जो जाना जाता था
किसान के हल से
अपने सुनहरे कल से
जिसके खेतों में फसलें
झूम-झूम कर
हवा से ताल मिलाती थीं
पत्ती-पत्ती फूलों से
दिल का हाल सुनाती थी
जहाँ संपन्नता तो नहीं
संतुष्टि की खुशहाली थी
महंगी विलासिता तो नहीं
पर ज़िंदगी गुजर ही जाती थी
कितना अच्छा था पहले
वैसा अब आज नहीं
पहले सुराज था
आज तो स्वराज नहीं
आज तो
बस पल-पल बिगड़ता
सबका वेश और परिवेश है
जो गणतंत्र था सच में कभी
क्या यह वही देश है?
24012021