उन्हें कुछ नहीं पता
क्या धर्म
क्या जात की ऊंच नीच
क्या गोरा क्या काला
अमीर या गरीब
उन्हें मतलब नहीं
भाषा या देश से
संस्कृति और परिवेश से
न राग से न द्वेष से
उनका मन सिर्फ
उनका ही मन है
खुद में ही मस्त है
खुद मे ही मगन है
उन्हें लोटना है ज़मीन पर
तुतलाना है , ठुमकना है
अपनी ही दुनिया मे जीना
बच्चों का बचपना है
कभी था यह सब
खुद की हकीकत
अब यह सब एक सपना है !
©यशवन्त माथुर©
क्या धर्म
क्या जात की ऊंच नीच
क्या गोरा क्या काला
अमीर या गरीब
उन्हें मतलब नहीं
भाषा या देश से
संस्कृति और परिवेश से
न राग से न द्वेष से
उनका मन सिर्फ
उनका ही मन है
खुद में ही मस्त है
खुद मे ही मगन है
उन्हें लोटना है ज़मीन पर
तुतलाना है , ठुमकना है
अपनी ही दुनिया मे जीना
बच्चों का बचपना है
कभी था यह सब
खुद की हकीकत
अब यह सब एक सपना है !
©यशवन्त माथुर©
