कोई फिक्रमंद यहां, कोई बेफिक्री में है।
कोई अपनी अमीरी में, कोई सिर्फ फकीरी में है।
कोई मुखौटा बना बैठा यहां, कोई दिल में बसता है।
कोई बे बात ही औरों की, मुफलिसी पे हंसता है।
कोई उमस की नरमी, कोई बेशक गर्मी में है।
एक दूसरे छोर पर, कोई कड़कड़ाती सर्दी में है।
लेकिन खेल सबका एक जैसा कि कोई थमता ही नहीं।
इंसानी 'रेस' का हर बंदा, बहुत जल्दी में है।
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