जीवन के सफ़र में राही
मिलते हैं बिछुड़ जाने को
और दे जाते हैं यादें
तन्हाई में तड़पाने को .......
किसी ज़माने में किशोर का गाया यह नगमा गुनगुनाते हुए वह अपनी ही धुन में चला जा रहा था......काले मैले कपड़े.....जिन्हें सदियों से धोया न गया हो.....वह कौन था या है....पता नहीं....बस इन्सानों जैसा एक चेहरा....जिस पर खिंची हुई थीं.....भूख की आड़ी तिरछी लकीरें ...न जाने क्यों उसे देख कर.... कभी किसी की और बढ़ने में शर्माने वाले साहब के हाथ ....जेब में रखे नोट को मुट्ठी में भींच कर उसकी और बढ़ चले .....कुछ मिलने का एहसास उसे भी हो रहा था .....उसे भूख थी.....पर नोट की इच्छा नहीं ....इससे पहले कि उन हाथों से वह नोट उसकी झोली मे गिरता .......उसके मूंह से उसकी बनाई पैरोडी निकल पड़ी.....
ऐ भाई ज़रा देख के चलो ...
आगे भी नहीं....पीछे भी
ऐ भाई ...अपुन को नोट नहीं
कुछ खाने को दो.....
साहब के बढ़े हुए हाथ वापस लौट चले जेब में ....और फिर अब न कुछ कहने को बचा था....न कुछ करने को.....न ही आस पास कोई दुकान थी .... हाँ उनके के कंधे पर लटक रहा टिफिन बॉक्स खाली ज़रूर था मगर .....बची हुई जूठन से ...पर वह जूठन उसे देना.......? साहब का मन बोल उठा.....न यह नहीं हो सकता......
सोच में मग्न साहब को जब होश आया....वह चलते चलते .....उनकी आँखों की पहुँच के पार हो गया था.....और साहब अब भी वहीं खड़े थे......उसी चौराहे की लाल बत्ती पर।
©यशवन्त माथुर©
(लघु कथा लिखने का यह मेरा सबसे पहला प्रयास है। पता नहीं यह लघु कथा है या कुछ और ...फिर भी जब लिख गयी तो ब्लॉग पर छापने से खुद को रोक नहीं सका हूँ )
मिलते हैं बिछुड़ जाने को
और दे जाते हैं यादें
तन्हाई में तड़पाने को .......
किसी ज़माने में किशोर का गाया यह नगमा गुनगुनाते हुए वह अपनी ही धुन में चला जा रहा था......काले मैले कपड़े.....जिन्हें सदियों से धोया न गया हो.....वह कौन था या है....पता नहीं....बस इन्सानों जैसा एक चेहरा....जिस पर खिंची हुई थीं.....भूख की आड़ी तिरछी लकीरें ...न जाने क्यों उसे देख कर.... कभी किसी की और बढ़ने में शर्माने वाले साहब के हाथ ....जेब में रखे नोट को मुट्ठी में भींच कर उसकी और बढ़ चले .....कुछ मिलने का एहसास उसे भी हो रहा था .....उसे भूख थी.....पर नोट की इच्छा नहीं ....इससे पहले कि उन हाथों से वह नोट उसकी झोली मे गिरता .......उसके मूंह से उसकी बनाई पैरोडी निकल पड़ी.....
ऐ भाई ज़रा देख के चलो ...
आगे भी नहीं....पीछे भी
ऐ भाई ...अपुन को नोट नहीं
कुछ खाने को दो.....
साहब के बढ़े हुए हाथ वापस लौट चले जेब में ....और फिर अब न कुछ कहने को बचा था....न कुछ करने को.....न ही आस पास कोई दुकान थी .... हाँ उनके के कंधे पर लटक रहा टिफिन बॉक्स खाली ज़रूर था मगर .....बची हुई जूठन से ...पर वह जूठन उसे देना.......? साहब का मन बोल उठा.....न यह नहीं हो सकता......
सोच में मग्न साहब को जब होश आया....वह चलते चलते .....उनकी आँखों की पहुँच के पार हो गया था.....और साहब अब भी वहीं खड़े थे......उसी चौराहे की लाल बत्ती पर।
©यशवन्त माथुर©
(लघु कथा लिखने का यह मेरा सबसे पहला प्रयास है। पता नहीं यह लघु कथा है या कुछ और ...फिर भी जब लिख गयी तो ब्लॉग पर छापने से खुद को रोक नहीं सका हूँ )