प्रतिलिप्याधिकार/सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।
Showing posts with label पंक्तियां. Show all posts
Showing posts with label पंक्तियां. Show all posts

04 September 2023

उजालों की तलाश में........

उजालों की तलाश में आया था, अंधेरे मिले।
जब अंधेरे पसंद आए, सुनहरे सवेरे मिले।

और फिर ऐसा ही अक्सर होता गया।
जो अच्छा लगता, दूर होता गया।

चाहत फूलों की की, गले कांटे मिले।
हर कदम पे झूठे वादे मिले।

किसी ने कहा था कि फरिश्ता हूं मैं।
दोस्ती का सच्चा रिश्ता हूं मैं।

मगर अब जान पाया, कि सिर्फ छला ही गया।
एकतरफा खुद ही था, मिला ही क्या।

मिल कर सब रंग भी, बे रंग ही मिले।
बंद मुट्ठी में बचे सिर्फ शिकवे- गिले।
.
- यशवन्त माथुर©
03092023

13 August 2023

मजदूर हूं, मजबूर नहीं

कल का हिसाब क्या रखूं
आज का कुछ पता नहीं।
बेवजह खफा होते हैं वो
जब की कोई खता नहीं।

यूं बैठे-ठाले दौरों के इस दौर में
खानाबदोश हूं चलते फिरते ठौर में।

फिर भी जो मैं हूं, मैं ही हूं आखिर।
दुनियावी फितरतों में कोई फकीर नहीं।

ये और बात है कोल्हू का बैल हूं, माना।
मजदूर हूं अदना सा, लेकिन मजबूर नहीं।

-यशवन्त माथुर©
08072023

01 January 2022

सबको नया साल मुबारक

सुबह नई, बातें वही
सूरज को नमस्कार मुबारक
परिवर्तन शुभ हो समय का
सबको नया साल मुबारक।

महंगाई को झेल रहे सब
बेरोजगारी के आलम में 
फुटपाथ पे रहने वालों को
महलों के सब ख्वाब मुबारक।

शतरंजी चालों को चलते
चुनावी वादों को करते
भीतर से जो सभी एक हैं
उनको जीत और हार मुबारक।

सबको नया साल मुबारक
उम्मीदों का हर हाल मुबारक
हर 'आम'  खास बने कभी
ऐसा हर एहसास मुबारक।

 सबको नया साल मुबारक।

-यशवन्त माथुर©

08 December 2021

कुछ लोग-55

कुछ लोग
लगते हैं
देखने से भले
व्यवहार से
हितैषी
लेकिन उनके भीतर
पलता रहता है
विद्वेष
जिसकी झलक
कभी न कभी
दिखती है
उनकी कथनी- 
करनी के अंतर
और उनके चेहरे पर
उभर कर मिटती
आड़ी-तिरछी लकीरों के
आवागमन से। 
यूं तो
विद्वेष
होता है
स्वाभाविक भी
फिर भी
कुछ लोग
अधिकतर नहीं होते संतुष्ट
अपने 
और किसी और के
सुख-दु: ख की
चारित्रिक 
असंगतता से।

-यशवन्त माथुर©
08122021

26 November 2021

ऐसे ही नहीं कोई मजदूर होता है

तसला भर सपनों को
रोज़ सर पे ढोता है
ऐसे ही नहीं
कोई मजदूर होता है।
 
झोला भर जिंदगी उससे
क्या कुछ नहीं कराती
परदेसियों की बातें
क्या-कुछ नहीं दिखातीं।
 
दूसरों के मखमल सजा कर
खुद ज़मीन पे सोता है
ऐसे ही नहीं 
कोई मजदूर होता है।
 
हर शाम बातें करता है
सिरहाने की ईंट से
मौत रेंगकर निकलती है
अक्सर उसके करीब से।

ख्यालों की पाड़ लगाकर
हर महल से ऊंचा होता है
ऐसे ही नहीं
कोई मजदूर होता है।

-यशवन्त माथुर©
26112021
.

25 November 2021

गर कुछ लिखा न जा सका....

गहराती रात के साथ
शब्द भी खो जाते हैं
कहीं गहरी नींद में
अक्षर भी सो जाते हैं ...
जो दिन में
मन के कहीं भीतर उभर कर
सफर तय करते हैं
होठों से उंगलियों में जकड़ी
कलम तक का
लेकिन शाम होते होते
कागज की देहरी पर
विस्मृत हो जाते हैं..
विलुप्त हो जाते हैं..
क्योंकि अंधेरे की आहट पाकर
अवचेतन ओढ़ लेता है
आलस्य की लंबी चादर
और फिर
अर्द्ध मूर्च्छा में
रह जाता है
इंतजार
सिर्फ उस सुबह का
जिसमें
गर कुछ लिखा न जा सका
तो फिर से चलने लगता है
कटु सत्य की धुरी पर
समय का वही चक्र।

-यशवन्त माथुर©

24112021

07 November 2021

अभी बाकी है....

ढल गया एक दिन ऐसे ही, तो क्या हुआ,
फिर एक रोशन दिन की, उम्मीद अभी बाकी है।

उदासियों के बादल भी छंट कर बरसेंगे कभी तो,
सोंधी खुशबू मिट्टी की, उठनी अभी बाकी है।

ख्यालों का क्या है, आते जाते ही रहते  हैं,
गर ठहरे शब्द, तो पन्नों पर, उतरना अभी बाकी है।
.
-यशवन्त माथुर©
06112021
​

18 October 2021

कोई अपना नहीं......

कोई अपना नहीं सब पराए से हैं।
अपनी खुशियों में भरमाए से हैं।
जब वक्त था कुछ करने का, मुकर गए।
अब न जाने क्यों कुलबुलाए से हैं।
उनकी खूबियों को बाखूबी जान लिया था हमने।
याद पीछे की दिलाई तो अब शरमाए से हैं।
चाहते हैं जानना कि पता, अपना हम बता दें उनको।
लेकिन लगता नहीं कि करनी पर पछताए से हैं।
 
-यशवन्त माथुर©

18102021


16 October 2021

अक्स देखता हूं....

एक अक्स देखता हूं
बादलों में कहीं
गुमनाम हो चुका
एक शख्स देखता हूं
डूबते सूरज के साथ
आसमां में खोते हुए
सुबह फिर मिलेंगे
कहते हुए
यह उसका भरोसा है
और मेरे अंदर का डर
बनते अंधेरे में उसको
सवेरा सोचता हूं..
बादलों में कहीं
एक अक्स देखता हूं।

-यशवन्त माथुर©
16102021

09 October 2021

भक्त कौन?

भक्त कौन?
वो जो रोज
तुम्हारे दर पे आकर
मस्तक झुकाता है
बंद करता है पलकें
और कुछ बुदबुदाता है
शायद मांगता है
इच्छापूर्ति का वरदान
और बदले में
प्रस्तावित करता है
कुछ अर्पण
कुछ मिष्ठान पकवान।
या 
भक्त वो
जो कभी झांकता भी नहीं
तुम्हारे तथाकथित घर के भीतर
क्योंकि उसे लगता है
तुम कहीं 'भीतर' नहीं
प्रत्यक्ष, सर्वत्र, सार्वभौमिक हो
सबकी इच्छा-अनिच्छा समझकर
परीक्षा लेते हो
राह दिखाते हो।
भक्त
दोनों में से 
कोई भी हो
उसकी भक्ति के
उत्थान पतन चरम 
और अंतर्मन की
एक एक धारा
पहचानते ही हो
क्योंकि
तुम्हारा नाम 
कुछ भी हो
लेकिन
तुम जो हो
वो हो।

-यशवन्त माथुर©
0910201
+Get Now!