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09 October 2021

भक्त कौन?

भक्त कौन?
वो जो रोज
तुम्हारे दर पे आकर
मस्तक झुकाता है
बंद करता है पलकें
और कुछ बुदबुदाता है
शायद मांगता है
इच्छापूर्ति का वरदान
और बदले में
प्रस्तावित करता है
कुछ अर्पण
कुछ मिष्ठान पकवान।
या 
भक्त वो
जो कभी झांकता भी नहीं
तुम्हारे तथाकथित घर के भीतर
क्योंकि उसे लगता है
तुम कहीं 'भीतर' नहीं
प्रत्यक्ष, सर्वत्र, सार्वभौमिक हो
सबकी इच्छा-अनिच्छा समझकर
परीक्षा लेते हो
राह दिखाते हो।
भक्त
दोनों में से 
कोई भी हो
उसकी भक्ति के
उत्थान पतन चरम 
और अंतर्मन की
एक एक धारा
पहचानते ही हो
क्योंकि
तुम्हारा नाम 
कुछ भी हो
लेकिन
तुम जो हो
वो हो।

-यशवन्त माथुर©
0910201

29 September 2021

ख्याल....

ख्याल भी ऐसे ही होते हैं
जज़्बात भी ऐसे ही होते हैं
आसमान में उड़ते
जहाज़ की तरह
कभी नापते हैं
सोच, ख्यालों और
उद्गारों की
अनंत ऊंचाई को
और कभी
धीरे-धीरे
अपनी सतह पर
वापस आकर
तैयार होने लगते हैं
फिर एक
नई मंजिल की ओर
एक नई परवाज के लिए।
यह चक्र
असीम है
देश,काल
और वातावरण के
बंधनों से मुक्त
हमारे विचार
यूं ही
तैरते-तैरते
या तो तर जाते हैं
या भटकते ही रह जाते हैं
क्षितिज की
परिधि में ही कहीं।

यशवन्त माथुर©
29092021


22 September 2021

साधारण ही हूँ

हाँ 
साधारण ही हूँ 
यह जानकर 
और मान कर भी 
कि मेरे सम वयस्क 
हर एक मायने में 
निकल चुके हैं 
मुझसे कहीं आगे 
और मैं 
अब भी 
वहीं खड़ा हूँ 
अपने सीमित शब्दकोश की 
असीमित देहरी के भीतर 
जहां 
कल्पना का खाद-पानी पा कर
अंकुरित होती बातें 
अविकसित या 
अल्पविकसित ही रह कर 
पूर्ण हो ही नहीं पातीं 
क्योंकि मैं जानता हूँ 
अपने शाब्दिक कुपोषण का कारण 
क्योंकि मैं जानता हूँ 
मैं हूँ ही साधारण 
फिर भी नहीं छोड़ पाता मोह 
खुद से खुद के मन की कहने का 
धारा के विपरीत 
कुछ तो बहने का। 

-यशवन्त माथुर©
14072021

09 September 2021

ताला और जिंदगी

एक समय के बाद
जिन्दगी
हो जाती है
जंग लगे
ताले की तरह
जिसके खुलने से
कहीं ज्यादा
मुश्किल होता है
उसे
दोबारा
पहले जैसा
बंद करना।
ठीक ऐसे ही
वक्त की कब्र में
भीतर तक दबे राज़
खुद खुद कर
जब आने लगते हैं सामने
तब नामुमकिन ही होता है
उसे पहले की तरह
पाटना और समतल करना
क्योंकि
बदलाव के नए दस्तूर
और ऊबड़ खाबड़ पाखंड
मिलने नहीं देते
श्वासों के चुनिंदा
अवशेषों को
स्मृतियों की
दो गज जमीन।

-यशवन्त माथुर©
29082021

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