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30 June 2022

बरसात

(सुनने के लिए कृपया पधारें: https://youtu.be/p9QVmeMM4ek)

बरसात!
अब नहीं रही 
पहले जैसी 
बचपन जैसी 
अल्हड़- 
बेबाक- 
खुशगवार  
देहरी पर 
जिसका 
पहला कदम पड़ते ही 
तन के साथ 
मन भी झूम उठता था 
बादलों की गरज 
और रिमझिम के साथ 
कहा और लिखा जाने वाला 
एक-एक शब्द 
नई परवाज़ के साथ 
रचा करता था 
इतिहास के 
नए पन्ने। 

बरसात!
अब नहीं लाती  
खुशियां 
लाती है तो सिर्फ 
गंदी-बदबूदार नफरत 
जिसे बहने का रास्ता 
अगर मिल जाता 
तो मंजिल तक 
जाने वाला रास्ता 
नहीं होता 
ऊबड़-खाबड़ 
और गड्ढे दार। 


-यशवन्त माथुर©

14 May 2022

अनुत्तरित प्रश्न......


यूं तो 
मन के हर कोने में 
विचरते रहते हैं 
ढेर सारे प्रश्न 
और उनके 
सटीक 
या अनुमानित उत्तर 
फिर भी 
कुछ ऐसे प्रश्न भी होते हैं 
जिनके उत्तर की चाह में 
सैकड़ों योनियों में भटकते हुए 
बीत जाते हैं 
कितने ही पूर्व 
और भावी जन्म। 
हम 
कितने ही चोले बदलते हुए 
कितने ही देश-काल 
और परिस्थितियों से जूझते हुए 
कितनी ही भाषाओं -
संस्कृतियों से गुजरते हुए 
संभावित मोक्ष की देहरी पर 
दस्तक देते हुए भी 
अतृप्त रह ही जाते हैं 
क्योंकि 
अपने अजीब से 
मोहपाश में बांधकर 
अनुत्तरित प्रश्नों का 
एकमात्र लक्ष्य 
अनुत्तरित ही रहना होता है 
सदा-सर्वदा के लिए। 

-यशवन्त माथुर©
14052022

12 May 2022

तो कैसा हो?

मन 
कोरे कागज़ की तरह 
बिल्कुल खाली 
और नीरस हो 
तो कैसा हो?
शायद वैसा 
जैसा जीवन की देहरी पर 
पहला कदम रखते ही 
किसी नवजात का होता है 
या फिर 
किसी निर्मोही आवरण में 
कोई अपवाद हो
तो कैसा हो?
स्वाभाविक भेदों की तरह 
बिखरे रह कर भी 
गर शब्द निष्कपट हों 
तो कैसा हो?

-यशवन्त माथुर©
08052022 

18 April 2022

दो पल ....

एक भूले हुए दिन 
यहीं कहीं 
किसी कोने में 
मैंने रख छोड़े थे 
दो पल 
खुद के लिए।  
सोचा था-
जब कभी मन 
उन्मुक्त होगा 
किसी खिले हुए गुलाब की 
सब ओर फैली 
खुशबू की तरह 
तब उनमें से 
एक पल चुराकर 
महसूस कर लूँगा 
जेठ की तपती दोपहर में 
थोड़ी सी ठंडक। 
लेकिन 
भागमभाग भरे 
इस जीवन में 
कितने ही मौसम 
आए और गए 
कोने बदलते रहे 
मगर वो दो पल 
अभी भी वैसे ही 
सहेजे रखे हैं 
जीवन भर की 
जमा पूंजी की तरह। 

-यशवन्त माथुर©
18042022

29 March 2022

गेहूं का खेत और सभ्यता


पके हुए गेहूं से 
भरा-पूरा एक खेत 
और 
इस जैसे 
कई और खेत 
कभी 
किसी दौर में 
जकड़े रहते थे
बीघों फैली मिट्टी को 
जड़ों के 
रक्षासूत्र से। 

उस रक्षासूत्र से 
जिसकी आपस में उलझी 
कितनी ही गांठें
तने से मिलकर 
ले लेती थीं रूप 
बालियों जैसे 
खूबसूरत 
स्वर्ण कणों का।

लेकिन अब
अब   
कंक्रीट की 
सभ्यता के बीचों-बीच 
साँसों को गिनती 
झुर्रीदार 
बूढ़ी मिट्टी
किसी दुर्योधन के  
कँगूरेदार 
घोंसले की नींव में 
दफन हो कर 
हो जाना चाहती है 
इस लोक से मुक्त 
क्योंकि 
उसकी इज्जत का रखवाला 
कलियुग में 
कहीं कोई कृष्ण 
अब शेष नहीं।  

-यशवन्त माथुर©
29032022 

12 March 2022

पूर्णविराम की राह पर ....


यूं!
जैसे शिखर से
मिलने के बाद 
धीरे-धीरे 
सूरज भी खोता है 
अपना यौवन 

यूं!
जैसे चरम से 
मिलने के बाद
शेष रहता है 
सिर्फ शून्य 

यूं! 
जैसे प्रतीक्षा के 
दीर्घ अंतराल के बाद
प्रारब्ध का संघर्ष 
निकल पड़ता है 
विजयपथ की ओर 

शायद! 
ठीक वैसे ही 
महत्त्वाकांक्षाओं 
और अपेक्षाओं के 
बदलते मौसमों के साथ 
पूर्णविराम की राह पर 
गर रख सका 
पहला कदम 
तो मेरे हिस्से का 
अवशेष नाम 
शब्दों के झुरमुट में  
गुमशुदा हो ही  जाएगा 
एक अदृश्य अपूर्ण 
बिन्दु बनकर!

-यशवन्त माथुर©
12032022

24 February 2022

बदलते रंग

कभी धूप 
कभी छाँव के 
बदलते रंगों में 
कोशिश करता हूँ 
एक रंग 
अपना पाने की 
और उसी में घुलकर 
उस जैसा ही हो जाने की 
दुनियावी मायाजाल को समझकर 
धारा के साथ ही 
बह जाने की। 

लेकिन मेरे भीतर बैठा 
मेरा अपना सच 
लाख चाहने के बाद भी
डिगा नहीं पाता 
कतरे-कतरे में घुली 
रची और बसी
मौन  
विद्रोही प्रवृत्ति को 
जो अपने चरम के पार 
मुखर होते ही 
बेरंग कर देती है 
बहुत से रंगों को। 

और इसलिए 
सिर्फ इसीलिए 
जीवन के 
किसी एक क्षण भर को 
जी लेना चाहता हूँ 
बसंत बन कर 
ताकि रहे न कोई अफसोस 
ताउम्र 
रंगहीन होने का। 

-यशवन्त माथुर©
24022022

10 February 2022

दौर बदलना बाकी है ...


कितना कुछ लिख डाला 
और कितना लिखना बाकी है 
शब्दों के मयखाने में 
और कितना पीना बाकी है। 

करता कोशिश कुछ कहने की
लेकिन सुनना बाकी है 
बन जाए जिनसे कोई कविता 
वो अक्षर चुनना बाकी है।  

देखो बसंत की इस हवा को 
और कितना बहना बाकी है 
दूर नहीं दोपहर जेठ की 
बस दौर बदलना बाकी है। 

-यशवन्त माथुर ©
10022022 

02 February 2022

क्या होगा इनबॉक्स में आकर?


क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
क्या होगा
मुखौटा उतारकर 
जो तुम कहना चाहते
मुझे सुनना नहीं
जो मुझे कहना है
पढलो 
मेरी वॉल पर आकर।
क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
रख दोगे
अपना चरित्र
गिरवी अपने शब्दों से
और चाहोगे
मैं गिर जाऊं
तुम्हारी बातों में आकर।
क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
नख-शिख तक
देह-वस्त्र विश्लेषण
क्या करूं
मैं तुमसे पाकर
क्या होगा 
इनबॉक्स में आकर?
अपनी राह पर
तुम चलो
और चलने दो
मित्रता पाकर
भले अगर मानस हो सच में
क्या होगा 
इनबॉक्स में आकर?

(महिलाओं के सोशल मीडिया इनबॉक्स में बेवजह आने वाले शूर वीरों को समर्पित)

-यशवन्त माथुर©
02022022

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