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16 March 2018

मैं देवी हूँ-9 (नवरात्रि विशेष)

इन नौं दिन
तुमने पूजा है
पत्थर की मेरी मूरत को। 
उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर के
तुमने मांगी हैं मन्नतें
दु:ख के जाने और
सुख के आने की।
सप्तशती के
सात सौ श्लोकों के साथ 
तुमने रखे हैं
फलाहार और निर्जल व्रत।

लेकिन कभी सोचा है
क्या होगा इस सबसे ?

क्या बदल पाए हो
खुद की नज़रों और
नजरिए को ?

क्या निकल पाए हो
अपनी पुरातन सोच के
दायरे से ?

नहीं
कुछ बदलाव नहीं होगा
बस भ्रम बना रहेगा
यूं ही चारों ओर
क्योंकि
तुम्हारी हर क्रिया-प्रतिक्रिया का
रहस्य मैं जानती हूँ
मैं! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018


मैं देवी हूँ-8 (नवरात्रि विशेष)

मैं!
बन कर रह गयी हूँ
पैमाना
सिर्फ
अपने रूप-रंग
और वाह्य आकर्षण का ही।

मुझे मापा जाता है
मेरे गोरा या काला होने से
पतला या मोटा होने से
लंबा या नाटा होने से
अनपढ़ या पढ़ा लिखा होने से ।

मुझे तोला जाता है
मेरे पिता की संपत्ति के तराजू में
जिसके एक पलड़े पर
होने वाले दामाद की
सरकारी नौकरी बैठती है
और दूसरे पलड़े पर
खैरात की कार,बाइक
और अन-गिनत अपेक्षाएँ
कोशिश करती हैं
संतुलन बनाने की।

खुद ही
खुद के हक से वंचित हो कर
इस विकसित युग में भी
कई बेड़ियों से
जकड़ी हुई हूँ
मैं ! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018

मैं देवी हूँ -7 (नवरात्रि विशेष)

कई रूप
कई स्वरूप हैं मेरे
लेकिन क्या
मेरे 'स्वयं' के दर्शन
कभी कर पाई हूँ ?
अपने पिता-भाई
और माँ के लिए
पराई हूँ
श्वसुराल में
बाहर से आई हूँ।

मेरी खुद की
इच्छाएँ
महत्त्वाकांक्षाएँ 
दब जाती हैं
हर देहरी के भीतर
क्योंकि मुझे
जानने -समझने
और मानने वाला
दूर -दूर तक
कोई नहीं।

मैं!
खुद ही निराशा में
आशा को ढूंढती फिरती हूँ
खुद से ही
खुद की बातें किया करती हूँ
मैं! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018

23 September 2017

मैं देवी हूँ-6 (नवरात्रि विशेष)

मेरे नाम से
न जाने कितनी ही
आहुतियाँ दी जाती हैं
रोज़
यज्ञ वेदी पर
कभी सरस्वती
कभी लक्ष्मी
कभी दुर्गा
और कभी काली
न जाने कितने ही नाम
रच दिए गए हैं मेरे
लेकिन क्या
इन नौ दिनों के अलावा
तुमने देखा है
मुझे
इन्हीं पूज्य रूपों में?
अगर हाँ
तो आखिर क्यों ?
मैं दिखती हूँ
अखबार की सुर्खियों में !
आखिर क्यों ?
सबको दिखता है
सिर्फ मेरा वाह्य आवरण!
आखिर क्यों ?
सबकी नज़रें
करती हैं
रोज़ चीर-हरण मेरा !
जानती हूँ!
इन प्रश्नों का सही जवाब
न है
न कभी मिलेगा
पर इतना समझ लेना
कि
मैं
कोमल नहीं
तुम्हारे हर
पुरुषार्थ की जननी हूँ
मैं देवी हूँ!

-यश©

इस  शृंखला की पूर्व सभी किश्तें इस लिंक पर क्लिक करके देखी जा सकती हैं

21 September 2017

मैं देवी हूँ -5 (नवरात्रि विशेष)

यह समाज
यह आस-पड़ोस
यह रिश्ते-नाते
क्या सच में मेरे हैं
क्या सच में अपने हैं
या बस
यूं ही
अपने भीतर की
तमाम कुंठाओं का
प्रतिरूप
अपने स्मार्ट फोन की
स्क्रीन पर देखते हुए
तुम में से
कुछ लोग
करते रहोगे
छद्म गुणगान
जगरातों की
पैरोडी सुर-ताल पर।
मुझे पता है
तुम सबका असली रूप
मुझे मालूम है
तुम्हारे मन के
भीतर की एक-एक बात
एक-एक राज़
जो तुम्हारे चेहरे
और तुम्हारी नज़रें
खुद ही बता देती हैं
बस-ट्रेन और टेम्पो के भीतर
खुली सड़क पर
और हर
उस जगह
जहां मुझ पर
सवाल उठाने वाले
खुद ही बन जाते हैं
प्रश्न चिह्न
क्योंकि
मैं ही समिधा
और यज्ञ की वेदी हूँ
मैं देवी हूँ!

-यश©


इस  शृंखला की पूर्व सभी किश्तें इस लिंक पर क्लिक करके देखी जा सकती हैं

01 October 2014

मैं 'देवी' हूँ-4 (नवरात्रि विशेष)

दुनिया की सूरत
देखने से पहले ही
मुझे गर्भ में मारने वालों !
मेरे सपने सच होने से पहले ही
दहेज की आग में
जलाने वालों !
सरे बाज़ार
मेरी देह की
नीलामी करने वालों !
बुरी नज़रों से
देखने वालों !
गली कूँचों
पार्कों में
मेरे दरबार
सजाने भर से
जागरण की रातों में
फिल्मी तर्ज़ पर बने
भजन
और भेंटें गाने भर से
इन सब से
न तुम्हें पुण्य मिलेगा
न ही मोक्ष मिलेगा
क्योंकि
तुम्हारे असली कर्म
दर्ज़ हैं
हर 'दामिनी'
हर 'निर्भया'
के दिल और
आत्मा से निकली
बददुआओं के
एक एक शब्द में ........
क्योंकि
तुम्हारे असली कर्म
दर्ज़ हैं
नश्तर की धार से बहते
मेरे लहू की
एक एक बूंद में .....
क्योंकि
तुम्हारे असली कर्म
दर्ज़ हैं
आग में जलकर
राख़ हुए
मेरे हर अवशेष में.....
तो
तुम अब जान लो
मैं पत्थर में प्राण नहीं
मैं साक्षात हूँ
तुम्हारे ही आस पास
तुम्हारी माँ
बहन-वामा
या बेटी हूँ
मैं देवी हूँ।

~यशवन्त यश©
owo-18092014

29 September 2014

मैं 'देवी' हूँ-3 (नवरात्रि विशेष)

ओ इन्सानों !
हर दिन
न जाने
कितनी ही जगह
न जाने
कितनी ही बार
करते हो
कितने ही वार
कभी मेरे जिस्म पर
कभी मेरे मन पर
समझते हो
सिर्फ अपनी कठपुतली
तो फिर आज
क्यों याद आयीं तुम्हें
वैदिक सूक्तियाँ
श्लोक और मंत्र
क्या इसलिए
कि यह आडंबर
अपने चोले के भीतर
ढके रखता है
तुम्हारे कुकर्मों का
काला सच ?
पर याद रखना
आज नहीं तो कल
तुम्हें भस्म होना ही है
मेरी छाया की परिधि
के भीतर
चक्रव्यूह में
जिसे रोज़ रचती हूँ
मैं देवी हूँ।

~यशवन्त यश©
owo-17092014

27 September 2014

मैं 'देवी' हूँ -2 (नवरात्रि विशेष)

गूंज रहे हैं आज
सप्तशती के
अनेकों मंत्र
हवा मे घुलती
धूप-अगरबत्ती
और फूलों की
खुशबू के साथ
अस्थायी विरक्ति का
सफ़ेद नकाब लगाए
झूमते
कीर्तन करते
कुछ लोग
शायद नहीं जानते
एक सच
कि मुझे पता है
उनके मन के भीतर की
हर एक बात
जिसकी स्याह परतें
अक्सर खुलती रही हैं
आती जाती
इन राहों के
कई चौराहों पर
जहाँ से
अनगिनत
रूप धर कर
मैं रोज़ गुजरती हूँ
मैं देवी हूँ।

~यशवन्त यश©
owo-17092014

25 September 2014

मैं 'देवी' हूँ -1 (नवरात्रि विशेष)

आज से
शुरू हो गया है
उत्सव
गुणगान का
मेरी प्राण प्रतिष्ठा का
बिना यह समझे
बिना यह जाने
कि मिट्टी की
इस देह में
बसे प्राणों का मोल
कहीं ज़्यादा है
मंदिरों मे सजी
मिट्टी की
उस मूरत से
जिसके सोलह श्रंगार
और चेहरे की
कृत्रिम मुस्कुराहट
कहीं टिक भी नहीं सकती
मेरे भीतर के तीखे दर्द
और बाहर की
कोमलता के तराजू पर
मैं
दिखावा नहीं
यथार्थ के आईने में
कुटिल नज़रों के
तेज़ाब से झुलसा
खुद का चेहरा
रोज़ देखती हूँ
मैं देवी हूँ।

~यशवन्त यश©
owo-17092014

12 October 2013

वह हो गयी स्वाहा .......

उसने देखे थे सपने
बाबुल के घर के बाहर की 
एक नयी दुनिया के 
जहां वह
और उसके
उन सपनों का
सजीला राजकुमार
खुशियों के आँगन में
रोज़ झूमते
नयी उमंगों की
अनगिनत लहरों पर

उन काल्पनिक
सपनों का
कटु यथार्थ
अब आने लगा था
उसके सामने
जब उतर कर
फूलों की पालकी से
उसने रखा
अपना पहला कदम
मौत के कुएं की
पहली मंज़िल पर

और एक दिन
थम ही गईं
उसकी
पल पल मुसकाने वाली सांसें..... 
दहेज के कटोरे में भरा
मिट्टी के तेल
छ्लक ही गया
उसकी देह पर
और वह
हो गयी स्वाहा
पिछले नवरात्र की
अष्टमी के दिन। 

~यशवन्त यश©

07 October 2013

क्योंकि वह माँ नहीं......

कल सारी रात
चलता रहा जगराता
सामने के पार्क में
लोग दिखाते रहे श्रद्धा
अर्पण करते रहे
अपने भाव
सुगंध,पुष्प और
प्रसाद के साथ
नमन,वंदन
अभिनंदन करते रहे
झूमते रहे
माँ को समर्पित
भजनों-भेंटों की धुन पर ।

मगर किसी ने नहीं सुनी
नजदीक के घर से
बाहर आती
बूढ़ी रुखसाना की
चीत्कार
जो झेल रही थी
साहबज़ादों के कठोर वार
मुरझाए बदन पर  ।

कोई नहीं गया
डालने एक नज़र
क्या... क्यों... कैसे...?
न किसी ने जाना
न किसी ने समझा ...
क्योंकि
दूसरे धर्म की
वह माँ नहीं!
औरत नहीं!
देवी नहीं  !!

हमारी आस्था
हमारा विश्वास
बस सिकुड़ा रहेगा
अपनी चारदीवारी के भीतर
और हम
पूजते रहेंगे
संगमरमरी मूरत को
चुप्पी की चुनरी ओढ़ी
मुस्कुराती औरत के
साँचे में ढाल कर। 
 
~यशवन्त यश©

05 October 2013

वह देवी नहीं

सड़क किनारे का मंदिर
सजा हुआ है
फूलों से
महका हुआ है
ख़ुशबुओं से
गूंज रहा है
पैरोडी भजनों से
हाज़िरी लगा रहे हैं जहां
लाल चुनरी ओढ़े
माता के भक्त
जय माता दी के
जयकारों के साथ।

उसी सड़क के
दूसरे किनारे
गंदगी के टापू पर बसी
झोपड़ी के भीतर
नन्ही उमा की
बुखार से तपती
देह 
सिमटी हुई है
एक साड़ी से
खुद को ढकती माँ के
आँचल में। 

उसकी झोपड़ी के
सामने से
अक्सर निकलते हैं
जुलूस ,पदयात्रा , जयकारे
जोशीले नारे
पर वह
नन्ही उमा !
सिर्फ गरीब की देह है
देवी या कन्या नहीं
जिसे महफूज रखे हैं
आस-पास भिनकते
मच्छरों और मक्खियों की
खून चूसती दुआएं।

~यशवन्त यश ©
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