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15 March 2024

हम सब सो रहे हैं....

लगता है
जैसे इस मतलबी दुनिया में
अपने भूत
और भविष्य को भूल कर
सिर्फ वर्तमान को ढो रहे हैं
गहरी नींद के आगोश में
हम सब सो रहे हैं।

नहीं मतलब इससे 
कि क्या हो रहा है-
क्या नहीं 
सिरहाने तकिये में दबे 
सपने खो रहे हैं 
गहरी नींद के आगोश में
हम सब सो रहे हैं।

यह और बात है 
कि दिन 
भले शवाब पर हो 
निहत्थे दरख्त भी 
हर सू  रो रहे हैं 
गहरी नींद के आगोश में
हम सब सो रहे हैं।

कहीं बेकारी-भूख 
औ मुफलिसी के 
इस अंधे दौर में 
बांधे आँखों पे पट्टी 
क्या नींव में बो रहे हैं?
गहरी नींद के आगोश में
हम सब सो रहे हैं।

-यशवन्त माथुर©
15 मार्च 2024

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02 March 2024

टैक्स पेयर कौन?

अक्सर हम पढ़ते-सुनते हैं कि टैक्स पेयर के पैसे से जो सुविधाएं सरकार आम जनता को देती है उनमें से अधिकांश बेवजह हैं। खासकर बात जब मुफ्त बिजली, राशन और अन्य सुविधाएं देने की आती है तब संभ्रांत वर्ग के अधिकांश लोग 'टैक्स पेयर के पैसे' का तर्क देने लगते हैं क्योंकि उनका मानना है कि देश के चुनिंदा अमीर लोग सरकार को टैक्स देते हैं जिसका बेजा लाभ सरकार मुफ्त सुविधाओं के रूप में आम जनता को देती है या राजनीतिक दल चुनावों के समय जनता को देने का वादा करते हैं।

आइए अब विचार करते हैं कि वास्तव में असल टैक्स पेयर है कौन? देश के चुनिंदा अमीर? या खुद आम जनता?

हम जानते हैं हमारे देश में दोहरी कर प्रणाली है जिसमे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों तरह के करों के माध्यम से सरकार को आय होती है जिसे वह बजट आवंटन के माध्यम से लोक कल्याणकारी एवं आवश्यक मदों में खर्च करती है।

कोई भी  उद्योगपति अपने उद्योग के लिए पूंजी जुटाने से लेकर अपनी वस्तु या सेवा के उत्पादन एवं अंतिम व्यक्ति तक वितरण के प्रत्येक स्तर पर किए जाने वाले हर व्यय के साथ ही उस पर देय प्रत्येक कर को अंततः आम जनता से ही वसूल करता है।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि आपने 5₹ की एक चॉकलेट खरीदी। अब उसके रैपर पर कीमत वाली जगह पर क्या लिखा मिलेगा?  जाहिर है वहां लिखा होगा- MRP Rs. 5 (Inclucive of all taxes) अर्थात उस चॉकलेट का ' अधिकतम खुदरा मूल्य 5₹ है जिसमे सभी तरह के कर यानी टैक्स शामिल हैं। (यहां यह भी बताता चलूं कि 5₹ की इस कीमत में टैक्स के साथ ही उस एक अदद को बनाने में लगने वाली सामग्री, बिजली, ढुलाई, मजदूरी, निर्माता से लेकर खुदरा विक्रेता के लाभ सहित कई अन्य तरह के व्यय भी शामिल रहते हैं।) मतलब साफ है कि अगर आपने 5₹ की भी कोई चीज खरीदी तो आपने सरकार को टैक्स दिया। और उस पर होने वाला प्रत्येक व्यय भी निर्माता ने हम यानी जनता से ही वसूल किया।

यही उदाहरण कम से कम और ज्यादा से ज्यादा कीमत की हर वस्तु और सेवा पर लागू होता है जिसे आम जनता खरीदती है।

अब खुद ही सोचिए कि जब वास्तविक टैक्स पेयर तो हम और आप यानी आम जनता है तो जनता के ही पैसे से जनता को दी जाने वाली मुफ्त या सब्सिडी वाली वस्तु या सेवा पर किसका हक पहला हुआ? देश की सारी जनता टैक्स पेयर हुई या नहीं?

तथाकथित 'टैक्स पेयर' का रोना रोने वालों को यह भी याद रखना चाहिए कि  जनता तो हर चीज पर टैक्स देती ही है, लेकिन जनता द्वारा अदा किए जाने वाले टैक्स की बचत पूंजीपति विभिन्न टैक्स सेविंग स्कीमों में निवेश करके करते हैं। यानी जनता द्वारा अदा किए गए पूरे टैक्स का पूरा लाभ जनता को कभी मिलता ही नहीं।

यशवन्त माथुर
2 मार्च 2024

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