्दों के मयखाने में और कितना पीना बाकी है। करता कोशिश कुछ कहने की लेकिन सुनना बाकी है बन जा...
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02 February 2022
क्या होगा इनबॉक्स में आकर?
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क्या होगा इनबॉक्स में आकर? क्या होगा मुखौटा उतारकर जो तुम कहना चाहते मुझे सुनना नहीं जो मुझे कहना है पढलो मेरी वॉल पर आकर। क्या होगा इनबॉ...
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01 February 2022
भूले हुए रास्ते ....
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बीतते समय के साथ भूलते हुए अपना गुजरा हुआ कल हम चलते चले जाते हैं अनजान पगडंडियों पर जिनपर छूटे हुए हमारे कदमों के निशान या तो बने रह...
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