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15 August 2022

आजादी का जश्न मनाएँ ?


चौराहों पर अक्सर दिखते
हाथ फैलाए भूखे नंगे
इंसान से इंसान ही कहता
दूर हटो! रे! भिखमंगे

फिर भी हैं कुछ
जो खिला पिला कर
महंगाई में दया दिखाएँ 
आजादी का जश्न मनाएँ ?
 
बचपन के दो गजब नजारे
दिखते अक्सर आते जाते
एक -  स्कूल में पढ़ते लिखते
दूसरे- कूड़ा बीन सकुचाएँ 
आजादी का जश्न मनाएँ ?
 
खत्म हुआ सब रिश्ता नाता
कोरोना दूरी बनवाता
ऐसे में कैसे कुछ मीठा
जब हो सबकुछ
खट्टा तीता। 

हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई 
आपस में सब लड़ते जाएँ  
आजादी का जश्न मनाएँ ?

निरपेक्षता के स्थायी भाव में 
संविधान की आत्मा बसती 
लेकिन 'नए भारत' में 
बसा रहे हम कैसी बस्ती ?

मजदूर किसान की दुर्गति में
'अमृत' को कैसे 'वर्षाएँ '
आजादी का जश्न मनाएँ ?
 
माना हुए वर्ष पचहत्तर
सौ , दो सौ , और हजार भी होंगे
सब ऐसे चलता रहा तो
जाने कैसे कहां को होंगे
 
फिर क्यों सच को
भूल-भाल कर
आंख मूंद कर खुश हो जाएँ 
आजादी का जश्न मनाएँ ?
 
-यशवन्त माथुर©

07 August 2022

Bad Image Error और हम......

ल पापा के कंप्यूटर पर यह एरर आने लगी। काफी जतन करने के बाद भी जब नहीं सुधरी तो फॉर्मेट करके विंडोज को फिर से डालना पड़ा।

कुछ लोग ऐसी ही bad image अचानक से हमारे आस पास आकर बना लेते हैं। जब तक उनसे बनती है तब तक हमें यह पता तक नहीं चलता कि हमारे लिए उनके मन में क्या क्या भरा है और फिर एक दिन उनकी जुबान से जो 'प्रशंसा गीत' झरते हैं तब यह एरर वास्तव में डिटेक्ट होती है।

इस एरर को ठीक करने के प्रयास तो हम उनसे बात करके/ खोजबीन करके /गलतफहमी को दूर करके करते ही हैं और फिर भी जब बात न बने तो ऐसे में हमें अपने फ्रेंड सर्किल को फॉर्मेट करना ही पड़ता है।

पुरानी बातों और यादों के सारे सॉफ्टवेयर फिर से इंस्टाल या री-इंस्टाल करने की यह कसरत थोड़ी लम्बी और थकाऊ होने के साथ सिरदर्द और तनाव देकर आखिरकार कुछ समय के लिए आंखों को शटडाउन करा सोने को मजबूर कर देती है।

...और फिर जब एक नई सुबह, एक नए ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ हम अपनी जीवन यात्रा फिर से शुरू करते हैं तब लगता है कि यह फॉर्मेटिंग कितनी जरूरी थी।

-यशवन्त माथुर ©
07 अगस्त 2022 

17 July 2022

सड़क



लगता है
सड़क
सड़क नहीं, नदी है! 
जिस पर चलने वाले वाहन, 
पानी का सैलाब हैं। 
कहीं किसी किनारे खड़े 
हम जैसे लोगों को भी 
इन लहरों का हिस्सा बन कर 
चाहे अनचाहे 
मिल ही जाना होता है जीवन चक्र में;
हमेशा से हमेशा ही।

-यशवन्त माथुर©
14072022 

09 July 2022

सोचता हूँ ......


सोचता हूँ 
जीवन के हर सूक्ष्म 
या सूक्ष्मतम पल पर 
हमारे चेतन या अवचेतन में 
पलने वाली 
हर दुआ-बददुआ का 
अंततः क्या होता होगा?
कुछ को तो हम 
देख ही लेते हैं 
प्रत्यक्ष 
फलीभूत होते हुए 
और कुछ की 
युगों जैसी 
प्रतीक्षा करते हुए 
निकल पड़ते हैं 
शून्य से शून्य की 
अनंत यात्रा पर 
सब कुछ छोड़ कर 
सब कुछ भूल कर 
सिर्फ 
प्रारब्ध की 
उस बड़ी सी 
पोटली के साथ 
जिसकी हर तह में 
हिसाब होता है 
दुआ और बददुआ के 
हर छोटे-बड़े 
व्यापार का। 

-यशवन्त माथुर©
09072022

30 June 2022

बरसात

(सुनने के लिए कृपया पधारें: https://youtu.be/p9QVmeMM4ek)

बरसात!
अब नहीं रही 
पहले जैसी 
बचपन जैसी 
अल्हड़- 
बेबाक- 
खुशगवार  
देहरी पर 
जिसका 
पहला कदम पड़ते ही 
तन के साथ 
मन भी झूम उठता था 
बादलों की गरज 
और रिमझिम के साथ 
कहा और लिखा जाने वाला 
एक-एक शब्द 
नई परवाज़ के साथ 
रचा करता था 
इतिहास के 
नए पन्ने। 

बरसात!
अब नहीं लाती  
खुशियां 
लाती है तो सिर्फ 
गंदी-बदबूदार नफरत 
जिसे बहने का रास्ता 
अगर मिल जाता 
तो मंजिल तक 
जाने वाला रास्ता 
नहीं होता 
ऊबड़-खाबड़ 
और गड्ढे दार। 


-यशवन्त माथुर©

14 May 2022

अनुत्तरित प्रश्न......


यूं तो 
मन के हर कोने में 
विचरते रहते हैं 
ढेर सारे प्रश्न 
और उनके 
सटीक 
या अनुमानित उत्तर 
फिर भी 
कुछ ऐसे प्रश्न भी होते हैं 
जिनके उत्तर की चाह में 
सैकड़ों योनियों में भटकते हुए 
बीत जाते हैं 
कितने ही पूर्व 
और भावी जन्म। 
हम 
कितने ही चोले बदलते हुए 
कितने ही देश-काल 
और परिस्थितियों से जूझते हुए 
कितनी ही भाषाओं -
संस्कृतियों से गुजरते हुए 
संभावित मोक्ष की देहरी पर 
दस्तक देते हुए भी 
अतृप्त रह ही जाते हैं 
क्योंकि 
अपने अजीब से 
मोहपाश में बांधकर 
अनुत्तरित प्रश्नों का 
एकमात्र लक्ष्य 
अनुत्तरित ही रहना होता है 
सदा-सर्वदा के लिए। 

-यशवन्त माथुर©
14052022

12 May 2022

तो कैसा हो?

मन 
कोरे कागज़ की तरह 
बिल्कुल खाली 
और नीरस हो 
तो कैसा हो?
शायद वैसा 
जैसा जीवन की देहरी पर 
पहला कदम रखते ही 
किसी नवजात का होता है 
या फिर 
किसी निर्मोही आवरण में 
कोई अपवाद हो
तो कैसा हो?
स्वाभाविक भेदों की तरह 
बिखरे रह कर भी 
गर शब्द निष्कपट हों 
तो कैसा हो?

-यशवन्त माथुर©
08052022 

18 April 2022

दो पल ....

एक भूले हुए दिन 
यहीं कहीं 
किसी कोने में 
मैंने रख छोड़े थे 
दो पल 
खुद के लिए।  
सोचा था-
जब कभी मन 
उन्मुक्त होगा 
किसी खिले हुए गुलाब की 
सब ओर फैली 
खुशबू की तरह 
तब उनमें से 
एक पल चुराकर 
महसूस कर लूँगा 
जेठ की तपती दोपहर में 
थोड़ी सी ठंडक। 
लेकिन 
भागमभाग भरे 
इस जीवन में 
कितने ही मौसम 
आए और गए 
कोने बदलते रहे 
मगर वो दो पल 
अभी भी वैसे ही 
सहेजे रखे हैं 
जीवन भर की 
जमा पूंजी की तरह। 

-यशवन्त माथुर©
18042022

29 March 2022

गेहूं का खेत और सभ्यता


पके हुए गेहूं से 
भरा-पूरा एक खेत 
और 
इस जैसे 
कई और खेत 
कभी 
किसी दौर में 
जकड़े रहते थे
बीघों फैली मिट्टी को 
जड़ों के 
रक्षासूत्र से। 

उस रक्षासूत्र से 
जिसकी आपस में उलझी 
कितनी ही गांठें
तने से मिलकर 
ले लेती थीं रूप 
बालियों जैसे 
खूबसूरत 
स्वर्ण कणों का।

लेकिन अब
अब   
कंक्रीट की 
सभ्यता के बीचों-बीच 
साँसों को गिनती 
झुर्रीदार 
बूढ़ी मिट्टी
किसी दुर्योधन के  
कँगूरेदार 
घोंसले की नींव में 
दफन हो कर 
हो जाना चाहती है 
इस लोक से मुक्त 
क्योंकि 
उसकी इज्जत का रखवाला 
कलियुग में 
कहीं कोई कृष्ण 
अब शेष नहीं।  

-यशवन्त माथुर©
29032022 

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