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07 May 2021

सबकी सुनता जाऊंगा.........

शब्दों के इस अथाह समुद्र की 
क्या तली को कभी छू पाऊँगा?
या ऐसे ही इन लहरों के संग 
अन्त तक बहता जाऊंगा ?

नहीं पता कहाँ पर मंज़िल
कब तक चलते जाना है ?
कितने कदम बढ़ चुका अब तक
और कितना थकते जाना है ? 

अपनी हदों के भीतर से
क्या बाहर कभी आ पाऊँगा ?
या निर्जीव दीवार के जैसे
सबकी सुनता जाऊंगा?

-यशवन्त माथुर©
29/01/2019

04 May 2021

जाने क्या काल ने ठाना है?

कितने ही चले गए 
और कितनों को जाना है 
थोड़ी सी ज़िंदगी है 
या मौत का बहाना है। 

अपनों का रुदन सुन-सुन कर 
गैरों की भी आँखें भरती हैं 
हर एक दिन की आहट पर 
क्या होगा सोच कर डरती हैं। 

दहशत बैठी मन के भीतर 
बाहर गहरे सन्नाटे में 
काली रात से इन दिनों में 
जाने क्या काल ने ठाना है?

(डॉक्टर वर्षा सिंह जी एवं मेरे मित्र डॉक्टर प्रशांत चौधरी,SDM,बरेली को विनम्र श्रद्धांजलि, 
जिनके असमय जाने से मेरा दिल टूट गया है)

-यशवन्त माथुर©
04052021

01 May 2021

सच तो सामने आएगा ही

सच 
सिर्फ वही नहीं होता 
जिसे हम देखते हैं 
या 
जो हमें दिखाया जाता है 
सच 
कभी-कभी छिपा होता है 
घने अंधेरे की 
कई तहों के भीतर 
जिसे कुरेदना 
आसान नहीं होता
और फिर भी 
शंकावान होकर 
गर कोई दिखाना चाहे भी 
तो उसे कर दिया जाता है किनारे 
पागल-सनकी और न जाने 
क्या-क्या कहकर 
इसके बाद भी 
कई युगों के बाद 
सच से 
साक्षात्कार का समय आने तक 
हम देख चुके होते हैं 
विध्वंस के कई दौर 
इसलिए 
बेहतर सिर्फ यही है 
कि हम सुनें 
उन चेतना भरी आवाजों को
जिन्हें दबा दिया जाता है 
हर तरफ उठ रही 
आग की लपटों 
और 
बेहिसाब शोर में। 

-यशवन्त माथुर©
01052021

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