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24 February 2022

बदलते रंग

कभी धूप 
कभी छाँव के 
बदलते रंगों में 
कोशिश करता हूँ 
एक रंग 
अपना पाने की 
और उसी में घुलकर 
उस जैसा ही हो जाने की 
दुनियावी मायाजाल को समझकर 
धारा के साथ ही 
बह जाने की। 

लेकिन मेरे भीतर बैठा 
मेरा अपना सच 
लाख चाहने के बाद भी
डिगा नहीं पाता 
कतरे-कतरे में घुली 
रची और बसी
मौन  
विद्रोही प्रवृत्ति को 
जो अपने चरम के पार 
मुखर होते ही 
बेरंग कर देती है 
बहुत से रंगों को। 

और इसलिए 
सिर्फ इसीलिए 
जीवन के 
किसी एक क्षण भर को 
जी लेना चाहता हूँ 
बसंत बन कर 
ताकि रहे न कोई अफसोस 
ताउम्र 
रंगहीन होने का। 

-यशवन्त माथुर©
24022022

10 February 2022

दौर बदलना बाकी है ...


कितना कुछ लिख डाला 
और कितना लिखना बाकी है 
शब्दों के मयखाने में 
और कितना पीना बाकी है। 

करता कोशिश कुछ कहने की
लेकिन सुनना बाकी है 
बन जाए जिनसे कोई कविता 
वो अक्षर चुनना बाकी है।  

देखो बसंत की इस हवा को 
और कितना बहना बाकी है 
दूर नहीं दोपहर जेठ की 
बस दौर बदलना बाकी है। 

-यशवन्त माथुर ©
10022022 

02 February 2022

क्या होगा इनबॉक्स में आकर?


क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
क्या होगा
मुखौटा उतारकर 
जो तुम कहना चाहते
मुझे सुनना नहीं
जो मुझे कहना है
पढलो 
मेरी वॉल पर आकर।
क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
रख दोगे
अपना चरित्र
गिरवी अपने शब्दों से
और चाहोगे
मैं गिर जाऊं
तुम्हारी बातों में आकर।
क्या होगा
इनबॉक्स में आकर?
नख-शिख तक
देह-वस्त्र विश्लेषण
क्या करूं
मैं तुमसे पाकर
क्या होगा 
इनबॉक्स में आकर?
अपनी राह पर
तुम चलो
और चलने दो
मित्रता पाकर
भले अगर मानस हो सच में
क्या होगा 
इनबॉक्स में आकर?

(महिलाओं के सोशल मीडिया इनबॉक्स में बेवजह आने वाले शूर वीरों को समर्पित)

-यशवन्त माथुर©
02022022

01 February 2022

भूले हुए रास्ते ....

बीतते समय के साथ 
भूलते हुए 
अपना गुजरा हुआ कल 
हम चलते चले जाते हैं 
अनजान पगडंडियों पर 
जिनपर छूटे हुए 
हमारे कदमों के निशान 
या तो बने रहते हैं स्थायी 
या वह भी 
मिट ही जाते हैं 
एक न एक दिन 
एक कहानी बनकर 
कभी किसी स्वप्न में .. 
किसी और वास्तविकता में 
याद तो आते ही हैं 
हमारे पूरे-अधूरे रास्ते
जिनपर चलकर 
किसी  बीते दौर में 
हमको मिली ही होगी 
अपनी मंजिल 
इसलिए 
भूलना चाहकर भी 
हमारे अवचेतन से 
नहीं निकलते 
भूले हुए रास्ते 
और बीता हुआ कल। 

-यशवन्त माथुर©

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