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25 April 2026

विचारधारा: मनुष्य की चेतना, समाज की दिशा और समय का आईना

ब भी हम “विचारधारा” शब्द सुनते हैं, तो अक्सर इसे केवल राजनीति या दर्शन तक सीमित मान लेते हैं। लेकिन यदि थोड़ी गहराई से सोचें, तो समझ में आता है कि विचारधारा हमारे जीवन के हर छोटे-बड़े निर्णय में छिपी होती है। हम क्या सही मानते हैं, क्या गलत समझते हैं, किसके पक्ष में खड़े होते हैं और किसके विरोध में—इन सबके पीछे हमारी विचारधारा ही काम करती है।

विचारधारा कोई अचानक पैदा होने वाली चीज़ नहीं है; यह धीरे-धीरे बनती है, जैसे मिट्टी में बीज पड़कर समय के साथ पेड़ बनता है। हमारे बचपन के संस्कार, परिवार का वातावरण, स्कूल की शिक्षा, समाज की परिस्थितियाँ और हमारे अपने अनुभव—ये सब मिलकर हमारी सोच को आकार देते हैं। यही सोच जब स्थायी रूप ले लेती है, तो वह हमारी विचारधारा बन जाती है।

किसी ने ठीक ही कहा है—
“विचार बीज की तरह होते हैं; जैसा बोओगे, वैसा ही जीवन में उगेगा।”

यह कथन केवल एक सुंदर वाक्य नहीं, बल्कि एक गहरी सच्चाई है। यदि किसी व्यक्ति के भीतर सकारात्मक, मानवीय और उदार विचारों का बीज बोया गया है, तो उसकी विचारधारा भी वैसी ही होगी। वहीं, यदि सोच संकीर्ण या कट्टर है, तो उसका असर उसके व्यवहार और निर्णयों में साफ दिखाई देगा।

विचारधारा का निर्माण: अनुभवों की लंबी यात्रा

हर व्यक्ति की विचारधारा अलग क्यों होती है? इसका सीधा सा उत्तर है—हर व्यक्ति के अनुभव अलग होते हैं। दो लोग एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से देखते हैं, क्योंकि उनके जीवन के अनुभव और सोचने का तरीका अलग होता है।

उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जिसने गरीबी और संघर्ष का जीवन देखा है, उसकी विचारधारा में समानता और न्याय का महत्व अधिक हो सकता है। वहीं, एक ऐसा व्यक्ति जो संपन्न वातावरण में पला-बढ़ा है, वह स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों को प्राथमिकता दे सकता है।

यहाँ यह समझना जरूरी है कि कोई भी विचारधारा पूर्णतः सही या गलत नहीं होती। हर विचारधारा अपने संदर्भ और परिस्थितियों के अनुसार विकसित होती है। समस्या तब पैदा होती है, जब हम अपनी विचारधारा को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं और दूसरों के विचारों को महत्व देना बंद कर देते हैं।

विविधता और टकराव: विचारधाराओं का द्वंद्व

समाज में अलग-अलग विचारधाराओं का होना स्वाभाविक है। यही विविधता समाज को जीवंत बनाती है। यदि सभी लोग एक ही तरह सोचते, तो न तो कोई नई खोज होती और न ही समाज आगे बढ़ पाता।

लेकिन यही विविधता कभी-कभी टकराव का कारण भी बन जाती है। इतिहास इस बात का गवाह है कि कई बड़े संघर्ष केवल विचारधाराओं के अंतर के कारण हुए हैं। जब लोग अपने विचारों को सर्वोच्च मान लेते हैं और दूसरों को गलत साबित करने में लग जाते हैं, तो संवाद की जगह संघर्ष ले लेता है।

एक प्रसिद्ध उक्ति है—
“जब संवाद खत्म होता है, तभी संघर्ष शुरू होता है।”

इसलिए यह जरूरी है कि हम अपनी विचारधारा पर अडिग रहते हुए भी दूसरों की बात सुनने की क्षमता बनाए रखें। सहिष्णुता और संवाद ही वह पुल हैं, जो अलग-अलग विचारों को जोड़ सकते हैं।


आधुनिक समय में विचारधारा की भूमिका

आज का समय सूचना का युग है। सोशल मीडिया, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विचारों के प्रसार को बेहद तेज कर दिया है। अब कोई भी व्यक्ति अपने विचार कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है।

यह एक तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करता है, क्योंकि हर किसी को अपनी बात कहने का अवसर मिलता है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है—सूचना की सत्यता।

आज लोग अक्सर बिना पूरी जानकारी के किसी विचारधारा का समर्थन या विरोध करने लगते हैं। “ट्रेंड” और “वायरल” होने की होड़ में कई बार अधूरी या गलत जानकारी भी तेजी से फैल जाती है। ऐसे में विचारधारा का आधार तर्क और विवेक की बजाय भावनाएँ बन जाती हैं।

किसी विचारक ने कहा है—

“तेज़ी से फैलने वाला हर विचार सत्य नहीं होता।”

यह बात आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाती है। इसलिए जरूरी है कि हम किसी भी विचार को अपनाने से पहले उसे परखें, उसके पीछे के तथ्यों को समझें और फिर अपना दृष्टिकोण बनाएँ।

विचारधारा और व्यक्तित्व का संबंध

विचारधारा केवल बाहरी दुनिया को देखने का नजरिया नहीं है, बल्कि यह हमारे व्यक्तित्व का भी आधार होती है। एक उदार विचारधारा वाला व्यक्ति सामान्यतः सहानुभूतिपूर्ण और समझदार होता है, जबकि एक संकीर्ण विचारधारा वाला व्यक्ति अक्सर कठोर और असहिष्णु हो सकता है।

यहाँ यह भी ध्यान देने वाली बात है कि विचारधारा स्थिर नहीं होती। समय के साथ यह बदल भी सकती है। जैसे-जैसे हम नए अनुभवों से गुजरते हैं, नए लोगों से मिलते हैं और नई परिस्थितियों का सामना करते हैं, हमारी सोच भी विकसित होती है।

एक गहरी बात कही गई है—
“बदलाव से डरने वाली विचारधारा, समय के साथ खुद ही अप्रासंगिक हो जाती है।”

इसलिए एक स्वस्थ विचारधारा वही है, जो समय के साथ खुद को बदलने की क्षमता रखती हो।

कट्टरता बनाम खुलापन

विचारधारा का सबसे खतरनाक रूप तब सामने आता है, जब वह कट्टरता में बदल जाती है। कट्टरता का मतलब है—अपने विचारों को ही अंतिम सत्य मान लेना और दूसरों के विचारों को पूरी तरह खारिज कर देना।

कट्टर सोच व्यक्ति को सीमित कर देती है। वह नए विचारों को स्वीकार नहीं कर पाता और धीरे-धीरे उसका दृष्टिकोण संकुचित होता चला जाता है। इसके विपरीत, एक खुली विचारधारा व्यक्ति को सीखने, समझने और आगे बढ़ने का अवसर देती है।

यहाँ एक प्रसिद्ध कथन याद आता है—
“खुला दिमाग वही है, जो नई रोशनी को भीतर आने देता है।”

इसलिए यह जरूरी है कि हम अपनी विचारधारा को लेकर सजग रहें, लेकिन उसे कठोर और अडिग न बनने दें।

विचारधारा और समाज का विकास

किसी भी समाज की दिशा और गति उसकी प्रमुख विचारधाराओं पर निर्भर करती है। यदि समाज में समानता, न्याय और सहिष्णुता जैसी विचारधाराएँ मजबूत हैं, तो वहाँ शांति और विकास की संभावना अधिक होती है।

इसके विपरीत, यदि समाज में भेदभाव, असहिष्णुता और संकीर्णता की विचारधारा हावी हो, तो वहाँ संघर्ष और अस्थिरता बढ़ती है।

इस संदर्भ में यह कहना गलत नहीं होगा कि विचारधारा केवल व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि यह सामूहिक जिम्मेदारी भी है। हम सभी अपने-अपने स्तर पर समाज की सोच को प्रभावित करते हैं—चाहे वह हमारे शब्दों के माध्यम से हो या हमारे व्यवहार के जरिए।

आत्ममंथन की आवश्यकता

आज के दौर में सबसे बड़ी जरूरत है—आत्ममंथन। हमें समय-समय पर यह सोचना चाहिए कि हमारी विचारधारा किस दिशा में जा रही है। क्या हम अपने विचारों को तर्क और संवेदनशीलता के आधार पर बना रहे हैं, या केवल भीड़ का हिस्सा बनकर चल रहे हैं?

आत्ममंथन हमें अपनी कमजोरियों को समझने और उन्हें सुधारने का अवसर देता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी विचारधारा को आँख बंद करके अपनाना सही नहीं है।

एक सरल लेकिन गहरी बात है—
“जो व्यक्ति खुद से प्रश्न नहीं करता, वह दूसरों को समझ भी नहीं सकता।”

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि , विचारधारा जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन यह अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है। इसका उद्देश्य हमें सही दिशा दिखाना है, न कि हमें सीमित करना।

एक अच्छी विचारधारा वह है, जो हमें सोचने की स्वतंत्रता दे, दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाए और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करे।

हमें यह समझना होगा कि विचारधारा का असली मूल्य तब है, जब वह हमें जोड़ती है, न कि तोड़ती है।

अंत में एक बात कहना उचित होगा—
“सच्ची विचारधारा वही है, जो इंसान को इंसान से जोड़ती है।”

यदि हम इस सिद्धांत को अपने जीवन में उतार सकें, तो न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन बेहतर होगा, बल्कि समाज भी एक अधिक शांतिपूर्ण और प्रगतिशील दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

-यशवन्त माथुर© 
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23 April 2026

डायरी

याद आती है 
वो एक डायरी 
जो बचपन की 
साथी थी 
जिसके हर पन्ने पर 
लिखी थीं 
कुछ बातें 
यूं ही अकेले में 
खुद से कुछ कहते हुए 
शब्द से शब्द को 
जोड़ते हुए 
दिवा स्वप्नों में 
खोते हुए। 
उस डायरी में 
रचा-बसा 
हर एक अक्षर 
खामोशी की आवाज़ बनकर 
भावी ताने-बाने बुनकर 
एकाकीपन को 
देकर नयी ऊर्जा 
बन जाता था 
जीवनी शक्ति। 
आज फिर 
इतने बरस बाद 
लाल आवरण वाली 
भूली बिसरी 
पंचतत्व में विलीन हो चुकी 
वह डायरी 
स्वप्न में आई 
मुस्कुराई 
और  बोली -
कि वह लेना चाहती है 
पुनर्जन्म 
होना चाहती है साकार 
टूटी निब वाली 
मेरी कलम के साथ। 

~यशवन्त माथुर©
23042026

16 April 2026

तनाव

तनाव
हिस्सा है
जीवन का
प्रकृति का
कल्पना का
सोच का
नक्शों पर
उकेरी हुई
सीमाओं का
जल, नभ 
और थल का।
तनाव
हिंसा है
अहिंसा है
सत्य है
मिथ्या है।
तनाव 
अखंडित है
तो खंडित भी है
पूजनीय 
और पतित भी है।
इसलिए 
तनाव की
अतिश्योक्तिपूर्ण
स्वाभाविकता के
परमाणु से भी 
किसी सूक्ष्म कण में
मैं ढूंढ रहा हूं
एक हिस्सा
शांति की
पुकार का।

~यशवन्त माथुर©
16042026

10 February 2026

इंसान और कुत्ता


इंसान 
इंसान होता है 
और 
कुत्ता, 
कुत्ता होता है 
दोनों प्रजातियों में 
स्वाभाविक अंतर होता है। 
इंसान 
जन्म से 
मरण तक 
कभी खुश होता है 
कभी रोता है 
संघर्षों में 
गिरता है 
उठता है 
चलता-फिरता है 
जागता है 
सोता है 
कुत्ते के साथ भी 
ऐसा ही होता है। 
कुत्ता 
दौड़ता है 
भागता है 
आवरगर्दी करता है 
खुले आसमान के नीचे 
जागता है 
सोता है 
दुखी होता है 
तो खुल कर रोता है 
किसी का डर 
उसको नहीं होता है। 
कुत्ता, 
कुत्ता ही होता है 
उसे नहीं होती 
नौकरी की चिंता 
न घरवालों की चिंता 
नहीं होता 
नातों-रिश्तों का झमेला 
उसके जीवन में 
न परीक्षा का झंझट 
न ही प्रतिशत का 
उसे एहसास नहीं होता 
भूख का 
न प्यास का 
उसे शरण देने वाला 
कोई अमीर इंसान 
उसे सुला सकता है 
मखमली गद्दे पर 
और कोई फुटपाथिया 
उसे तकिया बना कर 
खुद सोता है 
रख कर सिरहाने पर। 
इंसान 
सिर्फ अमीर ही अच्छा होता है 
और गरीब इंसान से 
लाख गुना बेहतर होता है 
आज के दौर में 
आवारा कुत्ता होना। 
.
-यशवन्त माथुर© 
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08 February 2026

कुछ लोग-60

कुछ लोग 
वक़्त से 
पाले रहते हैं उम्मीदें 
इस आस में 
कि उसके बीतने या 
बदलने के साथ ही 
बदल सकेगा 
कुछ अपनों का 
चरित्र -
चेहरा और सोच;
लेकिन 
प्रगीतिशीलता के मुखौटे 
और काली वास्तविकता का 
बड़ा अंतर,
पुरातन रूढ़िवादिता ,
अहं और सर्वोच्चता की 
अवधारणा 
शायद  
निकलने नहीं देती  
कुछ लोगों को 
उनके बाह्य आवरण से बाहर 
और शायद इसीलिए 
उनके अपनों की 
उम्मीदें तोड़ देती हैं दम 
चरम पर पहुँचने के 
बहुत पहले
छटपटाते हुए ।  

-यशवन्त माथुर© 
08022026 
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10 January 2026

जरूरी है......

जरूरी है
दिन, दोपहर और 
उजाले से परे
कभी -कभी
अंधेरे का होना
घने कोहरे का होना
और एकांत का कोना
जहां 
आत्ममुग्धता के चरम पर
आत्मचिंतन की -
वास्तविकता में
मेरे जैसा कोई
चख सके स्वाद
नीम जैसी-
वास्तविकता का।
.
~यशवन्त माथुर©
10012026

04 January 2026

गलतियाँ ........

कुछ गलतियाँ 
गलती से हो जाती हैं 
कुछ नासमझी,
नादानी से 
कुछ भावनाओं में बहकर 
अनचाहा ही 
कुछ कहकर 
कुछ गलतियाँ 
छोड़ जाती हैं 
अपनी खरोंचों के निशान 
ऐसी जगहों पर 
जिनपर नजर पड़े बिना 
पूरा नहीं होता 
किस भी रास्ते पर 
कोई भी सफर। 

-यशवन्त माथुर© 
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01 January 2026

नव वर्ष

नयी उम्मीदों के साथ 
नयी बातों के साथ 
नए ख्यालों के साथ 
ख्वाब सबके पूरे हों ।
 
जो बरसों से अधूरे रहे 
अनकहे-अनसुने रहे
चाहे जितने प्रकार हों 
शब्द सब  साकार हों। 

नया सूरज कुछ कहता रहे 
हर दिन कुछ बनता रहे  
रात का अंधेरा छँटता रहे 
प्रेम भाव बँटता रहे। 

नववर्ष!
आशा का प्रतीक हो
उल्लास से व्यतीत हो 
तिनका-तिनका खुशियों से 
घर-आँगन रोशन हो। 

~यशवन्त माथुर©

03 November 2025

MGIMT और शेखर ग्रुप ऑफ कॉलेजेस ने मनाया 17वाँ स्थापना दिवस

खनऊ। कानपुर रोड बन्थरा स्थित MGIMT और शेखर ग्रुप ऑफ कॉलेजेस के संयुक्त तत्वावधान में चार दिवसीय वार्षिकोत्सव एवं 17 वां स्थापना दिवस समारोह ‘ऊर्जा’ एवं ‘आरोहण’ के बैनर तले  सफलतापूर्वक मनाया गया। इस आयोजन में संस्थान के बी टेक, पॉलिटेक्निक, बी एड, फार्मेसी एवं पैरामेडिकल के छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ खेल गतिविधियों एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों  में शिरकत की। 


समारोह के आज अंतिम दिन (3 नवंबर को) मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (चिकित्सा स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं चिकित्सा शिक्षा) श्री अमित कुमार घोष ने उपस्थित  छात्र-छत्राओं एवं  गणमान्य जनों को संबोधित करते हुए कहा कि पूरे प्रदेश ही नहीं बल्कि देश और दुनिया को बेहतरीन तकनीकी विशेषज्ञों, शिक्षकों, फर्मासिस्ट और पैरामेडिकल कर्मियों की आवश्यकता है। यही एक ऐसा क्षेत्र है जहां योग्य अभ्यर्थियों के लिए सुनिश्चित रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। ऐसी स्थिति में अपने गुणी गुरुजनों के कुशल मार्गदर्शन में संस्थान के छात्र-छात्राएं  गागर में सागर की तरह देश और समाज की सेवा में अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं। 


विशिष्ट अतिथि आयकर आयुक्त भारत सरकार श्री रजत कुमार ने मुख्य अतिथि की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि प्लेसमेंट के क्षेत्र में एम जी इंस्टीट्यूट का रिकॉर्ड सर्वोत्कृष्ट रहा है जिसका एक मात्र कारण संस्थान के बेहतरीन शिक्षकों का समर्थन एवं कुशल मार्गदर्शन ही है। कुशल एवं योग्य शिक्षक सुनार की तरह होते हैं जो छात्र-छात्राओं की मेधा को तराशकर उन्हें देश और समाज मे अपने कार्यों से चमकने योग्य बनाते हैं।  


अपने सम्बोधन में संस्थान के अधिशासी निदेशक श्री निहित कुमार शेखर ने ए.आई. और तकनीकी के प्रयोग पर जोर देते हुए कहा कि नई तकनीक का अनुसरण हमारे विकास की संभावनाओं को बहुत बढ़ा सकता है। हमे अपनी परंपरा के साथ ही तकनीकी नवप्रवर्तनों से खुद को समृद्ध एवं जागरूक रखने का प्रयास करते रहना चाहिए।  


इस अवसर पर संस्थान के निदेशक प्रो. (डॉ.) जे पी श्रीवास्तव ने कहा कि एम जी इंस्टीट्यूट एवं शेखर ग्रुप ऑफ कॉलेजेस अपने सभी छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास के लिए सदैव प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि जिस उत्साह के साथ छात्र-छत्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं खेलकूद मे प्रतिभाग किया वैसा ही उत्साह उनकी शैक्षिक गतिविधियों में भी सदैव बना रहना चाहिए जो कि उनके बेहतर परीक्षा परिणाम हेतु लाभकारी होगा। 


संस्थान के चेयरमैन पूर्व प्रशासनिक अधिकारी श्री सी एल शेखर ने सभी आमंत्रित अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अपने सम्बोधन में कहा कि17 वें स्थापना दिवस के पड़ाव तक पहुचना कोई आसान काम नहीं था। बल्कि यहाँ तक पहुचने के लिए संस्थान प्रबंधन, शिक्षकों व कर्मचारियों के अथक परिश्रम और समर्पण का भी योगदान रहा है।  हम सभी को अपने निजी जीवन में कुछ न कुछ पढ़ने की आदत बनानी चाहिए। अकादमिक पढ़ाई खत्म होने के बाद भी स्वाध्याय का नियमित क्रम हम सभी को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार न केवल मनोबल प्रदान करता है बल्कि जीवन की कठिनाइयों से उबरने का संबल भी देता है। 


कार्यक्रम के अंत में मेधावी छात्र-छत्राओं का सम्मान करते हुए डीन स्टूडेंट्स वैलफ़ेयर श्री विवेक कुशवाहा, डीन एकेडमिक्स डॉ कुंदन कुमार, प्रधानाचार्य बी.एड डॉ. अंजली पुरवार, प्रधानाचार्य पॉलिटेक्निक श्री सौरभ गुप्ता, प्रधानाचार्य फार्मेसी डॉ अंकित शुक्ल ने सभी के उज्वल भविष्य की कामना की।


कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रमुख रूप से श्रीमती पारुल बाजपेयी, डॉ अकरम अंसारी, शशांक देव निगम, सुश्री पूजा सिंह, श्रीमती नेहा सिंह, विमलेश मिश्र, सच्चिदानंद, सुश्री प्रिया तिवारी, प्रवीण वर्मा, संतोष चौधरी, श्रीमती अनुराधा यादव, सुश्री नरगिस, भरत उपाध्याय, अभिषेक मौर्य, अमन यादव, श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव, सिद्धार्थ श्रीवास्तव, श्रीमती नीतू यादव,अजय प्रताप सिंह, आशुतोष सिंह, यदुवेन्द्र मौर्य आदि का सराहनीय योगदान रहा। 

                      
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