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01 July 2026

एक जुलाई

आ गई है
एक जुलाई की
बादल भरी
उमस से भरपूर सुबह।
छोटे बच्चे
अपनी मस्तियों को
लगा चुके हैं तह 
और रख चुके हैं
बीते जून की 
आखिरी शाम
ग्रीष्म अवकाश के
बड़े से बक्से में
फिर एक वर्ष के लिए।
अब उन बच्चों की
पीठ पर सजेंगे
रंग-बिरंगे
नए-पुराने
हल्के-भारी बस्ते!
और उनकी ऊर्जा से
चिड़ियों की तरह 
चहकेंगे
हर गली
चौराहे
और रस्ते।
ये छोटे छोटे 
खिलखिलाते बच्चे
जिद्द मनवाने को
रुआंसे बच्चे
कंधे पर बोतल
गले में परिचय पत्र
और पीठ पर
साजो-सामान लादे बच्चे
कम नहीं लगते
युद्ध फतह करने जाते
सैनिकों की 
किसी टोली से।
अंतर
सिर्फ इतना सा होता है
कि सैनिक 
हो चुके होते हैं
मातृभूमि को समर्पित
और बच्चे
बढ़ा रहे होते हैं
अपने नन्हे कदम
भविष्य को
समर्पित होने के लिए।

✓यशवन्त माथुर©
01072026

07 May 2026

विषय

विषयों की तलाश में 
भटकता हुआ 
किसी कोने में 
कहीं अटकता हुआ 
बेसुध सा मन 
यहाँ-वहाँ 
सब जगह 
ढूँढता है 
'कुछ'
जो अभिप्रेरित करे 
कहने को 
अंतर्मन की बात। 
बात! 
जिसे 
कहीं देखा गया हो 
सुना गया हो 
महसूस किया गया हो 
जिसकी शाखाओं से निकलें 
विषयों के उपविषय 
और जिसमें समाहित हो 
प्रस्तावना से उपसंहार तक का 
पूरा वृतांत और सार। 
बस 
कोरे मन के 
सूक्ष्मतम कण को 
गर मिल सके 
कोई एक विषय 
तो निर्मित  हो सकेगा 
कई ब्रह्मांडों के  
अतिशयोक्ति रहित 
सृजन और संहार का 
अंतहीन चक्र।  


-यशवन्त माथुर©
070526 
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23 April 2026

डायरी

याद आती है 
वो एक डायरी 
जो बचपन की 
साथी थी 
जिसके हर पन्ने पर 
लिखी थीं 
कुछ बातें 
यूं ही अकेले में 
खुद से कुछ कहते हुए 
शब्द से शब्द को 
जोड़ते हुए 
दिवा स्वप्नों में 
खोते हुए। 
उस डायरी में 
रचा-बसा 
हर एक अक्षर 
खामोशी की आवाज़ बनकर 
भावी ताने-बाने बुनकर 
एकाकीपन को 
देकर नयी ऊर्जा 
बन जाता था 
जीवनी शक्ति। 
आज फिर 
इतने बरस बाद 
लाल आवरण वाली 
भूली बिसरी 
पंचतत्व में विलीन हो चुकी 
वह डायरी 
स्वप्न में आई 
मुस्कुराई 
और  बोली -
कि वह लेना चाहती है 
पुनर्जन्म 
होना चाहती है साकार 
टूटी निब वाली 
मेरी कलम के साथ। 

~यशवन्त माथुर©
23042026

16 April 2026

तनाव

तनाव
हिस्सा है
जीवन का
प्रकृति का
कल्पना का
सोच का
नक्शों पर
उकेरी हुई
सीमाओं का
जल, नभ 
और थल का।
तनाव
हिंसा है
अहिंसा है
सत्य है
मिथ्या है।
तनाव 
अखंडित है
तो खंडित भी है
पूजनीय 
और पतित भी है।
इसलिए 
तनाव की
अतिश्योक्तिपूर्ण
स्वाभाविकता के
परमाणु से भी 
किसी सूक्ष्म कण में
मैं ढूंढ रहा हूं
एक हिस्सा
शांति की
पुकार का।

~यशवन्त माथुर©
16042026

10 February 2026

इंसान और कुत्ता


इंसान 
इंसान होता है 
और 
कुत्ता, 
कुत्ता होता है 
दोनों प्रजातियों में 
स्वाभाविक अंतर होता है। 
इंसान 
जन्म से 
मरण तक 
कभी खुश होता है 
कभी रोता है 
संघर्षों में 
गिरता है 
उठता है 
चलता-फिरता है 
जागता है 
सोता है 
कुत्ते के साथ भी 
ऐसा ही होता है। 
कुत्ता 
दौड़ता है 
भागता है 
आवरगर्दी करता है 
खुले आसमान के नीचे 
जागता है 
सोता है 
दुखी होता है 
तो खुल कर रोता है 
किसी का डर 
उसको नहीं होता है। 
कुत्ता, 
कुत्ता ही होता है 
उसे नहीं होती 
नौकरी की चिंता 
न घरवालों की चिंता 
नहीं होता 
नातों-रिश्तों का झमेला 
उसके जीवन में 
न परीक्षा का झंझट 
न ही प्रतिशत का 
उसे एहसास नहीं होता 
भूख का 
न प्यास का 
उसे शरण देने वाला 
कोई अमीर इंसान 
उसे सुला सकता है 
मखमली गद्दे पर 
और कोई फुटपाथिया 
उसे तकिया बना कर 
खुद सोता है 
रख कर सिरहाने पर। 
इंसान 
सिर्फ अमीर ही अच्छा होता है 
और गरीब इंसान से 
लाख गुना बेहतर होता है 
आज के दौर में 
आवारा कुत्ता होना। 
.
-यशवन्त माथुर© 
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08 February 2026

कुछ लोग-60

कुछ लोग 
वक़्त से 
पाले रहते हैं उम्मीदें 
इस आस में 
कि उसके बीतने या 
बदलने के साथ ही 
बदल सकेगा 
कुछ अपनों का 
चरित्र -
चेहरा और सोच;
लेकिन 
प्रगीतिशीलता के मुखौटे 
और काली वास्तविकता का 
बड़ा अंतर,
पुरातन रूढ़िवादिता ,
अहं और सर्वोच्चता की 
अवधारणा 
शायद  
निकलने नहीं देती  
कुछ लोगों को 
उनके बाह्य आवरण से बाहर 
और शायद इसीलिए 
उनके अपनों की 
उम्मीदें तोड़ देती हैं दम 
चरम पर पहुँचने के 
बहुत पहले
छटपटाते हुए ।  

-यशवन्त माथुर© 
08022026 
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10 January 2026

जरूरी है......

जरूरी है
दिन, दोपहर और 
उजाले से परे
कभी -कभी
अंधेरे का होना
घने कोहरे का होना
और एकांत का कोना
जहां 
आत्ममुग्धता के चरम पर
आत्मचिंतन की -
वास्तविकता में
मेरे जैसा कोई
चख सके स्वाद
नीम जैसी-
वास्तविकता का।
.
~यशवन्त माथुर©
10012026

01 January 2026

नव वर्ष

नयी उम्मीदों के साथ 
नयी बातों के साथ 
नए ख्यालों के साथ 
ख्वाब सबके पूरे हों ।
 
जो बरसों से अधूरे रहे 
अनकहे-अनसुने रहे
चाहे जितने प्रकार हों 
शब्द सब  साकार हों। 

नया सूरज कुछ कहता रहे 
हर दिन कुछ बनता रहे  
रात का अंधेरा छँटता रहे 
प्रेम भाव बँटता रहे। 

नववर्ष!
आशा का प्रतीक हो
उल्लास से व्यतीत हो 
तिनका-तिनका खुशियों से 
घर-आँगन रोशन हो। 

~यशवन्त माथुर©

11 September 2025

इस दौर में.......

रसातल में 
कहीं खोती जा रही हैं
हमारी भावनाएं,
शब्द और मौलिकता।
भूलते जा रहे हैं हम
आचरण,सादगी
और सहनशीलता।

कृत्रिम बुद्धिमतता 
के इस दौर में
हमारा मूल चरित्र
सिमट चुका है
उंगलियों की 
टंकण शक्ति की
परिधि के भीतर
जो अंतरजाल की 
विराटता के साथ 
सिर्फ बनाता है
संकुचित होती 
सोच का 
शोचनीय रेखाचित्र
क्योंकि वर्तमान 
तकनीकी सभ्यता वाला मानव
भूल चुका है
मानवता का 
समूल।

~यशवन्त माथुर©
11092025

15 August 2025

आजादी के गीत गाएं

नई उमंगें , नई तरंगें 
अपना तिरंगा, आओ लहराएं 
आजादी के गीत गाएं। 

आजादी जो मिली तप से 
और अनेकों कुर्बानियों से 
सारी सच्ची कहानियों को 
आओ मन से फिर दोहराएं। 

आजादी के गीत गाएं। 

गीत जिनमें रचा-बसा हो 
स्वर्णिम सा इतिहास हमारा 
विविधता में एकता और 
संस्कृति का चलचित्र दिखलाएं । 

आजादी के गीत गाएं। 

-यशवन्त माथुर© 
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20 July 2025

चलता रहा

कदम गिने बगैर राह पर चलता रहा।
बेहिसाब वक्त से सवाल करता रहा।

लोग कोशिश करते रहे बैसाखी बनने की।
सहारा जब भी लिया, मैं गिरता रहा।

माना कि बेहोश था, होश में आने के पहले।
ज़माना जीता रहा और मैं मरता रहा।

 ~यशवन्त माथुर©
20072025

22 June 2025

अवशेष

हाँ 
यह  सुनिश्चित है 
कि अंततः 
अगर कुछ बचा 
तो वह अवशेष ही होगा 
अधूरी 
या पूरी हो चुकी 
बातों का 
उनसे जुड़े 
दिनों का 
या रातों का। 
हाँ 
अनिश्चित जीवन के 
किसी एक कालखंड में 
सबको रह ही जाना है 
अपूर्ण 
बन ही जाना है 
अवशेष 
क्योंकि अवशेष ही 
होते हैं साक्ष्य 
एक रची-बसी सभ्यता 
और 
जीवन के अस्तित्व के।

-यशवन्त माथुर© 
21062025

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07 June 2025

चमकना इतना नहीं चाहता ....................

चमकना इतना नहीं चाहता 
कि चौंधिया जाओ तुम 
बस तमन्ना इतनी है 
कि धरती को छूता रहूँ।  

यूं तलवार की धार पर 
चलता तो रोज ही हूँ 
मगर बनकर  कोई पेड़ 
छाया किसी को देता रहूँ । 

कई चौराहे आ चुके 
कई आने बाकी हैं 
मंजिल को पा सकूँ 
या मंजिल ही बनता रहूँ। 

चमकना इतना नहीं चाहता 
कि चौंधिया जाओ तुम 
बस तमन्ना इतनी है कि 
अपने मूल  में बीतता रहूँ। 


-यशवन्त माथुर©

17 April 2025

कुछ लोग-59

कुछ लोग
मन में द्वेष
जुबान पर अपशब्द
और रूप में
मासूमियत लिए
कराते हैं एहसास
अपनी कड़वी 
तासीर का।
ऐसे लोगों की 
चाहत होती है
कि वो आगे हो सकते हैं
अपने वर्तमान से
लेकिन वास्तव में
सदियों पीछे की
रूढ़ियों को गठरी में बांधे 
ऐसे कुछ लोग
अक्षम होते हैं
खुद के तन 
और मन की
कदमताल कराने में भी।

-यशवन्त माथुर© 
17042025
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13 March 2025

रंग

यूं तो 
बहुत कुछ 
स्याह - सफेद 
लगा ही रहता है 
जीवन में 
बने रहते हैं 
कुछ दर्द 
हमेशा के लिए 
फिर भी 
आते-जाते 
चलते-फिरते 
हमारा वास्ता 
पड़ता ही है 
रंगों से।  
रंग 
कुछ होते हैं 
हमारी पसंद के 
और कुछ को 
हम 
देखना भी नहीं चाहते 
फिर भी रंग 
समेटे होते हैं 
अपने भीतर 
बहुत सा 
सुख-दुख
और कुछ पल 
जिनको जी कर 
हम बस यही चाहते हैं 
कि रंग बने रहें 
हमेशा के लिए। 

-यशवन्त माथुर© 
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18 January 2025

फुटपाथ ....

कानों में गूँजती 
अनगिनत 
स्वर लहरियों के साथ 
कहीं रास्ते पर 
चलते कदम 
अक्सर
ठिठक कर रुक जाते हैं 
जब नज़रों के सामने 
फुटपाथ 
आ जाते हैं। 

हाँ 
सड़क किनारे के 
वही फुटपाथ
जो 
कुछ लोगों के रहने का 
ठौर बनकर 
जीवन का असली रंग 
दिखा जाते हैं।
 
इन फुटपाथों पर लगे 
ईंटों के तकिये 
कंक्रीट के बिस्तर 
और किसी 'और' की 
मैली-तिरस्कृत चादर
काफी होती है 
ढकने को 
किसी का आँचल 
या देने को 
ममत्व की छाँव  
जिसमें पल-बढ़ कर 
आकार लेती है 
एक नई पीढ़ी 
डामर की 
बंजर सड़कों पर चलते 
हम जैसे 
बेजान -बेदिल- 
बोझिल लोगों को 
लिखने के लिए 
नया विषय
और कुछ शब्द 
देती हुई।  
 
-यशवन्त माथुर© 
18 जनवरी 2025 

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17 January 2025

हम क्यूँ उलझ रहे ?

हम 
क्यूँ उलझ रहे 
आपसी द्वन्द्व में ?
अपनी 
महत्वाकांक्षाओं के कारण 
क्यूँ 
बिगाड़ रहे 
रूप-रेखा- 
और सोच 
एक पूरी पीढ़ी की? 
आखिर
भविष्य को  
क्या हासिल होगा 
अपने इस वर्तमान से 
सिवाय इसके 
कि 
टुकड़ों में बँटती 
इंसानियत की 
एक-एक झिर्री 
अगर फिर कभी 
जुड़ भी गई 
तो क्या 
उस पर लगे 
अनंत पैबंद 
छुप पाएंगे 
नकली 
मुखौटों के भीतर ? 

-यशवन्त माथुर©
 
17 जनवरी 2025 

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11 January 2025

अपना सही पता दे......



तू आसमां में है
लेकिन अपना
सही पता दे।

कौन जात है तेरी
धर्म क्या
भाषा और अपना
करम बता दे।

हर कोई 
अपनी तरह पूजता।
कोई सुंदर 
कोई कुरूप बूझता।

मावस की रात में
कहां चांदनी 
को लेकर तू जाता रे।

ऐसे तक मत
धरती को चांद!
अपना सही 
पता बता रे।

✓यशवन्त माथुर©
11 जनवरी 2025

10 January 2025

हम अंधे हैं .....

यूं आँखों पर 
चश्मा लगाए 
हममें से 
अधिकतर लोग 
सच 
सामने होते हुए भी 
जब 
नहीं कर पाते 
सामना
जब नहीं रहती 
हममें हिम्मत 
उसे स्वीकार करने की
तब 
सब कुछ 
दिखते हुए भी  
ऐसा लगता है 
कि हम 
अंधे हैं।  

-यशवन्त माथुर© 
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09 January 2025

पता नहीं.....

भले ही वक़्त 
साथ दे 
या 
न दे 
अपनी महत्त्वाकांक्षा 
अपना अहम् 
अपने साथ लेकर 
हमें जाना ही है
इस पार से 
उस पार 
लेकिन 
कब -किस तरह 
न मालूम 
रास्ता 
न यह पता कि 
क्या होगा 
परिणाम 
बस अपने अनंत की 
चिर प्रतीक्षा का अंत 
कब होगा.... 
पता नहीं।  

-यशवन्त माथुर© 
09 01 2025
 
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