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18 October 2021

कोई अपना नहीं......

कोई अपना नहीं सब पराए से हैं।
अपनी खुशियों में भरमाए से हैं।
जब वक्त था कुछ करने का, मुकर गए।
अब न जाने क्यों कुलबुलाए से हैं।
उनकी खूबियों को बाखूबी जान लिया था हमने।
याद पीछे की दिलाई तो अब शरमाए से हैं।
चाहते हैं जानना कि पता, अपना हम बता दें उनको।
लेकिन लगता नहीं कि करनी पर पछताए से हैं।
 
-यशवन्त माथुर©

18102021


16 October 2021

अक्स देखता हूं....

एक अक्स देखता हूं
बादलों में कहीं
गुमनाम हो चुका
एक शख्स देखता हूं
डूबते सूरज के साथ
आसमां में खोते हुए
सुबह फिर मिलेंगे
कहते हुए
यह उसका भरोसा है
और मेरे अंदर का डर
बनते अंधेरे में उसको
सवेरा सोचता हूं..
बादलों में कहीं
एक अक्स देखता हूं।

-यशवन्त माथुर©
16102021

09 October 2021

भक्त कौन?

भक्त कौन?
वो जो रोज
तुम्हारे दर पे आकर
मस्तक झुकाता है
बंद करता है पलकें
और कुछ बुदबुदाता है
शायद मांगता है
इच्छापूर्ति का वरदान
और बदले में
प्रस्तावित करता है
कुछ अर्पण
कुछ मिष्ठान पकवान।
या 
भक्त वो
जो कभी झांकता भी नहीं
तुम्हारे तथाकथित घर के भीतर
क्योंकि उसे लगता है
तुम कहीं 'भीतर' नहीं
प्रत्यक्ष, सर्वत्र, सार्वभौमिक हो
सबकी इच्छा-अनिच्छा समझकर
परीक्षा लेते हो
राह दिखाते हो।
भक्त
दोनों में से 
कोई भी हो
उसकी भक्ति के
उत्थान पतन चरम 
और अंतर्मन की
एक एक धारा
पहचानते ही हो
क्योंकि
तुम्हारा नाम 
कुछ भी हो
लेकिन
तुम जो हो
वो हो।

-यशवन्त माथुर©
0910201

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