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21 May 2026

कुछ लोग-61

आते-जाते 
कुछ लोग मिल ही जाते हैं 
कुछ लोग 
छूट ही जाते हैं।  
कुछ समय का फेर होता है 
कुछ उम्र का तकाजा 
कुछ झटक देते हैं हाथ 
मझधार में 
कुछ चार कंधों पर 
कहीं निकल जाते हैं। 
आते-जाते 
कुछ लोग मिल ही जाते हैं । 
कुछ लोग नहीं सह पाते 
मतभिन्नता 
विचारों की 
तीज-त्योहारों की 
शहरों की 
गाँवों की 
सिर्फ अपने ही आदर्शों को 
सच कहते चले जाते हैं 
आते-जाते 
कुछ लोग मिल ही जाते हैं । 

-यशवन्त माथुर© 
21052026 
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08 February 2026

कुछ लोग-60

कुछ लोग 
वक़्त से 
पाले रहते हैं उम्मीदें 
इस आस में 
कि उसके बीतने या 
बदलने के साथ ही 
बदल सकेगा 
कुछ अपनों का 
चरित्र -
चेहरा और सोच;
लेकिन 
प्रगीतिशीलता के मुखौटे 
और काली वास्तविकता का 
बड़ा अंतर,
पुरातन रूढ़िवादिता ,
अहं और सर्वोच्चता की 
अवधारणा 
शायद  
निकलने नहीं देती  
कुछ लोगों को 
उनके बाह्य आवरण से बाहर 
और शायद इसीलिए 
उनके अपनों की 
उम्मीदें तोड़ देती हैं दम 
चरम पर पहुँचने के 
बहुत पहले
छटपटाते हुए ।  

-यशवन्त माथुर© 
08022026 
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17 April 2025

कुछ लोग-59

कुछ लोग
मन में द्वेष
जुबान पर अपशब्द
और रूप में
मासूमियत लिए
कराते हैं एहसास
अपनी कड़वी 
तासीर का।
ऐसे लोगों की 
चाहत होती है
कि वो आगे हो सकते हैं
अपने वर्तमान से
लेकिन वास्तव में
सदियों पीछे की
रूढ़ियों को गठरी में बांधे 
ऐसे कुछ लोग
अक्षम होते हैं
खुद के तन 
और मन की
कदमताल कराने में भी।

-यशवन्त माथुर© 
17042025
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04 January 2025

कुछ लोग-58

कुछ लोग
जो रूप धरे रहते हैं
दोस्त का
दोस्त नहीं होते
बल्कि
होते हैं प्रतिरूप
भेड़ की खाल में
भेड़िए के चरित्र का।
ऐसे लोग
स्वजन
स्वजात की बातें
जुबान पर रखते तो हैं 
मगर
होते हैं 
एक कदम आगे  ही
पराएपन की
मन में रची-
बसी सोच के।
ऐसे लोगों से पार पाना
असंभव तो है
लेकिन समय पर 
अगर भांप लिया जाए 
इनकी मंशा को
तो नामुमकिन नहीं
विजय 
अग्निपरीक्षा के
कठिन दौर में।

यशवन्त माथुर©
04 जनवरी 2025


23 June 2024

कुछ लोग-57

[कुछ लोग शृंखला की सारी पोस्ट्स यहाँ क्लिक करके देखी जा सकती हैं]


अक्सर 
हमारे आस-पास के 
वातावरण में 
वास्तविक रिश्तों से 
इतर भी 
कुछ लोग 
बना लेते हैं 
एक रिश्ता 
अपनत्व का 
अंतरंगता का...... 
इसलिए नहीं 
कि वे 
महसूस करते हैं 
वैसा ही 
बल्कि, इसलिए 
कि 
वे जान सकें 
जाने-अनजाने राज़ 
जिनको 
अपने स्वार्थ में 
कर सकें प्रसारित 
कहीं और 
किसी और की 
नापाक फ़ितरतों को 
पहुंचाने के लिए 
अंजाम तक। 
भेड़ के आवरण में 
भेड़िया का प्रतिरूप 
ऐसे कुछ लोग
अगर जल्द ही नहीं आए 
पहचान में 
तो कोई नहीं रोक सकता
अनपेक्षित 
विध्वंस को।  

-यशवन्त माथुर© 
23 जून 2024
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मेरे अन्य ब्लॉग 


21 August 2022

कुछ लोग-56

संस्थानों में 
वरिष्ठ पदों पर आसीन 
कुछ लोग 
या तो 
कनिष्ठों से होते हैं मित्रवत 
दी गई सीमा के भीतर 
उनसे काम करा लेने वाले 
उनके दिल में 
एक खास मुकाम बनाने वाले 
या होते हैं
इस कदर टेढ़े 
कि मुस्कुराते हुए भी 
दिखा ही देते हैं 
अपनी अकुशलता के प्रतिरूप.....  
क्योंकि 
उनको भाता है
अपने कार्मिकों के  
आपस की 
हर बात पर 
प्रतिबंध लगाना ...
क्योंकि 
वह सिर्फ चाहते हैं
अपने इशारों पर नचाना 
और क्योंकि 
अपने हल्के होते 
कार्यभार के कारण  
उनके पास बचता नहीं 
अपने लिए 
कोई भी बहाना। 
ऐसे लोग 
अपने निहित स्वार्थ के लिए 
कुछ समय को  
कर सकते हैं 
किसी एक 
सीधे-सच्चे इंसान को 
अस्थिर और परेशान  
लेकिन 
खुद के बोए काँटों पर चलना 
शायद उनके लिए भी 
नहीं होता आसान। 

-यशवन्त माथुर©
21082022

08 December 2021

कुछ लोग-55

कुछ लोग
लगते हैं
देखने से भले
व्यवहार से
हितैषी
लेकिन उनके भीतर
पलता रहता है
विद्वेष
जिसकी झलक
कभी न कभी
दिखती है
उनकी कथनी- 
करनी के अंतर
और उनके चेहरे पर
उभर कर मिटती
आड़ी-तिरछी लकीरों के
आवागमन से। 
यूं तो
विद्वेष
होता है
स्वाभाविक भी
फिर भी
कुछ लोग
अधिकतर नहीं होते संतुष्ट
अपने 
और किसी और के
सुख-दु: ख की
चारित्रिक 
असंगतता से।

-यशवन्त माथुर©
08122021

07 January 2021

कुछ लोग -54

दूसरों के सुख से दुखी 
और 
दुख से सुखी महसूस करने वाले 
कुछ लोग 
कभी-कभी 
बेहयायी से 
आने देते हैं 
बाहर 
भीतर के क्रूर 
और वीभत्स रूप को 
क्योंकि 
वे जानते हैं 
सामने वाले की 
मजबूरी 
और मनोदशा को 
क्योंकि 
उन्हें होता है गुमान 
कि समय का कोई भी प्रहार 
भेद नहीं पाएगा 
उनके निर्लज्ज शब्दों की ढाल को 
लेकिन तब भी 
वो दिन 
वो पल आता ही है 
जब बंद पलकों के पर्दे पर 
चलता हुआ 
बीते दौर का चित्र 
कारण बनता है 
उनके विचित्र अवसान का। 

-यशवन्त माथुर ©
07012021

कुछ लोग शृंखला की अन्य पोस्ट्स देखने के लिये यहाँ क्लिक करें। 

20 December 2020

कुछ लोग-53

अपने स्वार्थ में 
पर्दे के पीछे रह कर 
दूसरों के काम बिगाड़कर 
संतुष्ट हो जाने वाले... 
और प्रत्यक्ष होकर 
हितैषी जैसा दिखने वाले 
दोस्त के नकाब में 
दुश्मनी निभाने वाले 
कुछ लोग
आस पास रह कर 
जिसे समझते हैं 
भेद 
वह सिर्फ सुई होता है 
जो अपनी चुभन से
एक दिन  
बिखेर कर रख देता है 
उनका सारा सच 
और फिर 
कुछ नहीं बचता 
हर तरफ फैली हुई 
कालिख के सिवा। 

-यशवन्त माथुर ©
20122020

[कुछ लोग शृंखला की अन्य पोस्ट्स यहाँ क्लिक कर के देख सकते हैं]

04 October 2020

कुछ लोग -52

कुछ लोग 
जो उड़ रहे हैं आज
समय की हवा में 
शायद नहीं जानते 
कि हवा के ये तेज़ झोंके 
वेग कम होने पर 
जब ला पटकते हैं धरती पर 
तब कोई
नहीं रह पाता काबिल 
फिर से सिर उठाकर 
धारा के साथ 
चलते जाने के।
 
इसलिए 
संभल जाओ 
समझ जाओ 
मैं चाहता हूँ 
कि जान पाओ 
और कह पाओ 
सही को सही 
गलत को गलत 
क्योंकि 
यह चिर स्थायी गति 
शून्य से शुरू हो कर 
शून्य पर ही पहुँच कर 
देश और काल की 
हर सीमा से परे 
कुछ लोगों के 
आडंबरों का विध्वंस कर 
सब कुछ बदल देती है।  

-यशवन्त माथुर ©
04102020

'कुछ लोग' शृंखला की अन्य पोस्ट्स यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। 

04 May 2020

कुछ लोग -51

वर्तमान में जीते हुए 
कुछ लोग 
भूल जाते हैं 
अपना बीता हुआ कल 
बन जाते हैं मोहरा 
किसी और की चालों के 
जिसके भीतर की 
कालिख से अनजान 
कर  बैठते हैं 
सिर्फ अपने आज में जी कर 
खुद का ही नुकसान।
कुछ लोग 
शायद समझते हैं 
औरों को 
अपने जैसा ही 
कुटिल 
या कुछ अधिक ही सीधा 
लेकिन ऐसा होता नहीं है 
क्योंकि वास्तविकता 
सिर्फ वही नहीं होती 
जो स्याहियों से रची हुई 
दिखती है 
दीवारों पर उकेरी हुई 
या पन्नों पर लिखी हुई। 

-यशवन्त माथुर©
04/05/2020

29 April 2020

कुछ लोग-50

वर्षों से
जीवन का हिस्सा बने
कुछ लोग
खोखला करने का
मौका पाते ही
बन जाते हैं
ऐसी दीमक
जो भीतर ही भीतर
भेदती जाती है
अंग-प्रत्यंग
और हमें पता ही नहीं चलता
क्योंकि हम
आँखें मूँद कर
करते रहते हैं विश्वास
सच जैसे दिखने वाले
उनके सफेद झूठ पर।

हमें बचना चाहिए
ऐसी दीमकों के
कुप्रहार से ..
हमें करना चाहिए
पहले ही कोई उपाय
कि पनप ही न पाएं
पल ही न पाएं
नहीं तो
सच सामने आते-आते
हो चुकती है इतनी देर
कि सिर्फ  बाकी रहते हैं
अवशेष
धूल में मिल कर
कहीं उड़ चुके
विश्वास के।

-यशवन्त माथुर ©
29/04/2020

21 April 2020

कुछ लोग-49

अच्छे-बुरे
कई तरह के लोग
बात-बेबात
बताने लगते हैं
समझाने लगते हैं-
ये लिखो
वो न लिखो
ऐसे लिखो
वैसे न लिखो
ये चित्र या ये पंक्ति
साझा करो
या न करो
लेकिन खुद
अपने चेहरे की
कुटिल मुस्कुराहट के
पीछे रखते हैं
अपना वो सच
जो
कहलवाना चाहते हैं मुझसे
लेकिन नाकाम रहते हैं
क्योंकि
यह जो कुछ है
मेरा है
यह मेरी अभिव्यक्ति है
जो खराब और अच्छी होती है
लेकिन करीब होती है
मेरे दिल और दिमाग के
इसलिए
अब पाता हूँ
खुद को उस मुकाम पर
जब बे लगाम
कह सकता हूँ
ढाल सकता हूँ
अपने शब्दों को
अपने मन के
इस धरातल पर।

-यशवन्त माथुर ©
21/04/2020

11 April 2020

कुछ लोग -48

खुद को ऊंचा
और सामने वाले को
नीचा समझने वाले कुछ लोग
अपने आस-पास के चाटुकारों से
घिरे रह कर
खुद को
कुछ भी समझ लेते हैं
कुछ ऐसा -
जो वो होते नहीं ।
उनको लगता है
कि यह जो चुप है
नतमस्तक है
उनके आगे
इसलिए किया जा सकता है
उसको मानसिक प्रताड़ित
दिया जा सकता है तनाव
क्रूर और बर्बर बातों से
लेकिन शायद
ऐसे लोग भूल जाते हैं
कि चुप या मौन रहने वाला इंसान
जब खोलने लगता है
अपनी जुबान
तो यह संकेत होता है
कि तूफान
अब दूर नहीं।

-यशवन्त माथुर ©
11/04/2020

23 March 2020

कुछ लोग-47

खुद
सामने आने के बजाय
कुछ लोग
चलते हैं
अपनी चालें
उन ना-समझ मोहरों से
जो होते हैं बे-खबर
प्रत्यक्ष के
परोक्ष से।
पर वो नहीं जानते
कि ये मोहरे ही
अक्सर उनके
विभीषण बनकर
दिखा देते हैं
असत्य के भीतर
कहीं गहरे से दबा
सत्य।
कई उजले मुखौटों के
सौन्दर्य को
दर्पण में निहारते
कुछ लोग
जानकर भी
अनजान बने रहते हैं
कि उनकी
बतकहियों के तूफान में
शांत रहने का अर्थ
आत्मसमर्पण नहीं
सामने वाले का
संकल्प होता है।

-यशवन्त माथुर ©
23/03/2020

15 September 2019

कुछ लोग-46

कुछ लोग 
नहीं चाहते बंधना 
नियमों के 
असीम जाल में 
नहीं चाहते 
फंसना 
क्योंकि 
उनका दायरा 
संकुचित होता है 
चारदीवारी के भीतर 
खुद की 
खुशियों तक 
सीमित होता है। 

कुछ लोग 
नहीं चाहते हैं 
टोका जाना 
रोका जाना 
उनको भाता है 
अतिक्रमण....
लांघ कर 
दूसरों की सीमाएँ
चलते जाना।

और जब 
आता है 
ठहराव का 
अंतिम 
अनचाहा पड़ाव 
तब चाह कर भी 
कुछ लोग 
बंध नहीं पाते 
क्योंकि 
अवश्यंभावी होता है 
एक ही 
नीरस चलचित्र का 
बोझिल सा अन्त। 

-यशवन्त माथुर©
15/09/2019
 

13 June 2019

कुछ लोग -45

चौराहों पर
आते जाते
जीवन धारा की
तेज़ रफ्तार में
मंज़िल तक पहुँचने की
जद्दोजहद में लगे
कुछ लोग
कैसे भी कर के
बस पा लेना चाहते हैं
अपना अंतिम पड़ाव
जिसे छूना
नहीं होता
इतना भी आसान
क्योंकि
ये राहें
ये सड़कें
खुद में समाए हुए हैं
अनेकों गड्ढे और
गति अवरोधक....
इनके किनारों पर
कहीं मिलता है
अतिक्रमण
और कहीं
गंदे,बदबूदार
कूड़े के ढेर....
जिन्हें
पार कर के ही
कुछ चुनिन्दा लोग
उकेर सकते हैं
अपना अंतिम बिन्दु।
.
-यश©
13/जून /2019 

21 March 2019

कुछ लोग-44

अच्छे से जानते हैं कुछ लोग
अच्छे भले दिन को
खराब करने की कला
क्योंकि उन्हें सुहाता नहीं
दो पल का सुकूं
किसी चेहरे पर
इसलिए
रहते हैं
बस इसी ताक में
कि खेलते रहें
सीधे लागने वाले
किसी चेहरे के
जज़्बातों से
बिना कुछ सोचे
बिना कुछ समझे
कुछ लोगों को
ऐसा लगता है
कि बर्दाश्त की सीमा
शायद असीम होती है
कुछ लोगों की।
.
~यश ©
21/03/2019

08 February 2019

कुछ लोग -43

तलाश पाते हैं
सिर्फ कुछ ही लोग
मटमैली चादर के
किसी सिरे पर
कहीं खोई हुई
उम्मीद की
किसी धुंधली सी
रेखा को
लेकिन
अधिकतर
सिर्फ ढोते रहते हैं
उसी स्याहपन को
जो छितराया रहता है 
हर ओर
यहाँ-वहाँ
सिर्फ इसलिए
क्योंकि
नहीं जुटा पाते
हिम्मत
कुछ लोग
अपने सीमित दायरे से
बाहर निकल आने की।

-यश ©
08/02/2019

15 October 2018

कुछ लोग -42

अनेकों
औपचारिकताओं के
लबादे में
ढँके-छुपे कुछ लोग
सिर्फ चाह में रहते हैं कि
बने रहें अच्छे
और सच्चे
औरों की निगाहों में ;
लेकिन;
भूल जाते हैं
कि उनके चेहरे पर लगा
आदर्शवादी मुखौटा
देर से ही सही
पर
जब हटता है
तब साफ दिखने लगते हैं
वो तमाम कील और मुँहासे
जिनसे रिसता है
उनके वास्तविक सच
और चरित्र का मवाद।

अपने 'अभिनय' से
सबको कायल करने वाले
ऐसे लोग
समय रहते ही
पहचान में आ तो जाते हैं
मगर
पहचानने वाले भी
छू लेने देते हैं
उन्हें उनका  फ़लक
क्योंकि
ऊंचाई से गिरने पर
शर्मिंदा अर्श भी
कर लेता है
खुद को और भी कठोर
ताकि
वो कर सकें
एहसास
खुद के दिल
और दिमाग पर पुती
कालिख के
गहरेपन का।

~यश©
15/10/2018
  
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