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22 November 2013

और सफर जारी है

बिखरी चट्टानों पर
लहरों का असर तारी है
चल रही हैं सांसें
और  सफर जारी है

साँसे जिन पर
न मेरा वश है न किसी और का
मालिक ही लिखता है पता
पिछले और अगले ठौर का

उस मुकाम पे खुश हूँ
जिसे पाया है अब तलक
ज़मीं पे रह कर ही
छूना चाहता हूँ फ़लक

चलना है चल रहा हूँ 
न जाने कौन सी खुमारी है
लहरों को रोकती चट्टानें
और सफर ज़री है।

~यशवन्त यश©

9 comments:

  1. बनी रहे ये खुमारी
    सफर रहे इसी तरह जारी....
    सुंदर भावयुक्त रचना...

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  2. chalte jana jeevan hai aur ruk jana ant nahi apitu agle safar ki taiyaari hai.

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  3. बहुत सुंदर रचना.

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (23-11-2013) "क्या लिखते रहते हो यूँ ही" “चर्चामंच : चर्चा अंक - 1438” पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  5. आपका सफर ऐसे ही जारी रहे... बहुत सुन्दर रचना

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  6. सफ़र यूँ ही अबाध जारी रहे. शुभकामनाएं!

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  7. जमीं पे रह कर ही
    छूना चाहता हूँ फलक
    बेहद खूबसूरत पंक्तियां.....

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  8. बहुत सुन्दर

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  9. सफर जारी ही रहनी चाहिए..शुभकामनाएं

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